नई दिल्‍ली (जेएनएन)। भारतीय उपमहाद्वीप में स्वच्छ जल मुहैया कराने की मानसून प्रकृति प्रदत्त व्यवस्था है। इसकी फुहारें पर्यावरण, खेती-किसानी, समाज और सरकार के साथ देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर छाप छोड़ती हैं।

उद्योगों को राहत

देश के ग्रामीण इलाकों में समृद्धि बढ़ने से उद्योग भी राहत की सांस लेते हैं। अच्छे मानसून के मद्देनजर वे अपने उत्पादों को ग्रामीण जरूरतों पर केंद्रित करते हैं।

बारिश और बाजार

कृषि पैदावार बढ़ने से कुल आबादी में दो तिहाई ग्रामीण लोगों की आय में इजाफा होता है। परिणामस्वरूप घरेलू मांग बढ़ती है। मजबूत आर्थिक परिदृश्य से शेयर बाजार का मनोबल बढ़ता है।

पर्यावरण संरक्षण 

लबालब भरे जल स्नोतों से रबी की फसलों की सिंचाई की जा सकेगी। अधिक बिजली उत्पादन से बिजली का संकट नहीं रहेगा। लिहाजा इन दोनों कारकों से डीजल से चलने वाले पंपों का इस्तेमाल सिंचाई के लिए कम ही होगा। इससे पर्यावरण तो बचेगा ही सब्सिडी के रूप में सरकार को लगने वाली चपत भी रुकेगी। 

खेती के लिए वरदान

देश की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित रही है। अब सेवा क्षेत्र ने इसे भले ही पछाड़ दिया हो, लेकिन आज भी 17 फीसद जीडीपी इसी क्षेत्र से आती है। यह क्षेत्र देश का सबसे बड़ा नियोक्ता है। करीब 60 फीसद लोग काम और आजीविका के लिए इसी पर आश्रित हैैं। देश की 49 फीसद जमीन खेतिहर है। सिंचाई के वैकल्पिक साधनों के विकास के बावजूद बड़ी मात्रा में उर्वर जमीन सिंचाई के लिए मानसून की बारिश पर आश्रित है। इसीलिए खेती का कैलेंडर मानसून के आधार पर तय होता है।

सामाजिक पहलू

भारतीय रिजर्व बैैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए एक बार कहा था कि भारत का जीवन कल्याण मानसून के प्रदर्शन पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा था कि खुद उनके करियर, उनके जीवन स्तर और उनकी मौद्रिक नीति, सब कुछ मानसून के रुख पर निर्भर है।

सरकार को राहत

बंपर पैदावार से महंगाई को लगाम लगती है। ऐसी स्थिति में अपनी वित्तीय सेहत को ठीक करने के लिए सरकार कई सब्सिडी में कटौती कर सकती है। खाद्यान्नों की कीमतें नियंत्रित रहती हैैं। आयात घटता है। लिहाजा महंगाई पर अंकुश रहता है।

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