अभिषेक कुमार सिंह। अब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त के अपने एलान को अमलीजामा पहनाने की दिशा में गगनयान प्रोजेक्ट के लिए 10 हजार करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दे दी है तो सवाल उठ रहा है कि भारत ऐसा करके आखिर क्या हासिल करने जा रहा है। मोटे तौर पर इसरो का यह स्पेस अभियान तीन भारतीयों को 2022 में अंतरिक्ष में ले जाने का है। वैसे इसरो ने बीते कई दशकों में अपने रॉकेटों और उपग्रहों के अलावा मंगलयान और चंद्र मिशन से जो प्रतिष्ठा हासिल की है, उस सिलसिले में देखें तो गगनयान की जरूरत की आरंभिक वजह समझ में आ जाती है। 2022 में देश के प्रतिभावान नौजवान जब स्वदेशी अभियान की बदौलत अंतरिक्ष के भ्रमण पर होंगे तो यह उपलब्धि सिर्फ उन नौजवानों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं होगी, बल्कि इससे भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बन जाएगा जो अपने नागरिकों को स्वदेशी तकनीक के बल पर अंतरिक्ष में भेज सकता है। हालांकि यह स्वाभाविक ही है कि गननयान पर 10 हजार करोड़ रुपये के खर्च को देखते यह पूछा जाए कि क्या इसके बिना अंतरिक्ष में हमारी हैसियत को कोई बट्टा लगने वाला है या फिर स्पेस मार्केट का कोई दबाव है, जिसके लिए हमें यह साबित करने की जरूरत है कि भारत अपने दम पर इंसानों को स्पेस में भेज सकता है?

गौरतलब है कि अभी तक दुनिया में सिर्फ तीन देश हैं जिन्होंने अपने प्रयासों से नागरिकों को अंतरिक्ष में भेजा है। इसमें पहली उपलब्धि सोवियत संघ (आज के रूस) के नाम है, जिसने 1957 में दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा था। इसकी सफलता से उत्साहित सोवियत संघ ने 12 अप्रैल, 1961 को अपने नागरिक यूरी एलेकसेविच गागरिन को वोस्टॉक-1 नामक यान से स्पेस में भेजा था। इसके बाद से रूस वोस्टॉक, वोस्खोड और सोयूज यानों से करीब 74 मानव मिशनों को अंतरिक्ष में भेज चुका है। इसके बाद बारी आई अमेरिका की, जिसने 5 मई, 1961 को अपने नागरिक एलन बी शेपर्ड को प्रोजेक्ट मरकरी मिशन के तहत स्पेसक्राफ्ट फ्रीडम-7 से अंतरिक्ष में रवाना किया। उसके बाद से अमेरिकी स्पेस एजेंसी-नासा 200 से ज्यादा मानव मिशन अंतरिक्ष में भेज चुकी है। यह करिश्मा करने वालों की सूची में तीसरा देश चीन है, जिसने 15 अक्टूबर, 2003 को अपने नागरिक यांग लिवेई को शिंझोऊ-5 यान से अंतरिक्ष में भेजा था। वैसे तो इस अवधि में कई अमीर पर्यटक भी स्पेस टूरिज्म के तहत अंतरिक्ष की सैर कर चुके हैं और आने वाले वक्त में संभवत: दर्जनों लोग निजी कंपनियों की मदद से स्पेस की यात्र का आनंद ले सकेंगे, लेकिन जो बात देश का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वदेशी यानों से अंतरिक्ष में पदार्पण करने में है, उसकी तुलना नहीं हो सकती है। इस नजरिये से देखें तो 2 अप्रैल, 1984 को अंतरिक्ष में जाने वाले स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा को अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय नागरिक होने का रुतबा हासिल है, लेकिन वह रूस की मदद से उसके यान सोयूज टी-11 से अंतरिक्ष में गए थे। ऐसे में अब यदि भारत स्वदेशी प्रयासों से अपने नागरिक को अंतरिक्ष में भेजने वाला चौथा देश बनना चाहता है तो इसके लिए उसे काफी तैयारियों की जरूरत पड़ेगी।

