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क्या इस बार अच्छा रहा अल नीनो? खराब मानसून के बावजूद दिल्ली में खूब हुई बारिश, राजस्थान-पंजाब में दिखी कमी

Published: Thu, 17 Sep 2026 09:15 AM (IST)

इस मानसून में दिल्ली में सामान्य से 8% अधिक बारिश हुई, जबकि आसपास के क्षेत्रों में कम रही, जो अल ...और पढ़ें

अल नीनो के डर के बीच जमकर भीगी दिल्ली। (फाइल फोटो।)

अल नीनो के डर के बीच जमकर भीगी दिल्ली। (फाइल फोटो।)

HighLights

  1. दिल्ली में सामान्य से 8% अधिक बारिश दर्ज की गई।

  2. अल नीनो और जलवायु परिवर्तन ने बारिश पैटर्न बदला।

  3. कम दबाव वाले सिस्टम और पश्चिमी विक्षोभ का मेल।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। इस मानसून में राजधानी में उम्मीद से बेहतर बारिश हुई। 16 सितंबर तक दिल्ली में सामान्य से 8% ज्यादा बारिश हुई। यह तब हुआ जब इसके मौसम संबंधी सब-डिविजन (हरियाणा) में 23% और पूरे क्षेत्र (उत्तर-पश्चिम भारत) में 10% कम बारिश दर्ज की गई थी।

इस मौसम में बारिश का अजीब पैटर्न बताता है कि मजबूत होते अल नीनो और जलवायु परिवर्तन ने राजधानी में उम्मीद से ज्यादा बारिश कराने में भूमिका निभाई हो सकती है। इस क्षेत्र में जिले-वार बारिश के नक्शे को देखने पर पता चलता है कि दिल्ली इस साल अच्छे मानसून वाले इलाके की सीमा पर थी।

दिल्ली से सटे जिलों में कम बारिश

राजधानी के ठीक उत्तर में कम बारिश वाले जिलों का एक बड़ा इलाका है, जिसमें पड़ोसी सोनीपत (-32%) और रोहतक (-47%) से लेकर पंजाब में होशियारपुर (-53%) और कपूरथला (-69%) तक शामिल हैं। हरियाणा, पंजाब और साथ ही राजस्थान, हिमाचल और पश्चिमी यूपी में 30 से ज्यादा ऐसे जिले हैं जहां बारिश कम हुई है।

तो कैसे भीगी दिल्ली?

तो कम बारिश वाले इलाके के बगल में दिल्ली में इतनी ज्यादा बारिश कैसे हुई? इसका जवाब इस बात में छिपा है कि इस सीजन में बंगाल की खाड़ी से आने वाले कम दबाव वाले सिस्टम ने अपनी दिशा कैसे बदली। शायद अल नीनो के असर से। कैसे पश्चिमी विक्षोभ के साथ उनके मेल ने दिल्ली-एनसीआर में बारिश में खास मदद की।

उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में मानसून की ज्यादातर बारिश नमी वाले कम दबाव वाले सिस्टम की वजह से होती है, जिनमें बंगाल की खाड़ी से जमीन की ओर बढ़ने वाले डिप्रेशन भी शामिल हैं। उम्मीद के उलट अल नीनो वाले साल में ऐसे सिस्टम की संख्या कम नहीं होती।

असल में, 'क्लाइमेट डायनामिक्स' में 2024 की एक स्टडी से पता चला है कि 1979-2020 के दौरान अल नीनो वाले सालों में बंगाल की खाड़ी में डिप्रेशन (कम दबाव वाले क्षेत्र) की संख्या बढ़ गई थी। सामान्य सालों में जुलाई-अगस्त के दौरान इनकी औसत संख्या 2.4 थी, जबकि अल नीनो वाले सालों में यह 3.9 थी।

असल में क्लाइमेट डायनामिक्स में 2024 की एक स्टडी से पता चला है कि 1979-2020 के दौरान अल नीनो वाले सालों में बंगाल की खाड़ी में डिप्रेशन (कम दबाव वाले क्षेत्र) की संख्या बढ़ गई थी। सामान्य सालों में जुलाई-अगस्त के दौरान इनकी औसत संख्या 2.4 थी, जबकि अल नीनो वाले सालों में यह 3.9 थी।

