[रजित मेहता] जब हम समय की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करते हैं तो कभी-कभी हमारे पास पूरे दम-खम से उस चुनौती का सामना करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं होता है। किसी भी कीमत पर लड़ना और जीतना ही एकमात्र विकल्प होता है। कोविड महामारी के खिलाफ युद्ध के दौरान भारत भी इसी तरह की स्थिति का सामना कर रहा है। कोविड के खिलाफ भारत द्वारा अपनाई गई रणनीति ने चाहे बेहतर परिणाम दिए हों, लेकिन वैक्सीन के प्रति हिचकिचाहट अभी भी बरकरार है।
देश का टीकाकरण कार्यक्रम अपने नागरिकों को सुरक्षित रखने के लिए देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। कोविड के लिए वैक्सीन प्रबंधन पर राष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह द्वारा शुरू की गई रणनीति इस प्रतिबद्धता के अनुरूप है। टीकाकरण के पहले चरण में स्वास्थ्य कर्मियों के टीकाकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया था। इसके बाद वरिष्ठ नागरिक और 45 वर्ष से ऊपर के वे लोग थे जो कुछ खास बीमारियों से पीड़ित थे। सरकार की वैक्सीन नीति ने लचीलापन दिखाते हुए इसमें निरंतर सामयिक बदलाव किया है।
केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य देखभाल नेटवर्क और बुनियादी ढांचे के माध्यम से टीकाकरण अभियान की शुरूआत की, जिसमें निजी स्वास्थ्य सेवा को शामिल करना इस कार्यक्रम को बढ़ावा देने की दिशा में एक तार्किक कदम था। हालांकि अल्पावधि में, हमें अभी भी वैक्सीन के प्रति ङिाझक को कम करने की आवश्यकता है, जो टीकाकरण के प्रयासों में बाधा उत्पन्न करने वाली एक विकट समस्या के रूप में सामने आई है। टीकाकरण के प्रति ङिाझक और प्रौद्योगिकी ने शुरू से ही भारत के टीकाकरण अभियान को झटके दिए हैं। टीकों का इतिहास उनके दुष्प्रभावों या एक नए टीके की अक्षमता पर भय और संदेह की कहानियों से भरा हुआ है। कोविड टीकों के मामले में भी अनुभव कुछ अलग नहीं है। यह सच है कि सामान्य समय में वैक्सीन के विकास और उपयोग के लिए तैयार होने में लगभग एक दशक का समय लगता है, जबकि कोरोनावायरस के टीके एक साल से भी कम समय में आ गए हैं। यह किसी चिकित्सीय चमत्कार से कम नहीं है।
यदि हमें वांछित दैनिक टीकाकरण का लक्ष्य हासिल करना है तो टीके से जुड़ी हिचकिचाहट को दूर करना होगा। अस्पताल और सरकारें टीकाकरण के बाद होने वाली शारीरिक प्रतिक्रियाओं (एडवर्स इफेक्ट फालोइंग इम्युनाइजेशन) के बारे में लोगों को जागरूक कर सकती हैं। टीकाकरण के बाद होने वाली शारीरिक प्रतिक्रियाओं के प्रबंधन के लिए दिशानिर्देशों की एक रूपरेखा और लागू करने के लिए एक प्राधिकरण, टीके के संबंध में ङिाझक पर काबू पाने की दिशा में हमारे प्रयासों को मजबूत करेगा। इतना ही नहीं, कोविड टीकों के बारे में मिथकों और आशंकाओं को कम करने के लिए एक खुला और अनुकूल दृष्टिकोण आवश्यक है। यह सही है कि टीके के लाभों को नकारा नहीं जा सकता है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि टीके की दोनों खुराक लेने के बाद 10 हजार में से केवल दो से चार लोग ही संक्रमित पाए गए। इन दिनों चिंता इसलिए बढ़ गई है कि इस वारयस के नए स्ट्रेन (प्रारूप) सामने आ रहे हैं। ऐसे में वैक्सीन सुरक्षा पाने और टीकाकरण के बाद भी सैनिटाइजेशन और मास्क लगाए रखना जरूरी है।
यह सही है कि आपातकालीन उपयोग के लिए स्वीकृत होने से पहले कोरोना टीके ने सभी सुरक्षा मानदंडों को पूरा किया है और प्रभावकारिता का प्रदर्शन किया है। कुछ सामान्य लक्षण जैसे हल्का बुखार, कमजोरी या सिरदर्द अन्य टीकों के भी लक्षण हैं। लिहाजा केवल कमजोर प्रतिरक्षा वाले या किसी भी टीके से पहले से एलर्जी की प्रतिक्रिया वाले लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।
वैक्सीन अभियान में व्यवधान : खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी और को-विन प्रणाली में गड़बड़ियां देश में टीकाकरण अभियान में शुरुआती धीमी गति के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं। इसके अलावा, पूरी तरह से तकनीक पर आधारित होने के कारण भी इसकी राह में बाधाएं आई थीं। भारत में बुजुर्ग आबादी के लिए बुनियादी ढांचे की व्यापक कमी है। इसमें हमारे स्वास्थ्य देखभाल स्थल भी शामिल हैं। टीका लेने के लिए स्वयं को रजिस्टर करने और टीका लग जाने के बाद उसका प्रमाणपत्र हासिल करने जैसे काम पूरी तरह से डिजिटल होने से वैसे तो अधिकांश लोगों को सुविधा ही हुई है कि वे यह काम आसानी से घर बैठे या कामन सर्विस सेंटर आदि के जरिये कर रहे हैं, लेकिन बुजुर्गो को अवश्य दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
वैक्सीनेशन केंद्र पर आन-द-स्पाट पंजीकरण का बड़ा जोखिम भीड़भाड़ और कोविड मानदंडों का पालन नहीं होने से जुड़ा है। ऐसे में अस्पतालों को भीड़ प्रबंधन के लिए कुछ अन्य व्यावहारिक उपायों के बारे में भी सोचना चाहिए। इसके लिए बड़े केंद्रों में ज्यादा भीड़ लगाने के बजाय लोगों को छोटे अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि दोनों खुराकें लेने के बावजूद सावधानियों को कम नहीं करना चाहिए। टीकाकरण संक्रमण के प्रभाव को कम कर सकता है, लेकिन वैक्सीन ले चुका व्यक्ति भी कोरोनावायरस का वाहक बन सकता है और दूसरों को संक्रमित कर सकता है।
कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने की हमारी जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना सरकारों के लिए नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है।
[एमडी व सीईओ, अंतारा]