नई दिल्ली, अनुराग मिश्र/विवेक तिवारी। कोविड-19 महामारी ने हमें कई तरह से नुकसान पहुंचाया है। एक तरफ जहां इस महामारी ने दुनिया भर में लाखों लोगों की जान ली, वहीं जो लोग इस वायरस की चपेट में आने से बच गए उन्हें ही कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। रिसर्च जनरल लैंसेट में छपी एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड महामारी के दौरान लोगों के इलाज के लिए बड़े पैमाने पर ऐसी दवाओं का इस्तेमाल किया गया जिनकी जरूरत भी नहीं थी। वहीं ज्यादा दवाएं लेने से लोगों में रोगाणुरोधी प्रतिरोधक (AMR) क्षमता काफी कम हो गई है। ऐसे में बहुत से लोग ऐसी बीमारियों से मर रहे हैं जो सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं से ठीक हो जाती थीं। लेकिन अब इन सामान्य एंटी बायोटिक दवाओं ने काम करना ही बंद कर दिया है। सबसे ज्यादा मुश्किल ऐसे मरीजों के सामने है जो महंगी एंटीबायोटिक दवाएं नहीं खरीद सकते हैं। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर क्रिस्टोफर मुरे और उनके सहयोगियों ने अपने अध्ययन के जरिए पूरी दुनिया में लोगों में रोगाणुरोधी प्रतिरोधक (AMR) क्षमता में आई कमी का आकलन करने और इस समस्या का समाधान खोजने का प्रयास किया।

कोविड-19 और टीबी के बाद इस वजह से जा रही सबसे अधिक लोगों की जान

रिसर्च में शामिल वैज्ञानिकों ने 2019 में 204 देशों के अलग अलग क्षेत्रों में 23 रोगजनकों (बैक्टीरिया, वायरस, या ऐसे सूक्ष्म जीव जो हमें बीमार करते हैं) से हुई बीमारियों पर 88 एंटीबायोटिक ड्रग कॉम्बिनेशन के असर पर अध्ययन किया। इस अध्ययन के तहत एक स्थिति में सभी दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों को दवा-संवेदनशील संक्रमणों से बदल दिया गया था, और एक जिसमें सभी दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों को बिना किसी संक्रमण वाले मामलों से बदल दिया गया था। इस अध्ययन में आधार पर क्रिस्टोफर मुरे और उनके सहयोगियों ने अनुमान लगाया कि 2019 में औसतन 1·27 मिलियन (95% अनिश्चितता अंतराल 0·911–1·71) मौतों का अनुमान लगाया, जो दवाओं के सीधे प्रतिरोध के कारण हुई, जो लगभग वैश्विक एचआईवी मौतों (680 000)7 और मलेरिया से हुई मौतों (627 000) के समान है।

इस अध्ययन से पता चलता है कि एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा होने से मरने वाले लोगों की सुख्या कोविड-19 और टीबी के बाद सबसे ज्यादा है। एम्स के डॉक्टर अमित कुमार डिंडा का कहना है कि लोगों को ये समझना चाहिए की कोविड 19 एक वायरस है और एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया पर असर करती हैं। कोई भी एंटीबायोटिक दवा बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं लेनी चाहिए। अलग अलग एंटीबायोटिक दवा का अलग अलग नेचर है। कोई एंटीबायोटिक ज्यादा लेने पर किडनी को नुकसान पहुंचता है तो किसी से लीवर या किसी अन्य शरीर अंग को। एंटीबायोटिक दवाएं लेने से आपके पाचनतंत्र में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया मर जाते हैं। इससे आपको खाने की इच्छा नहीं होती है।

इसलिए पैदा होती है समस्या

यह वो दवाएं हैं जो किसी मरीज की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। लेकिन जब इन जीवनरक्षक दवाओं का स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेधड़क इस्तेमाल किया जाता है, तो वो एक बड़ी समस्या पैदा कर देती है। धड़ल्ले से इन्हें लेने से कवक, वायरस, और परजीवी, इन एंटीबायोटिक्स दवाओं के लगातार संपर्क में आने के कारण अपने आप को इन दवाओं के अनुरूप ढाल लेते हैं। नारायणा सुपरस्पेशलिटी अस्पताल के डॉ. तुषार तायल के मुताबिक एक एंटी बायोटिक को जरूरत से ज्यादा खाने से कुछ समय बाद शरीर पर उसका असर खत्म होने लगता है। इसलिए एक ही एंटी बायोटिक का इस्तेमाल बिना वजह नहीं करना चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि कोरोना एक वायरस है। एंटाबायोटिक बैक्टीरिया पर काम करती है। वायरस इंफेक्शन में इसकी जरूरत नहीं होती है। अगर डॉक्टर सही समझते हैं कि मरीज में सेंकेडरी बैक्टीरियल इंफेक्शन हो रहा है तो वो एंटी बायोटिक की सलाह दे सकते हैं।