इस साल 10 कम दबाव वाले सिस्टम बने, जिनमें जुलाई-अगस्त में चार डिप्रेशन शामिल थे। जबकि सामान्य तौर पर इनकी संख्या नौ से कम होती है। अल नीनो वाले साल में आम तौर पर कम दबाव वाले सिस्टम की दिशा बदल जाती है।

मौसम विभाग के डायरेक्टर जनरल मृत्युंजय महापात्रा ने कहा, "अल नीनो वाले सालों में दक्षिण भारत और उससे सटे उत्तरी हिस्सों में हवा नीचे की ओर बैठती है।" उन्होंने आगे कहा, "इस वजह से दक्षिणी अक्षांशों में जैसे बंगाल की खाड़ी के बीच में एलपीएस नहीं बन पाते। ये एलपीएस आम तौर पर उत्तर आंध्र-दक्षिण ओडिशा तट की ओर बढ़ते हैं।"

दिल्ली को इसका फायदा हुआ। खासकर अगस्त में जब छह लो प्रेशर सिस्टम ने भारत को प्रभावित किया। इनमें दो डिप्रेशन भी शामिल थे। उत्तर की ओर बढ़ने के कारण, इनमें से ज्यादातर सिस्टम उत्तरी ओडिशा-बंगाल के रास्ते जमीन के अंदर दाखिल हुए और उत्तर-उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़े। इससे ओडिशा, बंगाल, झारखंड, यूपी, उत्तराखंड और दिल्ली का इलाका प्रभावित हुआ, जबकि राजस्थान, हरियाणा और पंजाब पर इनका असर कम रहा।

और क्या वजह रही?

एक और वजह भी थी, जिसका संबंध शायद जलवायु परिवर्तन से है। WDs (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) नमी वाली हवाओं के सिस्टम होते हैं जो भूमध्यसागरीय इलाके से पूरब की ओर बढ़ते हैं और आमतौर पर सर्दियों से लेकर गर्मियों की शुरुआत तक उत्तर भारत में बारिश या नमी वाला मौसम लाते हैं।

आमतौर पर मॉनसून के दौरान वेस्टर्न डिस्टर्बेंस कम ही देखने को मिलते हैं क्योंकि जेट स्ट्रीम, जो इस हलचल की वजह बनती है अप्रैल-मई तक हिमालय के उत्तर की ओर चली जाती है। हालांकि, हाल के सालों में जेट स्ट्रीम के देर से पीछे हटने का ट्रेंड देखा गया है, जिसे वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग से जोड़कर देखते हैं। मौसम विभाग के मुताबिक, इस साल जून-अगस्त के दौरान 16 वेस्टर्न डिस्टर्बेंस आए, जिनमें से आठ अकेले अगस्त में ही आए।

ऐसे कई मौके आए जब पूर्वी मानसून सिस्टम का वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से मेल हुआ, जिससे दिल्ली समेत उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में बारिश और तेज हो गई। उदाहरण के लिए राजधानी में 2 जुलाई को मानसून की शुरुआत एक सक्रिय वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के दौरान हुई।

दिल्ली में सबसे ज्यादा बारिश (8-9 जुलाई, 29 जुलाई, 7-8 अगस्त, 25 अगस्त) तब हुई जब इस इलाके में मानसून सिस्टम और वेस्टर्न डिस्टर्बेंस दोनों एक साथ सक्रिय थे। इन दोनों के मेल से पश्चिमी यूपी में भी भारी बारिश हुई और पहाड़ी इलाकों में भारी तबाही मची। जैसे बांदीपोरा (जम्मू-कश्मीर) में बादल फटना, चंबा (हिमाचल प्रदेश) में जानलेवा अचानक बाढ़ आना और हिमाचल व उत्तराखंड में लगभग 290 सड़कों का बंद होना लेकिन हरियाणा और पंजाब पर इनका कोई बड़ा असर नहीं दिखा।

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