नई दिल्ली। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के पेंशन स्कीम में केंद्र सरकार अपना पूरा अंशदान नहीं दे रही है। वित्त वर्ष 2006-07 से 2011-12 के बीच इसमें लगातार गिरावट आई है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की संसद में पेश रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है।

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ईपीएफओ द्वारा संचालित कर्मचारी पेंशन स्कीम 1995 (ईपीएस-95) में सरकार कर्मचारियों के मूल वेतन (महंगाई भत्ता जोड़कर) के 1.16 फीसद राशि का योगदान करती है। बाकी 8.33 फीसद हिस्सा कर्मचारियों को देना होता है। यानी उनके पेंशन खाते में 9.49 फीसद का कुल योगदान होता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2006-07 में ईपीएफओ ने सरकार से 1,805.07 करोड़ रुपये मांगे थे। इसमें से 870.57 करोड़ रुपये सरकार का एरियर था और 934.50 करोड़ रुपये सरकार का योगदान। मगर संगठन को सिर्फ 1,340 करोड़ रुपये ही मिले। यानी कुल बकाये से 465.07 करोड़ रुपये कम। यह सिलसिला 2011-12 तक जारी रहा। इसकी वजह से इस समय तक केंद्र के योगदान में कमी बढ़कर 59.02 फीसद यानी 1,943.99 करोड़ रुपये हो गई। 2011-12 में ईपीएफओ को 3,293.99 करोड़ रुपये के मुकाबले सिर्फ 1,350 करोड़ रुपये ही दिए गए।

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पीएफ के ब्याज बढ़ाने पर विचार

कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) पर 0.25 फीसद ब्याज बढ़ाने पर सरकार विचार कर रही है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री कोडिकुन्निल सुरेश ने बुधवार को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में यह जानकारी दी। ईपीएफओ की शीर्ष निर्णायक संस्था केंद्रीय ट्रस्टी बोर्ड (सीबीटी) ने वित्त वर्ष 2013-14 के लिए अंशधारकों को 8.75 फीसद ब्याज देने की सिफारिश की है। 2012-13 में कर्मचारियों को उनके पीएफ पर 8.5 फीसद ब्याज दिया गया था।

ट्रस्टों को टैक्स छूट पर फैसला अगले महीने

निजी कंपनियों द्वारा संचालित 70 पीएफ ट्रस्टों को टैक्स छूट पर ईपीएफओ अगले महीने फैसला करेगा। संगठन की उच्चाधिकार समिति की मार्च के पहले हफ्ते में आयोजित बैठक में इस पर मुहर लग सकती है। इन ट्रस्टों को टैक्स छूट की मियाद 31 मार्च को खत्म हो रही है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने साफ किया है कि इस बार इसकी मियाद नहीं बढ़ाई जाएगी। वर्ष 2006 में जब छूट की घोषणा की गई थी तब 31 मार्च 2007 तक के लिए ही यह वैध था। मगर हर बार इसकी अवधि बढ़ाई जाती रही है।

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