यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 09, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
नोटबंदी : कैशलेस पर मूल समस्या को दूर नहीं कर पा रही सरकार
नोटबंदी पर संसद से लेकर सड़क तक संग्राम छिड़ा हुआ है। सरकार क्रेडिट और डेबिट कार्ड के इस्तेमाल पर जोर ...और पढ़ें

नई दिल्ली [मुकेश केजरीवाल]। नकदी का इस्तेमाल घटाने के लिए सरकार ने 11 उपायों का एलान जरूर किया है। लेकिन कार्ड के लेन-देन पर लगने वाले ट्रांजेक्शन शुल्क को घटाने पर कोई ठोस कदम नहीं उठा सके। उन्होंने कार्ड भुगतान हासिल करने के लिए लगाई जाने वाली पीओएस मशीनों के मासिक किराये को सीमित करने की बात जरूर कही है, मगर इससे काफी ज्यादा अहम ट्रांजेक्शन शुल्क (एमडीआर) को सीमित करने के लिए कुछ नहीं कहा। इसी तरह वित्त मंत्रालय ने ट्रांजेक्शन शुल्क पर लगाए जाने वाले सेवा कर को भी पूरी तरह हटाने को सहमति नहीं दी है जो कार्ड उपयोग को नकदी के मुकाबले आकर्षक बनाने की दिशा में बाधक है।
सरकार की कोशिश पर सवाल
भारतीय रिजर्व बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, 'एक दिन पहले वित्त मंत्री ने जिन कदमों का एलान किया है, उनसे रेलवे, तेल विपणन और बीमा कंपनियों के लेन-देन में तो निश्चित तौर पर प्लास्टिक मनी (क्रेडिट और डेबिट कार्ड) का उपयोग बढ़ेगा लेकिन सरकार का असली जोर अगर ज्यादा से ज्यादा छोटे कारोबारियों और कस्बों या गांवों पर है तो वहां ये कदम बहुत प्रभावी नहीं होंगे।'
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ये कहते हैं कि भारत में कार्डधारकों की संख्या बढ़ाना तो जरूरी है ही, मगर उससे भी ज्यादा जरूरी है उसके उपयोग स्थलों की संख्या को बढ़ाया जाए। मार्च में तैयार की गई आरबीआई की रिपोर्ट में भी माना गया था कि भारत में डेबिट कार्ड से होने वाले कुल लेन-देन की रकम का 94 फीसदी तक सिर्फ एटीएम से हो रहा है और लेन-देन की कुल रकम का महज छह फीसदी हिस्सा ही पीओएस मशीन के जरिए है। ये कहते हैं, 'एटीएम लेन-देन से कैशलेस की दिशा में कोई बढ़ावा नहीं मिलता। देश में सुरक्षित कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए सबसे जरूरी है कि कार्ड उपयोग पर लगने वाले ट्रांजेक्शन शुल्क को ले कर पूरी पारदर्शिता लाई जाए। इस काम में देश का केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय अब तक सफल नहीं हो सके हैं।'
ट्रांजेक्शन शुल्क बनाम पीओएस मशीन
विक्रेताओं के पीओएस मशीनों से बचने की असली वजह ट्रांजेक्शन शुल्क है जो बैंक उनसे वसूलता है। यह शुल्क दो फीसदी और उससे ज्यादा तक है। जहां इन मशीन का मासिक किराया अधिकतम पांच-छह सौ रुपये है, वहीं ट्रांजेक्शन शुल्क के नाम पर इसे मोटी रकम देनी होती है। अगर महीने में इसकी बिक्री दो लाख की भी है तो वह छह हजार रुपये तक की रकम और उस पर सेवा कर और शेस आदि देता है।
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फैसलों पर नहीं हो रहा अमल
डेबिट कार्ड के जरिए होने वाले लेन-देन पर ट्रांजैक्शन शुल्क की सीमा तय करने की सलाह तो रिजर्व बैंक जारी कर चुका है, लेकिन इस पर अब तक अमल नहीं हो रहा। इसने प्रस्ताव किया था कि पीओएस के जरिए दो हजार रुपये तक के लेन-देन पर 0.75 फीसदी और दो हजार से अधिक के लेन-देन पर अधिकतम एक फीसदी ट्रांजेक्शन शुल्क ही लिया जाए। मगर अब भी अधिकांश बैंक क्रेडिट और डेबिट कार्ड के लिए एक समान दर पर इससे ज्यादा शुल्क वसूल रहे हैं।
सेवा कर की भूमिका अहम
कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने और नकदी के मुकाबले इसे आकर्षक बनाने में सरकार की ओर से लिया जाने वाले सेवा कर की भी अहम भूमिका है। मगर ट्रांजेक्शन शुल्क पर सरकार अपने सेवा कर को भी पूरी तरह छोड़ने को तैयार नहीं, जो कार्ड के जरिए लेन-देने को और महंगा बना देता है।
वित्त मंत्री के एलान में सिर्फ दो हजार रुपये तक के लेन-देन पर लगने वाले ट्रांजेक्शन चार्ज पर सेवा कर को हटाने की बात कही है। बैंकों को यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह छूट सिर्फ 31 दिसंबर तक होगी या हमेशा के लिए। वित्त मंत्री की सबसे हैरान करने वाली घोषणा तो वह है जिसमें उन्होंने सरकारी विभागों और पीएसयू को कहा है कि वे पीओएस पर लगने वाले ट्रांजेक्शन शुल्क का भार ग्राहकों पर नहीं डालें और खुद उठाएं। जानकार बताते हैं कि यह शुल्क तो वैसे भी ग्राहकों पर नहीं डाला जाता।
