'जेलों में जातिगत भेदभाव पर राज्यों की चुप्पी दुर्भाग्यपूर्ण', सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में जातिगत भेदभाव और अमानवीय प्रथाओं पर 23 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की प्रतिक्रिया न देने पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है।

सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में जातिगत भेदभाव पर जताई नाराजगी।
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में जातिगत भेदभाव पर जताई नाराजगी।
23 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों ने जानकारी नहीं दी, कोर्ट नाराज।
जवाब न देने पर मुख्य सचिवों को पेश होने की चेतावनी।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने जेलों के भीतर जातिगत भेदभाव और अमानवीय प्रथाओं से जुड़े एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
कोर्ट ने कहा कि यह अत्यंत "दुखद" और दुर्भाग्यपूर्ण है कि केंद्र सरकार द्वारा मांगी गई आवश्यक जानकारी पर अभी तक 23 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। कोर्ट ने इसे प्रशासनिक संवेदनहीनता करार देते हुए गहरी नाराजगी व्यक्त की है।
जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 'जेलों के भीतर भेदभाव' से जुड़े स्वतः संज्ञान वाले मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। कोर्ट ने न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर के उन सुझावों का भी संज्ञान लिया, जिसमें राज्यों द्वारा जिला-स्तरीय 'बोर्ड आफ विजिटर्स' के गठन जैसे जरूरी कदमों पर रिपोर्ट न देने की बात उठाई गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सहयोग न करने वाले राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपनी प्रतिक्रिया देने का यह अंतिम अवसर प्रदान किया है।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि अगली सुनवाई (13 जनवरी) तक राज्यों ने जवाब दाखिल नहीं किया, तो संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों या प्रधान सचिवों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
गौरतलब है कि अक्टूबर 2024 में दिए गए अपने अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जेल मैनुअल के उन नियमों को असंवैधानिक घोषित किया था, जो कैदियों के बीच जाति-आधारित श्रम विभाजन और भेदभाव को बढ़ावा देते थे।
(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)