नई दिल्‍ली, सीमा झा। क्‍या आपने कभी महसूस किया है कि हमारी मनोदशा अक्सर विचारों पर भारी पड़ती है। आप किसी बात को, विचार को उसी अनुरूप देखने लगते हैं, जैसी आपकी मनोदशा है। पर किसी भी सोच को बार-बार दोहराने से अच्छा है हम उसे सचमुच व्यावहारिक रूप से अनुभव करें, उसे महसूस करें। कोई भी तथ्य आपको भावुक, परेशान भी कर सकता है। पर यह संभव है कि जब उस बात से सचमुच आपका सामना हो तो आपका अनुभव बिल्कुल अलग हो!

चलिए, इस बात को समझने के लिए मैं अपने मैनेजर की कहानी सुनाता हूं। वे हमारे पुराने मैनेजर हैं और उनका नाम राम कुमार है। हमारे संस्थान की धरोहर कहे जाते हैं। न केवल काम में अपनी असाधारण क्षमता के कारण, बल्कि किसी भी तथ्य को लेकर अपनी सोच व उसे अलग तरह से समझने के कारण भी। यही वह बात है, जिससे हर कोई उनका मुरीद है। ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसका उचित समाधान उनके पास नहीं होता। यही वजह है कि अपनी समस्या के हल के लिए अब हर कोई उन पर निर्भर हो गया है। राम कुमार समस्याओं के समाधान के लिए समस्या को साफ-साफ, वह जैसी है, उसी रूप में देखने की बात करते हैं। पर सबसे पहले उसमें से सभी तरह की नकारात्मकता को बाहर निकाल फेंकने को जरूरी मानते हैं। पर इसके लिए वह सहयोगियों की सारी बातों, आशंकाओं को ध्यान से सुनते हैं। इसके बाद सारी बातों पर मंथन कर अपने मन में समाधान का एक खाका खींच लेते हैं।

खास बात यह है कि वह तथ्यों को खारिज नहीं करते, बल्कि सभी तथ्यों को आखिर में नये रूप में पेश कर देते हैं। राम कुमार खुद स्वीकारते हैं कि कैसे वह खुद भी पहले किसी विचार या तथ्य को अपने तरीके से देखते हैं, पर जब उस पर काम करने जाते हैं तो आखिर में वही तथ्य एक नये रूप में सामने होता है। इस कहानी का बस एक ही संदेश है कि आपको समस्या पर नहीं, समाधान पर फोकस करना है और आप भी राम कुमार की तरह अपनी आत्मशक्ति के प्रयोग से ऐसा कर सकते हैं। आप भी उनकी तरह परिवार, अपने संस्थान या समाज के लिए धरोहर बन सकते हैं।

भय की न सुनें: छत्रपति शिवाजी महाराज का एक कथन है कि निर्भीक बनें, ऊपर वाला आपकी मदद करेगा। जब आप निर्भय होना सीख जाएंगे तो आप खुद महसूस करेंगे कि आपकी मनोवृत्ति बदल रही है। ‘बॉर्डर’ फिल्म में अभिनेता सनी देयोल का एक डायलॉग इस बात को समझने में मदद करता है। इस फिल्म में मेजर कुलदीप के किरदार में सनी एक जगह कहते हैं कि, ‘मैं उस युद्ध को नहीं जीत सकता या स्थिति जीत के योग्य नहीं है, हार रहा हूं, तब भी मैं डरने के बजाय आक्रमण करता हूं।’ पर वहीं साथ खड़ा एक सैनिक इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता। वह कहता है, पर यह सही नहीं है, उसे ऐसा करने से डर लगता है। उस डरे हुए सैनिक के कंधे पर हाथ रखकर सनी एक बात कहते हैं, ‘आपको अपने मन में बैठे भय की सलाह नहीं माननी चाहिए।’ बस इतनी-सी बात है। जब आपको लगे कि आप भयभीत हैं तो मन में बैठे भय को यह अवसर न दें कि वह आपको डराए। उसे हावी होने देने से पहले चुप करा दें। उसकी बातों पर ध्यान न दें। इसकी जगह पर अपने मन में सकारात्मकता और भरोसा बढ़ाने का प्रयास करें।

अच्छी पुस्तकों व संगत का साथ: वे लोग, जो लंबे समय से भय व असुरक्षा के शिकार हैं, उन्हें अच्छी पुस्तकें और सकारात्मक लोगों का साथ पाने की कोशिश करनी चाहिए। भय और असुरक्षा का एक बड़ा कारण है कि हम खुशियां बाहर तलाशते हैं जबकि ये हमारे भीतर ही हैं। बाहर मिलने वाली खुशियां मायावी होती हैं, लाख कोशिश करें, पकड़ में नहीं आतीं। हम खुशियों को गलत जगह तलाशते हैं। दरअसल, ऐसा हमारी सोच के कारण होता है। इसे आप बेहतर परिवेश और पुस्तकों के साथ से बदल सकते हैं।

