संजीव गुप्ता, नई दिल्ली: वायु प्रदूषण भारत के साथ-साथ दक्षिण एशियाई देशों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। इसकी सर्वाधिक मार नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश को सहन करनी पड़ रही है। हालत यह हो गई है कि कोई भी देश इससे अकेले नहीं लड़ सकता। इसे देखते हुए राजधानी स्थित पर्यावरण थिंक टैंक क्लाइमेट ट्रेंड्स ने सभी प्रभावित देशों का संयुक्त मंच तैयार करने की जरूरत बताई है, जहां वायु प्रदूषण से निपटने के लिये विशेषज्ञताओं और अनुभवों का आदान-प्रदान किया जा सके।

क्लाइमेट ट्रेंड्स ने वायु प्रदूषण, जन स्वास्थ्य और जीवाश्म ईंधन के बीच संबंधों को तलाशने और सभी के लिए स्वस्थ धरती से संबंधित विजन का खाका खींचने के लिए शनिवार को एक वर्चुअल संवाद का आयोजन किया। असम की कलियाबोर से सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि हमें अपने मानक और समाधान तय करने होंगे। एक ऐसा मंच और ऐसे मानक जिनसे इस सवाल के जवाब मिलें कि हमने स्टाकहोम और ग्लास्गो में जो संकल्प लिए थे उन्हें लाहौर, ढाका और दिल्ली में कैसे लागू किया जाएगा।

पाकिस्तान के सांसद रियाज फतयाना ने वायु प्रदूषण को दक्षिण एशिया के लिए खतरा बताते हुए महाद्वीप के स्तर पर मिल जुलकर काम करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दक्षिण एशियाई सांसदों का एक फोरम बनाया जाना चाहिए जहां इन विषयों पर बातचीत हो सके। पाकिस्तान में वायु प्रदूषण की समस्या बहुत ही खतरनाक रूप लेती जा रही है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने कहा कि दुनिया 1972 में स्टाकहोम में ह्यूमन एनवायरमेंट पर संयुक्त राष्ट्र की पहली बैठक की 50वीं वर्षगांठ अगले महीने मनाने जा रही है। यह इसके आकलन के लिए महत्वपूर्ण वर्ष है कि किस तरह से जैव विविधता तथा पर्यावरण से जुड़े अन्य सभी पहलू मौजूदा स्थिति से प्रभावित हो रहे हैं। वायु प्रदूषण एक प्राथमिक सार्वजनिक स्वास्थ्य इमरजेंसी है।

बांग्लादेश के सांसद साबेर चौधरी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत बहुत महत्वपूर्ण है। वायु प्रदूषण की वजह से वाटर स्ट्रेस और खाद्य असुरक्षा समेत अनेक आपदाएं जन्म ले रही हैं। नेपाल की सांसद पुष्पा कुमारी कर्ण ने कहा कि वाहनों की बढ़ती संख्या की वजह से समस्या विकट होती जा रही है। काठमांडू में पीएम 2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ के सुरक्षित मानकों से पांच गुना ज्यादा है। हालांकि नेपाल सरकार ने इलेक्टि्रक मोबिलिटी के लिए एक योजना तैयार की है। इसी तरह की योजनाएं दक्षिण एशिया के अन्य देशों में भी लागू की जानी चाहिए।

50 फीसदी कैंसर के मरीज धूम्रपान नहीं करते मेदांता अस्पताल के ट्रस्टी डा. अरविंद कुमार ने कहा कि वायु प्रदूषण सिर्फ पर्यावरणीय और रासायनिक मुद्दा नहीं है बल्कि यह विशुद्ध रूप से स्वास्थ्य से जुड़ा मसला है। फेफड़ों के कैंसर के 50 प्रतिशत मरीज ऐसे आ रहे हैं जो धूम्रपान नहीं करते। 10 प्रतिशत मरीज 20 से 30 साल के बीच के होते हैं। भारत के करीब 30 फीसदी बच्चे यानी हर तीसरा बच्चा दमे का मरीज है। इसकी वजह से दिल की बीमारियां, तनाव, अवसाद और नपुंसकता समेत अन्य अनेक रोग पैदा हो रहे हैं। दक्षिण एशिया में 29 फीसदी लोगों की मौत फेफड़े के कैंसर से होती है, 24 फीसदी लोगों की मौत मस्तिष्क पक्षाघात से, 25 फीसदी की मौत दिल के दौरे से और 43 फीसदी लोगों की मौत फेफड़े की बीमारी से होती है।

Edited By: Amit Singh