रीतिका खेड़ा। अाजादी के सत्तर साल बाद आज अगर देश के लोगों की खाद्य सुरक्षा और पोषण सुनिश्चित करने को लेकर देशव्यापी अभियान चलाने की जरूरत पड़ रही है तो जाहिर तौर पर कई सवाल लोगों के दिमाग में कई सवाल घूम रहे होंगे। आखिर किसी विकासशील देश में पोषण की इतनी अहमियत क्यों है? और इतने सालों के दौरान हम इसे कर क्यों नहीं पाए। पूरी दुनिया में खाद्य सुरक्षा, पोषण और स्वास्थ्य के लिए सरकारें कार्यरत हैं। अमेरिका दुनिया के सबसे सक्षम देशों में से है, फिर भी वहां ‘फूड स्टैंप्स’ की योजना चल रही है। जापान, स्वीडन जैसे विकसित देशों में स्कूलों में मध्याह्न भोजन का कार्यक्रम भी चलता है। अत: इस तरह की योजनाओं का चलना, केवल हमारी विफलता की निशानी नहीं है, यह सरकार की जिम्मेदारी है, और लोगों का हक है। जब तक दोनों- लोग और सरकारें- रहेंगे, तब तक ऐसे कार्यक्रम चलते रहेंगे।

भारत में हर तीसरा बच्चा है कुपोषण का शिकार
इसका अर्थ यह नहीं कि हमें जो कुछ करना चाहिए था, किया। भारत में कुपोषण की समस्या इतनी बड़ी है, कि इससे निपटना आसान नहीं। आज लगभग हर तीसरा बच्चा कुपोषित है और महिलाओं में खून की कमी (एनीमिया) अभी भी 40 फीसद के आसपास है। दरअसल भारत में पिछले 70 साल में पोषण पर जरुरत से काफी कम खर्च किया गया है। जो खर्च हुआ, उसका जोर खाद्य सुरक्षा पर रहा। जन वितरण प्रणाली में ज्यादातर राज्यों में केवल गेहूं या चावल ही दिया जाता है, जिससे ज्यादा से ज्यादा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। पोषण सुरक्षा प्राथमिकता नहीं बन सकी।

किए जा रहे हे हैं ये प्रयास 
सरकारी नीतियों में जिस पर जोर देना चाहिए था उसमें मां के स्वास्थ्य, छोटे बच्चों के पोषण और संबंधित जरूरतें जैसे मसले शामिल हैं। कुपोषण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता है। मां के कुपोषित होने से बच्चे कुपोषित पैदा होंगे। साथ ही, कुपोषण के लिए मां के गर्भ से लेकर बच्चे के जीवन के पहले 1000 दिन सबसे अहम होते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कुपोषण से लड़ने में छोटे बच्चों और माओं पर ध्यान दिए जाने वाली समझ व्यापक रूप से हमारी नीतियों में पिछले 15 साल से ही दिखने लगी है। हालांकि कई मसलों पर अभी ध्यान देने की जरूरत है। जैसे पहले 6 महीनों में केवल स्तनपान सुनिश्चित कराना।

चलाई जा रही ये योजनाएं
छोटे बच्चों पर केंद्रित मुख्य योजना है, समेकित बाल विकास योजना, जिसकी सेवायें आंगनवाड़ी द्वारा पहुचायी जाती हैं। आंगनवाड़ियां कुपोषण पर सीधा वार करने में सबसे असरदार योजना हो सकती है। उनकी स्थिति में भी बहुत सुधार आया है। जहां रोज खाना मिलना तो दूर, गांव की आंगनवाड़ी कहाँ है लोग यह भी नहीं जानते थे, आज कई राज्यों की आंगनवाड़ियां प्री-प्राइमरी स्कूल बनने की कोशिश में हैं। दक्षिण के राज्य पहले से ही सक्रिय थे, अब ओडिशा, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी छोटे बच्चों पर खर्च बढ़ाया गया है। इन राज्यों में अंडा, दूध, चिकी इत्यादि पौष्टिक आहार देने की पहल हुई है।

दो दशकों में कितना आया सुधार
पिछले दो दशक में जो सुधार आया है, वह राज्यों की मुहिम रही है। केंद्र से अभी भी समर्थन की कमी है। चाहे वह धनराशि की रूप में हो या योजना में लचीलेपन की। एक खतरा यह है कि मां-बच्चे के नाम पर जो खर्च हो रहा है वह उन पर कम, निजी कंपनियों की जेब में जाएगा। संप्रग-एक सरकार के समय से कंपनियों की कोशिश रही है कि गर्म खाने की बजाय प्री-पैक्ड खाना दिया जाए। केंद्र सरकार पोषण अभियान चला रही है जिसमें खर्च और ध्यान स्मार्टफोन और सॉफ्टवेयर द्वारा रिकॉर्ड-कीपिंग पर है। बच्चों पर नहीं। इस प्रवृत्ति को अविलंब समझने-परखने और उजागर करने की जरूरत है ताकि कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर हो रहा खर्च जन कल्याण पर केंद्रित रहे, निजी मुनाफे में न व्यय हो जाए।

[लेखक: अर्थशास्त्री औऱ समाज विज्ञानी, भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद]

Posted By: Pooja Singh

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