ये हैं बचाव का तरीका

2019 में वैश्विक स्तर पर बैक्टीरियल (AMR) से जुड़ी 4·95 मिलियन (3·62–6·57) मौतों के अध्ययन से पता चलता है कि बैक्टीरियल इंफेक्शन से बचाव का सबसे बेहतर तरीका है कि जहां से ये इंफेक्शन होने की संभावना है, वहीं पर इसे रोक दिया जाए। इस अध्ययन में शामिल किए गए प्रमुख जीवाणु रोगजनकों में से केवल न्यूमोकोकल निमोनिया को टीकाकरण के माध्यम से रोका जा सकता है। इन्फ्लूएंजा, रेस्पिरेटरी सिंकाइटियल वायरस और रोटावायरस सहित वायरल रोगजनकों से बचाव के लिए लगाए जाने वाले टीक इलाज की जरूरत को कम करने में प्रभावी हो सकते हैं, जिससे अनुचित एंटीबायोटिक खपत को कम किया जा सकता है। उच्च आय वाले देशों में, बेहतर पानी और स्वच्छता, सार्वजनिक स्वास्थ्य , और अस्पताल की स्वच्छता प्राथमिक तरीके रहे हैं जिनसे संक्रमणों को नियंत्रित किया गया है, लेकिन आर्थिक प्रगति के बावजूद प्रगतिशील या गरीब देशों में ऐसा कर पाना संभव नहीं हो सका है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक और अनुचित उपयोग की समस्या पूरी दुनिया में देखी जा रही है। वहीं बहुत से देशों में एंटीबायोटिक दवाओं की कमी के बावजूद ये समस्या बनी हुई है। न्यूमोकोकल निमोनिया एंटीबायोटिक दवाओं के जरिए इलाज से आसानी से ठीक की जा सकती है। लेकिन उप-सहारा अफ्रीका में कुछ एंटी बैक्टीरियल रजिस्टेंस शायद एंटीबायोटिक दवाओं तक अपर्याप्त पहुंच और उच्च संक्रमण स्तरों के कारण है। जबकि दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका में, यह एंटीबायोटिक दवाओं की अच्छी पहुंच के साथ भी उच्च प्रतिरोध के कारण है। दो-तिहाई से ज्यादा मौतें फ्लोरोक्विनोलोन और बीटा-लैक्टम एंटीबायोटिक्स (कार्बापेनेम्स, सेफलोस्पोरिन, और पेनिसिलिन) सहित एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोध के कारण हुई हैं। रिसर्च में शामिल वैज्ञानिकों के मुताबिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध की वास्तविक स्थिति इस अध्ययन के अनुमान से अधिक हो सकता है। सर्जरी, कीमोथेरेपी, अंग प्रत्यारोपण और अन्य तरह के इलाज के लिए आधुनिक चिकित्सा में प्रभावी एंटीबायोटिक दवाओं की आवश्यकता होती है। बिना प्रभावी एंटीबायोटिक दवाओं के बेहतर इलाज संभव नहीं है।

भविष्य की चेतावनी

क्रिस्टोफर मुरे ने ई-मेल के माध्यम से कहा कि यदि इस पर अभी ध्यान नहीं दिया गया तो 2050 तक इसके कारण हर साल करीब एक करोड़ लोगों की जान जा सकती है। हालांकि देखा जाए तो इससे सम्बंधित मौतों का आंकड़ा अभी ही 49.5 लाख पर पहुंच चुका है। ऐसे में यह समस्या कितनी तेजी से अपने पैर पसार रही है उसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। दिल्ली मेडिकल काउंसिल की साइंटिफिक कमेटी के चेयरमैन डॉक्टर नरेंद्र सैनी कहते हैं कि ज्यादा एंटीबायोटिक लेने पर वैक्टीरिया में उसके लिए रजिस्टेंस पैदा हो जाता है। ऐसे में बैक्टीरिया के संक्रमण पर जब ये एंटीबायोटिक दी जाएगी, तो ये काम ही नहीं करेगी। 90 फीसदी बुखारों के इलाज के लिए एंटीबायोटिक की जरूरत पड़ती ही नहीं है, जबकि कोरोना तो एक वायरस है। ऐसे में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल कोरोना में किया जाना आपके शरीर को नुकसान पहुंचाएगा।

भारत में ऐसे हालात

भारत में एंटीबायोटिक का उपयोग तेजी से बढ़ा है, पिछले एक दशक के दौरान उनके प्रति व्यक्ति उपयोग में लगभग 30% की वृद्धि हुई है। स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स एंटीबायोटिक्स 2021 की रिपोर्ट इस बात की तसदीक करती है। चीन, भारत, ब्राजील और केन्या में यह इस्तेमाल सबसे अधिक है। सेल ऑफ 'एंटीबायोटिक्स एंड हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन इन इंडिया ड्यूरिंग द कोविड-19 पेंडेमिक रिपोर्ट के अनुसार 2020 में भारत में एंटीबायोटिक दवाओं की कुल 1629 करोड़ डोज बिकी। यह 2018 और 2019 में बेची गई डोज की तुलना में कुछ कम हैं। वहीं वयस्क में 2018 में एंटीबायोटिक का प्रयोग 72.6 फीसद बढ़ गया और 2019 में 72.5 फीसद से 2020 में 76.8 फीसद हो गया। इसके अतिरिक्त, भारत में वयस्कों के लिए एज़िथ्रोमाइसिन की बिक्री 2020 में 5.9 प्रतिशत थी। 2019 में इसकी सेल 4.5 फीसद थी तो 2018 में इसकी बिक्री 4 फीसद थी। यह एंटीबायोटिक्स के उत्तरोतर बढ़ते इस्तेमाल को दर्शाता है। इसके अलावा सांस की बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाला डॉक्सीसाइक्लिन और फेरोपेन की बिक्री भी इस दौरान काफी बढ़ गई।

Edited By: Tilakraj