'बस कंडक्टर हो या राज्य का सचिव, न्याय का हक सबको समान'; पूर्व जज की जल्द सुनवाई वाली अर्जी पर SC सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्याय का अधिकार सभी के लिए समान है, चाहे वह बस कंडक्टर हो या बड़ा अधिकारी।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि न्याय पाने का अधिकार एक आम बस कंडक्टर और बड़े सरकारी अफसर दोनों के लिए बिल्कुल बराबर है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रभावशाली लोगों को कतार तोड़कर समय से पहले यानी आउट-ऑफ-टर्न सुनवाई करना उन लाखों आम नागरिकों के साथ सरासर नाइंसाफी होगी, जो सालों से अदालत में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
जस्टिस जयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने यह टिप्पणी भ्रष्टाचार के आरोपों में नौकरी से निकाले गए एक पूर्व एडिशनल जिला जज की याचिका को खारिज करते हुए की, जिन्होंने अपने केस पर जल्द सुनवाई की मांग की थी।
कतार में खड़े लाखों लोगों के साथ अन्याय नहीं कर सकते: कोर्ट
अदालत ने कहा कि जब किसी ऐसे व्यक्ति को जल्द सुनवाई की अनुमति दी जाती है जिसके पास सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के संसाधन हैं, तो यह कतार में खड़े लाखों याचिकाकर्ताओं के शीघ्र न्याय पाने के अधिकार का हनन है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट में 12 लाख से अधिक लंबित मुकदमों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि जब तक कोई असाधारण परिस्थिति न हो, हाई कोर्ट को तय क्रम से हटकर जल्द सुनवाई का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
बेंच ने वकील से कहा कि आप जो दलील दे रहे हैं, वह हर मुकदमेबाज के न्याय पाने के समान अधिकार के खिलाफ है, चाहे वह बस कंडक्टर हो या प्रधान सचिव।
हम हाई कोर्ट से केस की सुनवाई तय समय से पहले करने का अनुरोध तब तक नहीं करेंगे, जब तक हमें यह यकीन न हो जाए कि मामले में ऐसे गंभीर हालात हैं जिनके लिए तुरंत सुनवाई जरूरी है।
सम्मान के साथ सेवानिवृत्ति
याचिकाकर्ता पूर्व जज का कहना था कि वह पिछले चार वर्षों से मानसिक तनाव और परेशानी झेल रहे हैं। 30 नवंबर को उनकी सेवानिवृत्ति होनी है, इसलिए वे सम्मान के साथ सेवा से विदा लेना चाहते हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मई 2022 में उन्हें बर्खास्त करने से पहले न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का मौका मिला, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को रिश्वत लेने के गंभीर आरोपों के तहत सेवा से हटाया गया है, इसलिए यह जल्द सुनवाई का मामला नहीं बनता। याचिकाकर्ता 1999 में न्यायिक सेवा में आए थे और 2013 में अतिरिक्त जिला जज बने।
उन पर 2015 में एक व्यक्ति को बरी करने के बदले 6 लाख रुपये रिश्वत लेने का आरोप लगा था। जांच पूरी होने के बाद मई 2022 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फुल कोर्ट प्रस्ताव के तहत उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। तभी से उनका मामला हाई कोर्ट में लंबित है।
