नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। उत्तर प्रदेश में अरसे से जिलों से लेकर ब्लॉक स्तर तक काबिज मठाधीश पदाधिकारियों को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अब जमीन दिखाएंगे। गांव, तहसील, ब्लॉक से लेकर जिला तक की कांग्रेस इकाइयों को जवान व ऊर्जावान बनाने की कसरत अब मुकाम तक पहुंचने वाली है। जिला व शहर अध्यक्षों की तलाश में जुटे उत्तर प्रदेश के आठों जोन के प्रभारियों और समन्वयकों का यह मिशन अगले तीन-चार दिन में पूरा हो जाएगा।

सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी के कार्यालय से उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष निर्मल खत्री और सभी जोनों के प्रभारी और समन्वयकों से लगातार संवाद कायम है। भीषण गर्मी में भी अभी नए-नए बने सभी जोनों के प्रभारी और समन्वयक अपने-अपने क्षेत्रों का ताबड़तोड़ दौरा कर रिपोर्ट को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उत्तर प्रदेश के 70 जिलों में अभी 31 जिलों के अध्यक्ष बन चुके हैं। शेष 39 जिलाध्यक्षों के अलावा तमाम महानगर या शहर अध्यक्षों पर कोई फैसला नहीं लिया जा सका था।

इनमें से ज्यादातर जगहों पर अरसे से उत्तर प्रदेश के बड़े नेताओं के विश्वासपत्र या उनके गुट के लोग जमे हुए हैं। लखनऊ या कानपुर जैसे बड़े महानगरों में तो अध्यक्ष पद का घमासान दिल्ली तक पहुंच चुका है। ऐसे तक उदाहरण हैं कि एक शहर में दो-दो लोग खुद को कांग्रेस का अध्यक्ष तक बताते रहे हैं। बाकी कई जिलाध्यक्ष तो ऐसे हैं, जिन्हें अपने इलाके के ब्लॉक और तहसील के पदाधिकारियों के चेहरे और नाम तक पता नहीं। और तो और जिले की जगहों तक के बारे में वे अनभिज्ञ पाए गए।

ऐसे में राहुल ने तय किया है कि ऊपर से नहीं, बल्कि निचले स्तर से संगठन का चेहरा बदला जाए। राहुल गांधी ने यह जिम्मेदारी नए क्षेत्रीय या जोनल प्रभारियों को दी है। उन्होंने आठ जोन प्रभारी और समन्वयक बनाए हैं। इनमें किसी को चुनाव नहीं लड़ना है। सिर्फ संगठन को मजबूत करने का ही काम करना है। उद्देश्य यह है कि क्षेत्र पर पूरा ध्यान दिया जा सके और जमीन से सही रिपोर्ट लेकर जिला-शहर या महानगर अध्यक्षों की नियुक्ति हो।

इन सारे लोगों से 10 जून तक रिपोर्ट देने को कहा गया था, लेकिन अभी इसमें तीन-चार दिन और लग सकते हैं। बहरहाल, 15 जून तक राहुल चाहते हैं कि सभी नाम उनके पास हों और प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री से विचार-विमर्श के बाद इनकी घोषणा कर दी जाए। वरीयता युवक कांग्रेस या एनएसयूआइ में सक्रिय रहे कार्यकर्ताओं को दी जा रही है। कोशिश यह भी है कि कम उम्र के पदाधिकारी ज्यादा हों, ताकि वे क्षेत्र में ज्यादा घूम सकें।

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