कोच्चि, प्रेट्र। भूगर्भ जल दोहन पर गैर सरकारी संस्था वाटरएड की हालिया रिपोर्ट आपके माथे पर चिंता की लकीरें पैदा कर सकती है। इसमें बताया गया है कि विश्व भर में भूगर्भ जल का जितना दोहन होता है, उसका करीब एक चौथाई हिस्सा अकेले भारत निकालता है। इतना जलदोहन अमेरिका और चीन मिलकर भी नहीं करते। भारत में वर्ष 2000-10 के बीच भूगर्भ जल के नीचे गिरने का स्तर 23 फीसद हो गया है।

जल दिवस (22 मार्च) के मद्देनजर जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर भूगर्भ जल का 24 फीसद अकेले भारत उपयोग करता है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अनाज और कपड़ों का निर्यात भारत की आमदनी का महत्वपूर्ण जरिया है। यदि इनके उत्पादन व्यवस्था को टिकाऊ नहीं बनाया गया तो समस्या बढ़ भी सकती है। गरीब वर्ग के लोगों को पीने के लिए साफ पानी भी उपलब्ध नहीं हो पाएगा।

वाटरएड ने अपनी रिपोर्ट का शीर्षक दिया है-'बिनीथ द सरफेस : द स्टेट आफ द वल्‌र्ड्स वाटर 2019'। इसमें कहा गया है कि विश्व में भारत भूगर्भ जल का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। वह 12 फीसद भूगर्भ जल का निर्यात करता है। भारत में धान और गेहूं के उत्पादन में सबसे ज्यादा पानी की खपत होती है। एक किलो गेहूं के लिए औसतन 1,654 लीटर और एक किलो चावल उपजाने के लिए औसतन 2,800 लीटर पानी की जरूरत होती है।

रिपोर्ट में सुझाया गया है कि अगर धान और गेहूं की जगह भारत में मक्का, बाजरा और ज्वार जैसे अनाज का उत्पादन किया जाए तो इससे सिंचाई जल की जरूरत एक तिहाई कम हो जाएगी। वाटरएड इंडिया के मुख्य कार्यकारी वीके माधवन ने कहा कि विश्व जल दिवस अधिक पानी की खपत वाली वस्तुओं के उत्पादन को अधिक टिकाऊ बनाने और उपभोक्ताओं को उनकी खरीद को अधिक विचारशील बनाने का आह्वान करता है। स्वच्छ जल की कमी कमजोर तबके को गरीबी की तरफ धकेलती है।

Posted By: Ravindra Pratap Sing

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