नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। Sabrimala Temple: पांच जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला सात जजों वाली बड़ी बेंच को सौंप दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबरीमाला मंदिर और महिलाओं से जुड़े अन्य लंबित धार्मिक मामलों को देखते हुए संविधान पीठ निम्न मुद्दों पर विचार करेगी...

  • धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25 और 26) के मौलिक अधिकार और संविधान में दिये गए अन्य मौलिक अधिकारों विशेषकर समानता के अधिकार के बीच पारस्परिक सामंजस्य परिभाषित करना।
  • धार्मिक स्वतंत्रता के संविधान में दिए गए अधिकार (अनुच्छेद 25(1)) में कही गई लोक प्रशासन, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन होने की बात का क्या मतलब है।
  • नैतिकता और संवैधानिक नैतिकता की संविधान में अलग-अलग व्याख्या नहीं है। ऐसे में प्रस्ताव के मुताबिक नैतिकता ऊपर रहेगी या फिर धार्मिक आस्था और विश्वास तक सीमित होगी, दोनों की व्याख्या की जाए
  • कोर्ट किस हद तक किसी चीज के किसी धर्म का अभिन्न हिस्सा होने की जांच कर सकता है। या फिर कोर्ट को ऐसे मामले उस धर्म या धार्मिक संप्रदाय के मुखिया के तय करने पर छोड़े देने चाहिए।
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देने वाले अनुच्छेद 25(2)(बी) में दिए गए शब्द सेक्शन ऑफ हिंदू का क्या मतलब है।
  • क्या कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा या धार्मिक संप्रदाय को अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षण मिला है, धार्मिक मामलों में जनहित याचिकाओं पर किस हद तक कोर्ट को विचार करना चाहिए।

आइये जानते हैं कि 1990 से अबतक सबरीमाला मंदिर विवाद पर कैसे चला पूरा घटनाक्रम:

  • 1990 केरल हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई।
  • 1991 केरल हाई कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष आयु वाली महिलाओं पर प्रतिबंध लगाया।
  • 2006 इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश के लिए याचिका दायर की। इस मामले को दो साल
  • बाद तीन न्यायाधीशों की पीठ को भेजा गया।
  • 2016 नवंबर: केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ताजा हलफनामा दाखिल करते हुए कहा कि वह सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है।
  • 2017 जनवरी: कोर्ट ने प्रतिबंध पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह संविधान के तहत नहीं किया जा सकता है।
  • अप्रैल: मुख्यमंत्री ओमान चांडी के नेतृत्व में केरल की संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार ने शीर्ष अदालत को कहा कि वह सबरीमाला मंदिर भक्तों के धर्म का पालन करने के अधिकार की रक्षा के लिए कर्तव्यबद्ध है।
  • 2018: पांच जजों की बेंच ने मामले पर सुनवाई शुरू की।
  • जुलाई: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर में प्रवेश करना महिलाओं का मौलिक अधिकार है और उसने आयु वर्ग के पीछे के तर्क पर सवाल उठाए।
  • सितंबर: सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दी। केरल सरकार ने फैसले को लागू करने के लिए समय मांगा।
  • अक्टूबर: नेशनल अयप्पा डिवोटीज एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर फैसले की समीक्षा की मांग की।
  • 2019 फरवरी: अदालत ने अपने सितंबर 2018 के फैसले की समीक्षा की मांग वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
  • 14 नवंबर: सुप्रीम कोर्ट ने सात जजों वाली बड़ी बेंच को सौंपी पुनर्विचार याचिकाएं।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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