नई दिल्ली, [जागरण स्पेशल]। प्रचंड गर्मी से राहत के लिए मानसून की फुहारों का इंतजार था। इंतजार था कि रिमझिम बरखा आएगी और तन-मन को सराबोर कर जाएगी। मानसून से उम्मीद होती है कि यह मिट्टी की सौंधी खुशबू और पानी की सौगात देकर जाएगा। लीजिए मानसून आ गया। फुहारों से रिमझिम और फिर मूसलाधार बूंदें धरती को सराबोर करने लगी हैं। बरसात की ये बूंदें बड़ी चंचल हैं। तन-मन और धरती को सराबोर करने के साथ ही यह कई लोगों और एजेंसियों की पोल भी खोल रही हैं। पिछले कुछ दिनों से मानसून मायानगरी मुंबई पर मेहरबान है। मायानगरी की धरती पर गिरती एक-एक बूंद यहां के नगर निकाय बीएमसी की पोल भी खोल रही है। जितना पानी आसमान से बरसता है उसकी एक-एक बूंद सड़क पर ऐसे जम जाती है, जैसे यहीं पर जमा होने के लिए उसका जन्म हुआ हो। यह कोई नई बात नहीं है, हर साल बीएमसी की पोल ऐसे ही खुलती है। हालात ये हैं कि मुंबई के लोग अब बरसात का नाम सुनकर डरने लगे हैं। ऐसा ही हाल बीएमसी का भी है।

बरसात की वजह से अब तक दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है। गलती चाहे जिसकी हो, फिलहाल तो दोषारोपण बरसात पर हो रहा है। क्योंकि बरसात की वजह से कहीं भूस्खलन और दीवार गिरने तो कहीं पेड़ गिरने और पानी में डूबने से लोगों की मौत हो रही है। नदी के प्रवाह को रोकने और पानी इकट्ठा करने के लिए बनाए गए बांध न सिर्फ टूट रहे हैं बल्कि बांध की जेल से छूटकर पानी की तेज धार सड़कों को भी अपने साथ बहा ले जा रही है। हवाई सेवाएं बाधित हो रही हैं और मुंबई से आने-जाने वाली ट्रेनों को पुणे, अहमदाबाद या किसी अन्य जगह पर डायवर्ट किया जा रहा है। यही नहीं भारी बारिश की चेतावनी के बाद पर्यटकों को पहाड़ी क्षेत्रों पर न जाने की सलाह भी दी गई है।

मानसून अब भी पूरे देश में नहीं फैला है। दिल्ली जैसे देश के कई इलाकों को अब भी मानसून की पहली बारिश का बेसब्री से इंतजार है। फिलहाल मानसूनी बारिश बृहनमुंबई म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन यानी बीएमसी की पोल खोल रही है, लेकिन जल्द ही यह नजारा देश के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलेगा। दिल्ली-NCR के शहर भले बारिश का बेसब्री से इंतजार कर रहे हों, लेकिन पिछले सालों के इतिहास को देखें तो मुंबई जैसा नजारा यहां भी बस दिखने ही वाला है। वैसे भी मौसम विभाग के अनुसार अगले 72 घंटे में मानसूनी बारिश दिल्ली-NCR को तर कर देगी। इतिहास में झांकें तो आपको 26 जुलाई 2005 को डूबी मुंबई, साल 2015 में चेन्नई की बाढ़, साल 2018 में केरल की बाढ़, साल 2016 में गुड़गांव का महा-जाम याद आ जाएगा। इसके अलावा साल 2014 में श्रीनगर में आई बाढ़ भी शायद ही आप भूले होंगे।

