नई दिल्‍ली, जेएनएन। रंगमंच किसी विचार के आने और उसे प्रस्तुत करने का वो रचनात्मक मंच है जिसमें प्रतिक्रिया संवेदनाएं देती हैं। कभी मुस्कुराकर ताली बजवाती हैं तो कभी आंखें नम हो जाती हैं और स्थायी संदेश के रूप में दर्शकों के दिल में समा जाती हैं। विचारों के प्रकटीकरण का ये ढंग ऐतिहासिक है। पाषाणकाल में शिकार के इंतजार में समय काटने के तरीकों में एक था। शुक्रवार (27 मार्च) को रंगमंच दिवस है। इस मौके पर नाटकों के कई सभी पहलुओं पर अपने अनुभव व विचार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक प्रोफेसर सुरेश शर्मा ने प्रियम से साझा किए। प्रस्तुत है ब्योराः

- राजधानी से ही शुरुआत करते हैं, दिल्ली रंगमंच को आप कैसे देखते हैं?

बांग्ला, मराठी और गुजराती रंगमंच की स्थिति हमारे यहां से बेहतर है। यानी हिंदी से। इसका सबसे बड़ा कारण वहां के लोगों का रंगमंच के प्रति सम्मान और समर्पण है। वो लोग अपने बजट में थिएटर के लिए खर्च जोड़ते हैं। नाटक देखने या उससे सीखने के लिए परिजनों व बच्चों को प्रेरित करते हैं। हमारे यहां तो लोग टिकट खरीदकर रंगमंच देखना फिजूलखर्ची मानते हैं। वे पास चाहते हैं। हफ्तों प्रैक्टिस कर रहे कलाकारों का भी सम्मान नहीं करते। अगर यहां की स्थिति बेहतर करनी है तो सबसे पहले लोगों में टिकट खरीदने की आदत डालनी होगी।

- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय पर यह आरोप लगता रहा है कि यहां भारतीय लोक की उपेक्षा हुई जबकि पश्चिमी और रूसी कहानियों और शैली को हाथों हाथ लिया गया।

ऐसा बिल्कुल नहीं है। रंगमंच बहुआयामी होता है। यही कोशिश राष्ट्रीय नाट्य महाविद्यालय करता रहा है। अगर हम धर्मवीर भारती के अंधा युग की बात करते हैं तो उसमें कोरस के जरिए कहानी आगे बढ़ी जो ग्रीक प्ले राइटिंग का हिस्सा होता है। चूंकि नाटक में महाभारत का अंतिम दिन दिखाया गया है और पूरा दृश्य प्रस्तुत करना है तो इसके लिए कोरस सटीक है, इसलिए उसका सही प्रयोग किया गया। कोर्स का हिस्सा होने के नाते हम विद्यार्थियों को शेक्सपियर बताते हैं और कालिदास भी। बनारस का मशहूर भरत मिलाप भी बताते हैं और वहीं के रामनगर की रामलीला भी।

- दिल्ली के रंगकर्मियों पर कुछ कहना चाहेंगे?

चालीस व पचास के दशक में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के साथ-साथ आर जी आनंद, हिंदुस्तानी थिएटर, यांत्रिक ग्रुप, नया थिएटर जैसे कई ग्रुप थे। इन ग्रुपों ने आजादी से पहले थिएटर को अंग्रेज सरकार के खिलाफ कई मुद्दों और देश की समस्याओं से जोड़ा और इन विषयों पर नाटक किए। 1959 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना की गई। इसने भी उसी कड़ी को आगे बढ़ाया। राजेंद्र नाथ के थिएटर ग्रुप 'अभियान', एनएसडी के 'संभव', अरविंद गौड़ के 'अस्मिता', श्रीराम सेंटर और एलटीजी के 'रंगमंडल', 'इमागो थिएटर' ने दिल्ली में रंगमंच को पूरी तरह स्थापित कर दिया। आज भी यह प्रयास कई थिएटर ग्रुपों द्वारा सतत है। सत्य कौशिक, श्याम कुमार. रोहित त्रिपाठी जैसे लोगों के ग्रुप तो रोज एक नाटक करते हैं।

- मुख्य धारा सिनेमा और कला का संघर्ष पुराना है। वर्तमान स्थिति पर क्या कहेंगे?