हालांकि इसरो ने मंगलयान के अलावा अपने रॉकेटों (जीएसएलवी और पीएसएलवी) से भारी विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करके जो प्रतिष्ठा हासिल की है, उसे देखते हुए गगनयान से किसी भारतीय को स्पेस में भेजने का उसका सपना नामुमकिन नहीं लगता है। इस मिशन पर कम से कम सात दिनों के लिए यात्रियों को अंतरिक्ष में रहना होगा। इसके लिए जरूरी है कि इसरो मिशन में इस्तेमाल होने वाले रॉकेट जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लांच व्हीकल मार्क-3 (जीएसएलवी-एमके-3) से कम से कम दो मानवरहित उड़ानें कराए। इसरो के मुताबिक वह इसकी कुछ टेक्नोलॉजी विकसित कर चुका है। जैसे इसरो ने पहले ही क्रू मॉड्यूल (गगनयान) और स्केप सिस्टम का परीक्षण कर लिया है। शेष तैयारियां अगले कुछ चरणों में पूरी हो जाएंगी। दूसरी बड़ी चीज है मिशन के लिए योग्य लोगों का चुनाव। प्राय: यह तय है कि इसके लिए बनाए जाने वाले अंतरिक्ष यान में उड़ान भरने वाले अंतरिक्ष यात्री का चयन भारतीय वायुसेना द्वारा किया जाएगा और उन्हें स्पेस फ्लाइट की ट्रेनिंग विदेशों में दी जाएगी। वायुसेना के टेस्ट पायलटों की ट्रेनिंग इस तरह की होती है कि वे आसमान में ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में जाकर वापस आने की काबिलियत रखते हैं। इसरो को अभियान के लिए चुने गए लोगों को अंतरिक्ष में रहने, खाने-पीने और 7 दिन तक क्या काम करने हैं-इसके लिए ट्रेनिंग देनी होगी। स्पेस से वापस धरती पर लाना (योजना के मुताबिक तीनों अंतरिक्ष यात्री अरब सागर में लैंडिंग करेंगे) आसान नहीं होगा, क्योंकि ऐसी स्थिति में यान को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से जूझना होगा।

पर इसरो की तैयारियों और सरकार की इस बारे में दृढ़ इच्छाशक्ति के बीच स्पेस में भारत के स्वदेशी मानव मिशन पर कुछ सवाल उठने फिर भी लाजिमी हैं। एक बड़ा सवाल यह है कि क्या गगनयान से देश कुछ ठोस हासिल कर पाएगा? हाल में नासा के मंगल मिशनों (खास तौर से वहां इंसान को भेजने की योजनाओं पर) कई वैज्ञानिकों ने यह कहते हुए सवाल उठाए हैं कि ऐसे खर्चीले मिशनों की जरूरत क्या है? इसलिए गगनयान के सवाल भी अपनी जगह हैं, पर इस बारे में प्रधानमंत्री मोदी कुछ संकेत लालकिले के अपने भाषण में ही दे चुके हैं। जैसे कि उन्होंने कहा था कि हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को लेकर कुछ सपने देखे हैं। अब तक जो उपलब्धि सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन हासिल कर पाए हैं, उस तक पहुंचने का एक अभिप्राय यह है कि इससे देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र को लाभ मिलेगा, पर इससे ज्यादा बड़ी बात वह है, जिसका इशारा कई मौकों पर राजनेता और हमारे वैज्ञानिक खुद करते रहे हैं। जैसे कि दस साल तक इसरो के मुखिया रहे यूआर राव ने एक अवसर पर कहा था कि भारत को स्पेस में मानव मिशन की एक सख्त जरूरत चीन की चुनौतियों के मद्देनजर है। यानी भारत ने जल्द ही ऐसा नहीं किया तो वह अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की रेस में पड़ोसी चीन से ही मात खा बैठेगा। निकट भविष्य में अंतरिक्ष में जाने की क्षमताओं के बल पर ही किसी देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती तय होगी। इस नजरिये से देखें तो गगनयान एक सही दिशा में जाती हुई परियोजना है।

इस पूरे परिप्रेक्ष्य में दुनिया में स्पेस टूरिज्म और अंतरिक्ष के संसाधनों के दोहन को लेकर हो रही पहलकदमियों पर भी नजर डालना जरूरी है। विश्व की कई निजी कंपनियां इस कोशिश में हैं कि स्पेस टूरिज्म के सपने को साकार करते हुए लोगों को पृथ्वी की सतह से करीब सौ किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष कही जाने वाली परिधि का भ्रमण कराया जा सके और उसके बल पर अकूत कमाई का रास्ता खोला जा सके। यहां तक कि अब अमेरिकी स्पेस एजेंसी ‘नासा’ भी दो व्यावसायिक स्पेस ट्रैवल पार्टनर कंपनियों के साथ मिलकर लोगों को स्पेस की सैर कराने के उद्देश्य के साथ काम कर रही है। इनमें से एक है एलन मस्क की कंपनी ‘स्पेसएक्स’ और दूसरी विमानन कंपनी ‘बोइंग’। आने वाले कुछ वर्षो में स्पेस टूरिज्म के बेहद आम हो जाने का अनुमान है। ऐसे में भारत यदि मानव मिशन पर आगे बढ़ने की बात कर रहा है तो इसका एक मकसद स्पेस टूरिज्म से देश के लिए पूंजी जुटाना भी हो सकता है।

(लेखक एफएसआइ ग्लोबल से संबद्ध हैं)

Posted By: Kamal Verma

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