यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 27, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सच बोलने से मिलती है खुशी, सच से ज्यादा मुश्किल झूठ बोलना; ऐसे करें सच बोलने का अभ्यास
मेरे विचार से हमको आज से अभी से सच बोलने का अभ्यास करना चाहिए। अपने साथ-साथ परिवार और मित्रों को ...और पढ़ें

डा. अनिल सेठी। आज के दौर में सबसे मुश्किल है सच सुनना और बोलना। हम सब अपनी सहूलियत के हिसाब से सच को तोड़ मरोड़ लेते हैं और ऐसे में सच कहीं नीचे दब जाता है। यह सब शुरू बचपन से होता है। जब एक बच्चा स्कूल या प्ले स्कूल जाना शुरू करता है, तो वापस आकर अपने परिवार को खुशी-खुशी स्कूल में जो भी किया या सीखा, वह बताता है। फिर जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसकी यह आदत बदलती जाती है। क्योंकि वह यह देखता है कि जब भी वह स्कूल टाइम में किए गए किसी व्यवहार की जानकारी घर पर आकर देता है, तो उसको डांट पड़ती है या कई बार तो मार भी पड़ जाती है। इसलिए धीरे-धीरे वह अपनी सहूलियत या दूसरों को खुश करने के लिए सच के बजाय कुछ और ही बताने लगता है। उसको लगता है कि यही ठीक है।
यह आदत धीरे-धीरे मजबूत होने लगती है। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि झूठ की बुनियाद पर खड़े किये गए रिश्ते ज्यादा टिकते नहीं। जब तक हमको इसका आभास होता है, देर हो चुकी होती है। लेकिन आज की हकीकत यही है कि इस तरह की दोहरी जिंदगी अधिकतर लोग जी रहे हैं और इसलिए खुश नहीं हैं। क्योंकि वह हर किसी से झूठ बोल सकते हैं, पर अपने आप से कतई नहीं। सच न बोलने की इसी आदत के चलते हम तनाव और अवसाद आदि के भी शिकार होने लगते हैं।
सच से ज्यादा मुश्किल झूठ बोलना: आइये, सच की एक घटना उदाहरण के जरिये समझते हैं। मेरे स्कूली दिनों की बात है। मेरे एक मित्र के पिताजी का ट्रांसपोर्ट का कारोबार था। एक दिन उनका सेब से भरा ट्रक पलट गया,उनको सूचना मिली तो वह तुरंत घटनास्थल पर पहुंचे। भगवान का शुक्र था कि ट्रक के अलावा जान का कोई नुकसान नहीं हुआ था। ड्राइवर व क्लीनर को ज्यादा चोट नहीं आयी थी। उस दिन शाम को मेरा उस दोस्त के घर पर जाना हुआ, क्योंकि कुछ दिनों बाद हमारी परीक्षा होने वाली थी। तभी उसके पिताजी घर पर आये और अपनी बेटी से बोले- मुझे जल्दी से खाना दो, मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया है। बेटी ने कहा- पापा आपने बाहर कुछ क्यों नहीं खाया, तो उसके पिता जी बोले कि सुबह एक्सीडेंट के बारे में सुनकर मैं जल्दी में अपना पर्स लेना भूल गया। खाना लगाते हुए बेटी ने कहा कि पापा आपने सेब क्यों नहीं खा लिए तो पिता ने जवाब दिया, क्या वे सेब मेरे थे ? नहीं न, तो फिर मैं कैसे खा लेता। इस घटना ने मुझ पर बहुत असर किया। आज के दौर में शायद लोग इस घटना पर हंस सकते हैं, लेकिन जो इंसान सच के साथ रहता है, वह चैन की नींद सो सकता है। क्योंकि मुझे लगता है कि झूठ बोलना सच बोलने से ज्यादा मुश्किल है। क्योंकि झूठ बोलने में याद रखना पड़ता है कि किसको क्या बोला, जबकि सच तो हमेशा सच है। सच को याद नहीं रखना पड़ता।
ऐसे करें सच बोलने का अभ्यास: मेरे विचार से हमको आज से अभी से सच बोलने का अभ्यास करना चाहिए। अपने साथ-साथ परिवार और मित्रों को भी सच बोलने के लिए प्रेरित करना चाहिए। अगर हम एक हंसी-खुशी भरी जिंदगी जीना चाहते हैं, तो सच की राह पर चलना होगा। अगर हमने किसी से झूठ कहा है, तो आज उसको सच बोलकर माफी मांग सकते हैं। क्योंकि सच एक न एक दिन बाहर आएगा ही और तब देर हो चुकी होगी। मुझे उम्मीद है कि आप आज से ही खुशहाल जीवन की राह चुनेंगे और सच की राह पर चलेंगे।
[मोटिवेटर एवं लाइफ कोच]
