यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 23, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
राहुल को नहीं था अंदाजा कि दंगा पीड़ित उनके साथ ऐसा करने वाले हैं
दिल्ली की ठिठुरन भरी सर्दी में अलसुबह शामली के दंगा राहत शिविरों के लिए रवाना होते समय कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल ...और पढ़ें

मेरठ [मनोज झा]। दिल्ली की ठिठुरन भरी सर्दी में अलसुबह शामली के दंगा राहत शिविरों के लिए रवाना होते समय कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को देर रात शायद अहसास हुआ हो कि सूबे में कांग्रेस की सियासी उम्मीदों के सूरज पर फिलहाल कोहरा छंटता दिखाई नहीं दे रहा है। अपने जाने-पहचाने लुके-छिपे अंदाज में दंगा पीड़ितों से मिलने पहुंचे राहुल का जोश शायद शिविर दर शिविर ठंडा पड़ता गया। यही कारण है कि आखिर में जब वह मुजफ्फरनगर पहुंचे तो करीब साढ़े तीन महीने बाद भी दंगे को लेकर उनके पास बोलने या करने के लिए कुछ भी नया नहीं था। सियासत के जानकार राहुल के इस दौरे का नतीजा तो फिलहाल सिफर ही मान रहे हैं।
जिस तरह राहुल ने अचानक शामली जाकर सभी को चौंकाया, कुछ उसी तर्ज पर दंगा पीड़ितों ने कांग्रेस नेता को चौंकाना शुरू कर दिया। उम्मीद तो पलक-पावड़े बिछने की थी, लेकिन झेलना पड़ा विरोध। मलकपुर से निकलकर अगले शिविर पहुंचे तो वहां पीड़ितों ने काले झंडे लहराते हुए राहुल मुर्दाबाद के नारे तक लगाए। एक शिविर में मुस्लिम महिलाएं और बच्चे कांग्रेस नेता की गाड़ी के आगे लेट गए। इसी प्रकार एक जगह पीड़ित उनके वाहन को घेर धक्का-मुक्की करने लगे। राहुल के दौरे की मानिंद यह सब कुछ अप्रत्याशित था।
तस्वीरेंट्ठ राहत शिविर में राहुल गांधीमाना जा रहा है कि कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी की बहुप्रतीक्षित मुंबई महारैली की टीवी कवरेज को ध्वस्त करने के मकसद से राहुल के इस दौरे की गुपचुप योजना तैयार की थी। योजना एक हद तक दुरुस्त भी थी। राहुल के अचानक शामली पहुंचने के साथ ही टीवी चैनलों ने अपना रुख उस ओर मोड़ भी लिया। राहुल का अंदाज भी जोशीला था। नीली जींस, सफेद कुर्ता और हाफ काली जैकेट जैसी बेहद अनौपचारिक पोशाक पहने राहुल बिना किसी पूर्व सूचना के शिविरों में पहुंचकर शायद यह संदेश भी देना चाह रहे थे कि जमीन पर उतरने के लिए किसी औपचारिकता या ताने-बाने की जरूरत नहीं होती। फिर शिविरों में कीचड़ भरे रास्तों से पहुंचना और उनके बीच बैठकर चाय पीना भी शायद दिलों में ही उतरने की कवायद थी। माहौल को भांपते हुए शायद कांग्रेस उपाध्यक्ष ने एक राहत शिविर का दौर रद कर दिया।
विरोध के बीच राहुल ने दंगा पीडि़तों को लगाया मरहम
दरअसल, कांग्रेस की यह कवायद विशुद्ध रूप से चुनावी है। जाटों को आरक्षण का लाभ देने के बाद कांग्रेस अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रूठे मुसलमानों को रिझाने के प्रयास में है। पश्चिमी यूपी में चुनावी नैया पार लगाने के लिए जाट और मुसलमानों को साधना कांग्रेस और उसके सहयोगी रालोद के लिए नितांत जरूरी भी है। उधर, मुसलमानों का ऊंट किस करवट बैठेगा, इसको लेकर सपा तक संशय में है। याद रहे कि दंगे के समय मुजफ्फरनगर आए मुख्यमंत्री अखिलेश को भी काले झंडे देखने पड़े थे। अब राहुल भी दंगा पीड़ितों की खरी-खोटी सुनकर गए हैं। लिहाजा, उनकेताजा दौरे का हासिल देखा जाए तो नतीजा सिफर से आगे बढ़ता दिखाई नहीं देता। उल्टे कांग्रेस के साथ-साथ रालोद की पेशानी पर बल जरूर पड़ गए हैं।
एक बात और, राहुल के दौरे ने कांग्रेस के रणनीतिकारों की एक बार फिर पोल खोल दी। अपने नेता को मुजफ्फरनगर और शामली की दहकती जमीन पर दोबारा उतारने से पहले पार्टी के पास दंगे को लेकर कुछ भी नया नहीं था। न तो राहत-पुनर्वास को लेकर कोई पैकेज या घोषणा, न ही मुसलमानों के दिल में उतरने जैसी कोई नई बात। बाकी सपा-भाजपा के सिर पर दोष मढ़ने का काम तो पिछले तीन महीने से छुटभैये नेता तक कर रहे हैं। इसी प्रकार शिविरों में मौत या बदइंतजामी को लेकर राजनीतिक पार्टियों से लेकर अदालतें तक राज्य सरकार पर गरज-बरस रही हैं।
रविवार को राहुल जिस समय शामली के राहत शिविरों में पीड़ितों का विरोध झेल रहे थे, लगभग उसी समय भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी मुंबई में 'वोट फॉर इंडिया' का नया नारा दे रहे थे। सवाल है कि राहुल ने अपने दौरे में क्या नया कहा या दिया? आगामी लोकसभा चुनाव राहुल और मोदी के विजन और व्यक्तित्व की भी अग्निपरीक्षा लेगा। ऐसे में कांग्रेस के रणनीतिकारों को अपने नेता के लिए घिसे-पिटे जुमलों से अलग हटकर बदलते भारत के अनुरूप नए और ठोस नारे व नीतियों की तलाश करनी होगी। अब जहां तक टीवी कवरेज का सवाल है तो मुंबई में मोदी के भाषण का चैनलों ने अविरल प्रसारण किया। राहुल के दौरे से ज्यादा तो चैनलों ने दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने जा रहे अरविंद केजरीवाल को तवज्जो दी।
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