26 जुलाई 2005 की जानलेवा बारिश
साल 2005 में मुंबईवासियों को जानलेवा बारिश का सामना करना पड़ा था। 2005 में हुई बारिश की वजह से सिर्फ मुंबई ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र के ज्यादातर इलाकों में बाढ़ जैसे हालात बन गए थे। अंदरूनी सड़कों की बात तो क्या ही करें, राष्ट्रीय राजमार्गों तक पर कई फीट पानी जमा हो गया था। बारिश और जलजमाव की वजह कई दिनों तक सड़क, रेल और हवाई यातायात प्रभावित रहा था। स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए थे। मायानगरी के लोग कई दिनों तक अपने घरों में कैद रहने को मजबूर हो गए थे। हजारों की संख्या में घरों, दुकानों, फैक्ट्रियों, कंपनियों और सब स्टेशन में पानी भरने से लोगों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा था। जुलाई 2005 की इस बाढ़ से महाराष्ट्र को 5.50 बिलियन (550 करोड़) रुपये का नुकसान झेलना पड़ा था। 26 जुलाई को लाखों की संख्या में लोग अपने ऑफिस और सड़क पर गाड़ियों में फंसे रह गए थे। 26 जुलाई को सिर्फ 24 घंटे के दौरान ही मुंबई और आसपास के इलाकों में 944 एमएम (37.17 इंच) बारिश हुई थी। अगले दिन भी बारिश का यह दौर जारी रहा था।

26 जुलाई को सुबह 8 से रात 8 बजे तक 12 घंटे के दौरान ही 25.35 इंच बारिश हुई, जिसने मुंबई की अब तक की सबसे भीषण बाढ़ की स्थिति को पैदा कर दिया। भीषण बारिश की वजह से जुलाई 2005 में (एक माह के भीतर) महाराष्ट्र में 1094 लोगों की असामायिक मौत हो गई थी। इनमें से ज्यादातर लोगों ने खुले मैनहोल और नालों की वजह से जान गंवाई थी। यही वजह है कि मुंबई में जब-जब मूसलाधार बारिश होती है, लोग 2005 की इस बारिश को याद कर कांप उठते हैं। यही वजह से हे कि पिछले कुछ दिनों से हो रही बारिश एक बार फिर मुंबईवासियों को डराने लगी है।

साल 2016 में गुड़गांव का महा-जाम
गुड़गांव ने अब तक का सबसे महा-जाम 28 और 29 जुलाई 2016 को देखा। 28 जुलाई की शाम दफ्तरों से घर की ओर निकले हजारों लोग रातभर सड़कों पर ही रहे। घर की ओर बढ़े कार, बाइक और बसों के पहिए जहां-तहां जम गए। दिल्ली-गुड़गांव एक्सप्रेसवे पर राजीव चौक और हीरो-होंडा चौक के बीच हजारों लोग फंस गए। यह जाम 12 घंटे से भी ज्यादा चला। शुक्रवार 29 जुलाई 2016 की देर रात तक ही सड़क को पूरी तरह से जाम फ्री किया जा सका।

गुरुवार 28 जुलाई 2016 की शाम हुई जोरदार बारिश की वजह से गुड़गांव जगह-जगह जलजमाव की स्थिति पैदा हुई और बादशाहपुर ड्रेन की वजह से और ज्यादा पानी शहर की सड़कों पर जमा हो गया। गुरुवार की शाम जो लोग जाम की वजह से दफ्तरों में ही रह गए थे, वे अगले दिन शाम तक दफ्तरों में ही रहे। जबकि जो लोग चार बजे के करीब घर के लिए निकल चुके थे, उन्हें सड़क पर रात गुजारने को मजबूर होना पड़ा और अगले दिन ही वो लोग घर पहुंच पाए। इस महाजाम की वजह से गुरुग्राम को 500 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ। जगह-जगह जलजमाव की वजह से स्कूलों को दो दिन तक बंद कर दिया गया।

