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सीजेपी प्रदर्शन पर SC का बड़ा फैसला, 18 साल से कम उम्र के छात्रों को तुरंत रिहा करने का आदेश

Published: Tue, 28 Jul 2026 01:22 PM (GMT+05:30)

सुप्रीम कोर्ट ने 18 वर्ष से कम उम्र के उन गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों को रिहा करने का निर्देश दिया है जिनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली और सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे 18 वर्ष से कम उम्र के उन सभी गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को रिहा करें, जिनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने पुलिस को इन घटनाओं से जुड़े सभी डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का भी आदेश दिया है।

अदालत ने यह भी कहा कि NEET प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों से जुड़े सभी आरोपों की एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब विपक्ष 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पेलेट गन के इस्तेमाल का लगातार विरोध कर रहा है।

कानून हाथ में लेने वालों पर हो कार्रवाई

न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार, अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, "जिसने भी ज्यादती की है और कानून को अपने हाथ में लिया है, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए"। अदालत ने आगे कहा कि एक बार जब निर्धारित प्रोटोकॉल का उल्लंघन होता है, तो कानून को अपना काम करना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला किसी आयोग द्वारा पारदर्शी जांच का बनता है। साथ ही जोड़ा कि इस प्रक्रिया से भविष्य में ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए एक प्रोटोकॉल तैयार करने में मदद मिलनी चाहिए।

कई राज्यों से पुलिस की ज्यादती के आरोप

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने कई राज्यों से पुलिस की ज्यादतियों के आरोप भी सामने आए, जिसमें यह दावा भी शामिल है कि बिहार में एक पुलिस अधिकारी ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ AK-47 का इस्तेमाल किया। सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों से सोमवार तक जवाब मांगा है जहां छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा की घटनाएं सामने आई थीं।

शीर्ष अदालत ने अधिकारियों को सीसीटीवी कैमरों, फेशियल रिकग्निशन सिस्टम और ड्रोन के माध्यम से एकत्र किए गए डिजिटल रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का भी निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि ऐसी सामग्री के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों के व्यक्तिगत डेटा को पब्लिक डोमेन पर नहीं रखा जाना चाहिए।

जुनैद मलिक की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अलग से प्रदर्शनकारी स्वयंसेवक जुनैद मलिक की ओर से दायर एक याचिका का जिक्र किया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने उनके और उनके परिवार के साथ मारपीट की।

इन दलीलों पर गौर करते हुए, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत के समक्ष रखी गई सामग्री बताती है कि ऐसे आरोप हैं जिनकी बारीकी से जांच की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर हम व्यक्तिगत तथ्यों को देखना शुरू करें, तो हम सबसे संयमित भाषा में यही कह सकते हैं कि प्रथम दृष्टया, यह हिंसा से जुड़ा मामला है। इसीलिए हम इन मामलों की सुनवाई कर रहे हैं।

पुलिसकर्मियों पर हमले

केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग करने का आरोप लगाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा की गई किसी भी गलत कार्रवाई से निपटा जाना चाहिए। मेहता ने कहा, "अगर ऐसा है, तो उन्हें दंडित किया जाना चाहिए और उचित कार्रवाई की जानी चाहिए"।

हालांकि, इसके साथ ही मेहता ने अदालत को यह भी बताया कि विरोध प्रदर्शन के दौरान 250 से अधिक पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं। उन्होंने कहा, "एक सच है, एक दूसरा सच है, और फिर 'एक परम सत्य' है, जिसकी जांच इस न्यायालय को करनी है"।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पुलिस कर्मियों पर हुए हमलों के आरोपों की भी जांच होनी चाहिए और यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है। पुलिस अधिकारियों पर हुए इन हमलों के मुद्दे को भी संबोधित करने की आवश्यकता है। क्या यह छात्रों द्वारा किया गया है या किसी और के द्वारा...?

इस सवाल के जवाब में तुषार मेहता ने कहा कि अधिकारियों को यह नहीं लगता कि छात्रों ने पुलिस पर हमला किया था। उन्होंने दलील दी कि हिंसा संभवतः उन उपद्रवियों या "बिन बुलाए मेहमानों" द्वारा की गई होगी, जो प्रदर्शन में घुसपैठ कर गए थे।

इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी पूरे आंदोलन को हिंसा से जोड़ने के प्रति आगाह किया और टिप्पणी की, "शांतिपूर्ण भीड़ को बदनाम करने वाले लोग हमेशा मौजूद रहते हैं"।

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