अनेक ऐसी फिल्में है जिनमें न तो बड़े-बड़े सेट थे और न ही बड़े कलाकार। फिर भी उन्हें बेशुमार सफलता मिली। दरअसल, अब दर्शक सिनेमा में खुद को ढूंढता है, मिडिल क्लास हीरो तलाशता है। अपने आस-पास की परिस्थितियां स्क्रीन पर देखना चाहता है और उन्हीं समस्याओं का हल सिनेमा के जरिए निकालता है। वास्तविक विषय, पटकथा और अभिनय ने आम लोगों के बीच अपनी जगह बना ली है।

- आम धारणा है कि थिएटर दुनिया को ग्रीक लोगों की देन है जबकि इधर भारत में भरत मुनि को रंगमंच का जनक माना गया। कहा जाता है कि उनका रचित नाट्यशास्त्र विश्व में प्राचीनतम है। आपकी राय?

मैं तो और पहले जाना चाहता है। जब पाषाणकाल में लोग शिकार के लिए जाते थे तो समय काटने के लिए पुराने किस्सों को अभिनय करके बताते थे। बाकी नाट्यशास्त्र तो भारत में रंगमंच के इतिहास की साक्ष्यों के साथ कहानी है और समुद्रमंथन से बेहतर रंगमंच का प्रमाण क्या हो सकता है। अंतिम साक्ष्य पंचम वेद है जो नाट्यवेद है। अर्थ यह है कि रंगमंच का इतिहास पूरी तरह से भारत में ही जन्मा, पला और बढ़ा। यह जरूर है कि थिएटर को पेशेवर (प्रोफेशनल) ग्रीक लोगों ने बनाया।

- रंगमंच के विद्यार्थियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

मैं यही कहूंगा कि किसी भी कलाकार में धैर्य और अनुशासन जरूर होना चाहिए। पहले कला के पीछे लंबा संघर्ष होता था। हमारे समय के लोग किसी नाटक के विचार से लेकर उसे दर्शकों तक पहुंचाने की प्रत्येक प्रक्रिया में योगदान देते थे। रिहर्सल करते थे और दर्शकों को जुटाने के लिए लोगों तक टिकट पहुंचाने भी जाते थे। आज के रंगकर्मी में धैर्य की कमी है। सोशल मीडिया पर प्रचार से वे अपनी सफलता आंकते हैं जबकि वहां केवल त्वरित प्रतिक्रिया मिलती है। मंच आत्मविश्वास देता है।

- वेब सीरीज और टिकटॉक के जमाने में रंगमंच की स्थिति पर कुछ कहेंगे?

जब टीवी आया था तब भी रंगमंच था। रंगमंच की स्थिति आज भी वैसी है और आगे बेहतर ही होगी। इसकी मजबूती ऐसे भी समझी जा सकती है कि बड़े-बड़े कलाकार रंगमंच की तरफ वापस लौट रहे हैं। जया बच्चन, अमोल पालेकर और सौरभ शुक्ला इसके उदाहरण हैं।

- नुक्कड़ नाटक नहीं दिखते अब?

नुक्कड़ों नाटकों की उम्र बहुत ज्यादा नहीं होती, न ही उतने दर्शक मिल पाते हैं। हालांकि इन्हें प्रासंगिक बनाने के लिए कोशिशें हो रही हैं। चुनाव के दौरान काफी नुक्कड़ नाटक देखने को मिलते हैं।

प्रोफेसर सुरेश शर्मा के बारे में

मूलतः वाराणसी निवासी प्रोफेसर सुरेश शर्मा का जन्म 1959 में हुआ था। 1985 में भारतेंदु नाट्य अकादमी, लखनऊ से उन्होंने नाट्य कला में डिप्लोमा लिया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली से अभिनय में स्नातक किया और जल्द ही दिल्ली के थिएटर ग्रुप 'अभिनय' का हिस्सा बन गए। उन्होंने 1987-88 में हिमाचल में गैर सरकारी नाट्य संस्था मंडी स्थापित की। श्री राम सेंटर फॉर परफॉर्मिंग ऑर्ट्स में योगदान दिया। साहित्य कला परिषद और संगीत नाटक अकादमी की ओर से उन्हें सम्मानित किया गया। 30 से ज्यादा नाटकों में अभिनय किया।

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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