साल 2015 में चेन्नई की बाढ़
साल 2015 में दक्षिण भारत में बारिश ने कहर बरपाया। नवंबर-दिसंबर 2015 में उत्तर-पूर्वी मानसून की बारिश ने तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई को डूबो दिया। आंध्र प्रदेश के भी कई हिस्से इस बाढ़ की चपेट में आए। इस बाढ़ ने 300 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। करीब 18 लाख लोगों को विस्थापित करना पड़ा। माना जाता है कि साल 2015 की इस बाढ़ की वजह से देश को अरबों रुपये का नुकसान झेलना पड़ा। 9-10 नवंबर 2015 को तमिलनाडु के नेवेली में 483 एमएम यानि 19 इंच बारिश हुई। कुडालोर, चिदंबरम, कांचीपुरम और चेन्नई में भी भारी बारिश का दौर जारी रहा। इस बारिश की वजह से निचले इलाकों में पानी भर गया। 13 नवंबर की सुबह 8.30 बजे तक पिछले 24 घंटे में 340 एमएम और बारिश हो गई। इससे नेटेरी लेक का तटबंध टूट गया और मंजलनीर कल्वई ड्रेन का पानी शहर की सड़कों पर भर गया। 13 नवंबर को ही कांचीपुरम में 470 एमएम बारिश हुई। लगातार बारिश और ड्रेनेज सिस्टम के फेल होने के चलते चेन्नई शहर की सड़कें पानी से लबालब भर गईं। सालों से लगातार हो रहे अवैध निर्माण और बाढ़ से निपटने की अपर्याप्त तैयारियों के चलते 13 से 17 नवंबर तक चेन्नई शहर बाढ़ में डूबा रहा। अकेले नवंबर 2019 में ही चेन्नई में 41.3 इंच बारिश हुई जो 1918 के बाद सबसे ज्यादा थी। मौसम की वजह से बारिश कम या ज्यादा हो सकती है, लेकिन बुरे वक्त के लिए तैयार रहना और लोगों को हर सुविधा मुहैया कराना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। ड्रेनेज सिस्टम ठीक होता तो यह समस्या उतनी भयावह नहीं होती, जितनी थी।

साल 2018 में केरल की बाढ़
साल 2018 में भी बाढ़ ने एक बार फिर दक्षिण भारत को परेशान किया। इस बाढ़ का मुख्य कारण भले ही काफी ज्यादा बारिश हो, लेकिन ड्रेनेज सिस्टम की कमी और अधूरी तैयारियां भी इस आपदा की एक बड़ी वजह थी। कहा जाता है कि पिछली एक सदी में यह केरल की सबसे भयावह बाढ़ थी। इस बाढ़ ने करीब 500 लोगों की जान ले ली थी। केरल के अलग-अलग इलाकों से करीब 10 लाख लोगों को विस्थापित करना पड़ा, बिल्डिंगें ध्वस्त हो गई और लोगों के घर उजड़ गए। राज्य के सभी 14 जिलों में रेड अलर्ट घोषित करना पड़ा।

केंद्र सरकार ने इसे लेवल 3 की आपदा करार दिया, यानि यह बेहद खतरनाक आपदा थी। राज्य में मौजूद 35 बांधों में से 34 के गेट पहली बार खोल दिए गए। भारी बारिश के कारण वायनाड और इडुक्की में कई जगह भूस्खलन हुआ और यह जिले राज्य के अन्य हिस्सों से कट गए। बता दें कि केरल में जितनी बारिश आमतौर पर होती है उससे 116 फीसद ज्यादा बारिश पिछले साल हुई। 8 अगस्त 2018 को पिछले 48 घंटे के दौरान 12 इंच बारिश हो चुकी थी। सभी बांध पानी से लबालब भर चुके थे। सभी बांध-तालाबों के ओवरफ्लो होने की वजह से निचले इलाके जलमग्न हो गए।

ये सभी घटनाएं भले ही अत्यधिक बारिश के कारण हुई हों। भले ही ज्यादा बारिश होने के कारण ज्यादा पानी सड़कों पर आ गया हो। अगर एजेंसियां समय रहते जाग जाती, ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त कर लिया जाता तो शायद यह त्रासदियां जितनी बड़ी दिखती हैं, उतनी बड़ी नहीं होती। हमारे पुराने शहरों में अंग्रेजों से समय का ड्रेनेज सिस्टम अब भी चल रहा है। तंग नालियां पहले ही ओवरलोड होकर ओवरफ्लो हो रही हैं, ऐसे में इस तरह की प्राकृतिक आपदा में तो वह जवाब देंगी ही। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हम बुरे वक्त के लिए तैयारी ही नहीं करते। बड़े नालों को साफ भी किया जाता है तो बरसात से ठीक एक-दो दिन पहले और उनकी गाद निकालकर नाले के किनारे ही सड़क पर फैला दी जाती है। फिर बारिश होती है और यह सारी गाद एक बार फिर उसी नाले में पहुंचकर निगम को मुंह चिढ़ाने लगती है।

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Posted By: Digpal Singh