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एमएलसी चुनाव प्रक्रिया: आज के दौर में कितनी प्रासंगिक रह गई है यह व्यवस्था?

By Mahendra Pratap SinghEdited By: Naveen Kumar
Published: Mon, 02 Nov 2026 02:02 PM (IST)

लेख विधान परिषद चुनावों में शिक्षक और स्नातक कोटे के संवैधानिक प्रावधान पर चर्चा करता है, जिसका मूल उद्देश्य कानून निर्माण में बौद्धिक भागीदारी सुनिश्चित करना था।

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संक्षेप में पढ़ें

महेन्द्र प्रताप सिंह। संविधान में शिक्षक एवं स्नातक कोटे का प्रविधान विधायिका में बौद्धिक, शिक्षित और विशेषज्ञ वर्ग की सीधी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए किया गया था। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह कोटा शिक्षा नीति, शोध, रोजगार और शिक्षकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को सदन में उठाने का एक सशक्त मंच है।

हालांकि, पिछले कुछ दशकों में धनबल के इस्तेमाल और जटिल मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया के कारण इसकी मूल गैर-दलीय भावना प्रभावित हुई है।

अब यह चुनाव उम्मीदवारों से ज्यादा राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा का विषय बन गए हैं। हाल में देश के चार राज्यों में विधानपरिषद की 28 सीटों पर हुए चुनाव भी यही दिखा रहे हैं। यह सोच कहीं पीछे छूट गई है कि राज्यों के उच्च सदन में समाज के प्रबुद्ध लोग पहुंचेंगे और कानून बनाने की प्रक्रिया में अपनी बौद्धिक क्षमता के जरिये अहम योगदान देंगे।

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इन चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी भी बहुत कम होती है। ऐसे में इस बात की पड़ताल प्रासंगिक है कि शिक्षक और स्नातक कोटे से चुने जाने वाले जन प्रतिनिधि अपनी संवैधानिक भूमिका को कितने प्रभावी तरीके से निभा रहे हैं।

भारत के संविधान में विधान परिषदों के तहत शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का प्रविधान उच्च सदन को अधिक समावेशी और विशेषज्ञता-पूर्ण बनाने के उद्देश्य से किया गया था। अनुच्छेद 171 के तहत गठित इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य और वर्तमान स्थिति का विश्लेषण इस प्रकार है।

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1. संविधान में प्रविधान का उद्देश्य: संविधान निर्माताओं का मानना था कि राज्य की नीति-निर्माण प्रक्रिया में केवल प्रत्यक्ष जन-प्रतिनिधियों (एमएलए) की ही नहीं, बल्कि प्रबुद्ध वर्ग और विषय-विशेषज्ञों की भूमिका भी अनिवार्य होनी चाहिए।

विशेषज्ञता और बौद्धिक प्रतिनिधित्व: समाज के शिक्षित और बौद्धिक वर्ग (शिक्षक और स्नातक) को कानून बनाने की प्रक्रिया में सीधा प्रतिनिधित्व देना, ताकि वे नीतिगत और शैक्षणिक सुधारों पर बिना किसी दबाव के तटस्थ सुझाव दे सकें।

शिक्षा और सामाजिक विकास पर ध्यान: विशेषकर शिक्षक कोटे से चुने गए एमएलसी का काम राज्य की शिक्षा नीति, शिक्षकों की समस्याओं, शोध और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को विधान परिषद के मंच पर उठाना था।

उच्च सदन की गरिमा और गुणवत्ता: विधान परिषद को एक विचारशील सदन के रूप में डिजाइन किया गया था, जहां केवल दलीय राजनीति के बजाय नीतियों की गुणवत्ता और जनहित पर गंभीर बहस हो सके।

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क्या ये अपनी संवैधानिक भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं?

वर्तमान परिदृश्य में इस व्यवस्था के व्यावहारिक क्रियान्वयन को लेकर मिश्रित विचार हैं। जहां एक ओर इनका महत्व कायम है, वहीं कई गंभीर चुनौतियां भी उभरकर सामने आई हैं:

सकारात्मक पहलू

शिक्षा क्षेत्र के मुद्दों की वकालत: शिक्षक एमएलसी आज भी राज्य के विश्वविद्यालयों, सरकारी व निजी स्कूलों के शिक्षकों के वेतनमान, सेवा शर्तों और प्रशासनिक विसंगतियों को सदन में प्रमुखता से उठाते हैं।

युवा व रोजगार के सवाल: स्नातक कोटे से चुने गए प्रतिनिधि युवाओं के रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और स्नातकों से जुड़ी समस्याओं पर सरकार का ध्यान आकर्षित करते हैं।

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वर्तमान चुनौतियां और विचलन

राजनीतिक दलों का अत्यधिक प्रभाव: मूल रूप से गैर-दलीय या प्रबुद्ध प्रतिनिधित्व के लिए बनाई गई यह व्यवस्था अब पूरी तरह राजनीतिक दलों की चुनावी प्रतिस्पर्द्धा का शिकार हो चुकी है। प्रत्याशी अब पार्टी सिंबल और दलीय निष्ठा के आधार पर चुने जाते हैं।

मतदाता पंजीकरण व धनबल का प्रयोग: स्नातक और शिक्षक मतदाता सूची तैयार करने में कम भागीदारी और चुनाव के दौरान धनबल तथा प्रभाव का बढ़ता प्रयोग इसकी मूल भावना को कमजोर कर रहा है।

मूल प्राथमिकताओं से भटकाव: नीतिगत सुधारों और गुणवत्तापूर्ण बहस के स्थान पर कई बार ये पद केवल राजनीतिक पुनर्वास का जरिया बन कर रह गए हैं।

सुधारों की दरकार

शिक्षक और स्नातक कोटे के एमएलसी का संवैधानिक प्रविधान अत्यंत दूरदर्शी था। हालांकि, वर्तमान में राजनीतिक हस्तक्षेप और धनबल के कारण इनकी संवैधानिक भूमिका की धार कुछ कम हुई है।

इस व्यवस्था की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया को सुगम बनाने, चुनावी पारदर्शिता बढ़ाने और निर्वाचित प्रतिनिधियों को दलीय हितों से ऊपर उठकर शिक्षा व युवा सुधारों पर केंद्रित होने की आवश्यकता है।

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