नई दिल्‍ली (माला दीक्षित)। विवादित ढांचा विध्‍वंस मामले में सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के विशेष जज की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उत्‍तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने जज से रिपोर्ट के लिए पूछा कि विवादित ढांचे के विध्‍वंस मामले पर दिए गए समय सीमा में वे किस तरह सुनवाई पूरी करेंगे। बता दें कि याचिकाकर्ता जज को दो साल का समय देते हुए सुनवाई पूरी करने का आदेश दिया गया है और साथ ही उनके स्‍थानांतरण व प्रमोशन पर कोर्ट द्वारा रोक लगाई गई है।

उल्‍लेखनीय है कि मामले की सुनवाई कर रहे लखनऊ के विशेष जज सुरेंद्र कुमार यादव गुहार लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। उन्होंने अर्जी दाखिल कर कहा है कि अयोध्या मामले का ट्रायल निपटने तक जज का स्थानांतरण नहीं किए जाने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश उनके प्रमोशन में आड़े आ रहा है। उन्होंने कोर्ट से आदेश में बदलाव करने और हाई कोर्ट को उन्हें जिला जज पद पर प्रोन्नत करने का आदेश देने की मांग की है।

दो साल का दिया था समय
कोर्ट ने नेताओं का मुकदमा रायबरेली की अदालत से अयोध्या प्रकरण की सुनवाई कर रहे लखनऊ के विशेष जज की अदालत में स्थानांतरित कर दिया था। साथ ही रोजाना सुनवाई कर दो साल में ट्रायल पूरा करने और इस बीच जज का स्थानांतरण नहीं किए जाने का भी आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष 19 अप्रैल को लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती सहित भाजपा और विहिप के 14 नेताओं के खिलाफ अयोध्या में ढांचा ढहाने की साजिश का मुकदमा चलाए जाने का आदेश दिया था।

प्रमोशन और स्‍थानांतरण हुआ था निरस्‍त
विशेष जज ने अर्जी में कहा है कि ट्रायल पूरा नहीं होने तक जज का स्थानांतरण नहीं करने का आदेश उनके प्रमोशन में आड़े आ रहा है। गत एक जून को हाई कोर्ट ने जजों के स्थानांतरण और प्रमोशन की अधिसूचना निकाली थी। उसमें उनका प्रमोशन के साथ स्थानांतरण किया गया था। उन्हें बदायूं का जिला एवं सत्र जज नियुक्त किया गया था। लेकिन, उसी दिन एक और अधिसूचना निकली और उसमें उनका स्थानांतरण और प्रमोशन अगले आदेश तक निरस्त कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते उनकी प्रोन्नति रुक गई।

जज की निराशा...
विशेष जज ने कहा है कि वह आठ जून, 1990 को मुंसिफ मजिस्ट्रेट नियुक्त हुए थे। 28 साल का उनका बेदाग करियर है। उन्होंने ईमानदारी और निष्ठा से काम किया। अब वह अपनी सेवा पूरी कर सेवानिवृत्ति के मुकाम पर पहुंचने वाले हैं। उनके साथ नियुक्त हुए सहयोगी और कनिष्ठ जिला जज नियुक्त हो चुके हैं। लेकिन उनका प्रमोशन नकार दिया गया है। वे अब भी अतिरिक्त जिला एवं सत्र जस्‍टिस (अयोध्या प्रकरण) पद पर काम कर रहे हैं। हाई कोर्ट वेबसाइट पर जारी सूची के मुताबिक एक जून की अधिसूचना में स्थानांतरित न्यायिक अधिकारियों ने जिला जज का कार्यभार संभाल लिया है, जबकि बदायूं के जिला जज का पद उनके लिए खाली पड़ा है।

अपील- इस तरह की न हो व्‍याख्‍या
विशेष जज ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की इस तरह व्याख्या नहीं की जाए कि अयोध्या प्रकरण की सुनवाई कर रहे जज की प्रोन्नति ही नहीं हो, जबकि उन्हें सेवा नियमों में इसका अधिकार है। प्रोन्नति रुकने से उन्हें भरपाई नहीं होने वाला नुकसान होगा।

Posted By: Monika Minal