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'ऑपरेशन सिंदूर में देखने को मिली भारत की स्मार्ट पावर', बोले सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी

Published: Tue, 19 May 2026 02:50 PM (IST)

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने 'ऑपरेशन सिंदूर' को भारत की 'स्मार्ट पावर' का सटीक उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि ...और पढ़ें

आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी।

आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी।

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने मंगलवार को कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारतीय सेना ने आतंकी ढांचे को ध्वस्त किया, लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक धारणा को तोड़ा और फिर जान-बूझकर और सोची-समझी रणनीति के तहत अपनी कार्रवाई रोक दी। यह 'स्मार्ट पावर' का सबसे पूर्ण और सटीक उदाहरण था।

मानेकशॉ सेंटर में आयोजित एक सेमिनार में अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि बारह महीने पहले भारत ने दुनिया को तथाकथित 'स्मार्ट पावर' के सवाल का एक आंशिक जवाब दिया था।

'लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक धारणा को तोड़ा'

सेना प्रमुख ने कहा, "6-7 मई 2025 की दरमियानी रात को भारत ने कार्रवाई की। 22 मिनट की एक सटीक और तय समय-सीमा के भीतर ऑपरेशन सिंदूर ने सैन्य सटीकता, सूचना पर नियंत्रण, कूटनीतिक संकेत और आर्थिक दृढ़ता इन सभी को एक सुसंगत राष्ट्रीय कार्रवाई के रूप में अंजाम दिया। हमने दुश्मन के भीतर तक घुसकर प्रहार किया, आतंकी ढांचे को ध्वस्त कर दिया, एक लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक धारणा को तोड़ दिया और फिर जान-बूझकर और एक निश्चित उद्देश्य के साथ रुक गए।"

'88 घंटों के बाद दिखा स्मार्ट पावर का मुकम्मल रूप'

उन्होंने आगे कहा, "88 घंटों के बाद जो सोच-समझकर फैसला लिया गया वह 'स्मार्ट पावर' का सबसे मुकम्मल रूप था, जिसमें यह बिल्कुल साफ था कि किस साधन का इस्तेमाल करना है, कितनी तीव्रता से करना है और ठीक किस वक्त एक सैन्य क्षण को रणनीतिक क्षण में बदलना है।"

जनरल द्विवेदी ने कहा, "हमारे आस-पास की दुनिया एक अधिक जटिल संकेत भेज रही है। अव्यवस्था, अविश्वास और गठबंधनों में विरोधाभास।"

उन्होंने तर्क देते हुए कहा, "हमसे एक ऐसी दुनिया का वादा किया गया था, जहां समृद्धि के चलते सत्ता की राजनीति बेमानी हो जाएगी... इसके विपरीत, आज हमारे सामने एक ऐसी दुनिया है जहां सत्ता की राजनीति का इस्तेमाल समृद्धि को पुनर्व्यवस्थित करने के लिए किया जा रहा है।"

'जोड़ने वाली ताकतें ही दबाव डालने का हथियार बन गईं'

सेना प्रमुख ने कहा, "21वीं सदी की शुरुआत इस आत्मविश्वास भरे विचार के साथ हुई थी कि व्यापार, सप्लाई चेन और बढ़ी हुई कनेक्टिविटी की ताकतें देशों को इतना अधिक एक-दूसरे पर निर्भर बना देंगी कि उनके बीच कोई संघर्ष नहीं होगा। लेकिन विरोधाभास यह है कि जिन ताकतों ने देशों को आपस में जोड़ने का वादा किया था, वही धीरे-धीरे दबाव डालने के हथियार बन गई हैं।"

उन्होंने आगे कहा, "सेमीकंडक्टर और उनकी चुनिंदा उपलब्धता अब हेजिंग के साधन बन गए हैं। होर्मुज स्ट्रेट अब सक्रिय टकराव का क्षेत्र बन गया है। वैश्विक रक्षा खर्च 2.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के पार पहुंच गया है, जो सतत विकास लक्ष्यों के लिए संयुक्त राष्ट्र के पूरे बजट से भी अधिक है।"

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