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दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शिक्षक बन सकेंगी ट्रांसवुमेन, सुप्रीम कोर्ट ने दी आवेदन की इजाजत

Published: Sat, 11 Apr 2026 01:24 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में ट्रांसजेंडर महिलाओं को दिल्ली सरकार के स्कूलों में शिक्षक पदों के लिए आवेदन ...और पढ़ें

ट्रांसवुमेन के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला (HeFn Ha'a)

ट्रांसवुमेन के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला (HeFn Ha'a)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ट्रांसवुमेन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 31 वर्षीय जेन कौशिक की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें दिल्ली सरकार के स्कूलों में 'ट्रांसजेंडर' श्रेणी के तहत शिक्षक पद के लिए आवेदन करने की विशेष अनुमति दे दी है।

जस्टिस जेबी परदीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाया। बेंच ने दिल्ली सरकार, शिक्षा निदेशालय (डीओई), समाज कल्याण विभाग, दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसएसबी) और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

इसके साथ ही, कोर्ट ने उनकी उस बड़ी अपील पर भी विचार करने पर सहमति जताई है, जिसमें दिल्ली सरकार के तहत सरकारी नौकरियों में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए अलग से वैकेंसी और एक पूरी भर्ती नीति बनाने की मांग की गई है।

ऑनलाइन हुई थी अनुमति

एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए, अदालत ने कौशिक को डीएसएसएसबी के ऑनलाइन आवेदन पंजीकरण प्रणाली (ओएआरएस) पोर्टल पर एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति के रूप में आवेदन करने की अनुमति दी, क्योंकि उनके वकील ने बताया कि यह प्लेटफॉर्म आवेदकों को पुरुष और महिला के दो लिंग विकल्पों तक ही सीमित रखता है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के एक एकल न्यायाधीश द्वारा पारित एक पूर्व आदेश का जिक्र करते हुए जिसमें कौशिक को ट्रांसजेंडर श्रेणी के तहत आवेदन करने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा "हम वही राहत प्रदान करते हैं।"

याचिका में क्या की गई मांग?

कौशिक की याचिका में सार्वजनिक रोजगार में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की मान्यता और भर्ती प्रक्रियाओं में उनके समावेशन के प्रावधानों की कमी के बारे में व्यापक चिंताएं उठाई गई हैं। उन्होंने शिक्षण पदों में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए अलग रिक्तियों को अधिसूचित करने, एक समर्पित भर्ती नीति बनाने और वैधानिक आदेशों के अनुसार आयु और योग्यता में छूट देने के निर्देश देने की मांग की है।

कौशिक की याचिका में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 और 2020 में बनाए गए नियमों को लागू करने की भी मांग की गई है, जो रोजगार में गैर-भेदभाव को अनिवार्य बनाते हैं और संस्थानों को समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करते हैं।

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