तटस्थ भाव से देखें अपने विचार: जिन पुराने विचारों के साथ रहते रहे हैं, उनका अवलोकन करें। वैसे ही, जैसे किसी और को देख रहे हैं। तटस्थ भाव से देखें कि कैसे वे आपको प्रभावित कर रहे हैं। उन विचारों को सिर्फ सुनें, उनका मूल्यांकन न करें। आप पाएंगे कि आपके मन में वही विचार पिछले दरवाजे से दाखिल हुए हैं, जिन्हें आपने बुलाया ही नहीं। आप महसूस करेंगे कि वे विचार बाहर से नहीं आए, आपके मन में ही पैदा हुए हैं। यदि आपका मन असुरक्षा और अक्षमता से भरा है और कोशिश के बाद भी वे विचार मन से नहीं जा रहे हैं तो घबराएं नहीं। भरोसा रखें कि अपनी आत्मशक्ति से इस पर भी विजय पा लेंगे। तब महाशक्ति बनने का एहसास होगा। वह शक्ति पैदा हो रही है, जो मन को नियंत्रित कर पाने में सफल हो रही है।

ये हैं वे कदम

  • आप कामयाबी की ओर बढ़ रहे हैं, मन में इस तस्वीर को बनाए रखें। इसे धुंधली न पड़ने दें। आपका दिमाग इसी तस्वीर के बारे में सोचेगा
  • मन में जो छवि तैयार की है, कभी उस पर संदेह न करें। यदि आप ऐसा करते हैं तो यह बड़ा फेरबदल कर सकता है। दरअसल, दिमाग हमेशा वही देखता है उसी को खोजता है, जो तस्वीर आपके द्वारा उसे दिखाई जाती है। इसलिए भले ही परिस्थितियां अनुकूल न लगें, आपको खुद पर संदेह नहीं करना चाहिए
  • कल्पनाओं को बाधाओं का पहाड़ बनने की इजाजत न दें। जो बाधाएं महसूस हो रही हैं, उनका अध्ययन करें। उन्हें हटाने या कम करने का प्रयास करें। यदि वे बनी रहती हैं तो आपको भयभीत करती रहेंगी
  • याद रहे, बेशक आप खुद में अकेले हैं, पर आप संपूर्ण हैं। आप सक्षम हैं। प्रयास से और बेहतर बन सकते हैं
  • किसी मित्र या सलाहकार की मदद लें जो आपकी गलतियों को सामने रख सही राह बता सकें। खुद पर संदेह करें तो वह आपको क्यों, क्या और कैसे की स्पष्टता दे सकें। दरअसल, यदि खुद के प्रति स्पष्टता हो तो निदान की तरफ पहला कदम यही होता है
  • जीवन चाहे जिस परिस्थिति में रखे, जो परिस्थितियां मेरे सामने आएं, मैं उससे निपटने में सक्षम हूं, यह स्वीकृति मन में बनी रहे
  • अपनी क्षमता का वास्तविक मूल्यांकन करें। अहं को हावी न होने दें, पर आत्मसम्मान में भी कोई कमी नहीं हो

आत्मविश्वास के दम पर ही बाधाओं का पहाड़ कर सकेंगे पार: ‘कोई शक्ति है, जो आपकी मदद कर रही है’-लगभग सभी आध्यात्मिक पुस्तकों में यह सरल वाक्य मौजूद होता है। पर यह भी तो कहा जाता है कि ईश्वर या कोई सर्वोच्च शक्ति आपकी मदद तब तक नहीं कर सकती, जब तक कि आप खुद के प्रति आश्वस्त नहीं होते। आपका आत्मविश्वास डांवाडोल है। आप आशंकाओं से भरे हैं तो बाधाओं का पहाड़ खड़ा मिलेगा। आत्मविश्वास से भरे लोगों की सबसे बड़ी खूबी यही है कि उनका मन हमेशा आश्वस्त रहता है। वे समझते हैं कि किसी समस्या का हल तब तक संभव नहीं, जब तक खुद पर भरोसा न हो। आत्मविश्वास नहीं है तो महाशक्ति बनने की कल्पना व्यर्थ है।

[डॉ. शीतल नायर, प्रसिद्ध स्टोरी टेलर और प्रेरणादायी पुस्तकों के लेखक]

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