यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 11, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
किशनगंगा प्रोजेक्ट पर विश्व बैंक के रुख से भड़का भारत
किशनगंगा प्रोजेक्ट पर भारत ने विश्व बैंक के निर्णय को कानूनन अस्वीकार्य बताया है।

नई दिल्ली (पीटीआई)। किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजना से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति और कोर्ट ऑफ आरबिट्रेशन (सीओए) गठित करने के विश्र्व बैंक के फैसले का भारत ने कड़ा विरोध किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने इस समानांतर व्यवस्था को कानूनी तौर पर अस्वीकार्य करार दिया है।
भारत जम्मू-कश्मीर में 330 मेगावाट क्षमता वाला जलविद्युत संयंत्र लगा रहा है। इसके लिए किशनगंगा नदी (पाकिस्तान में नीलम नदी) के पानी को झेलम नदी के बेसिन में लाया गया है। पाकिस्तान इसे बाधित करने के लिए अलग-अलग हथकंडे अपनाता रहा है। अब उसने प्रोजेक्ट के डिजाइन पर आपत्ति जताई है।
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भारत ने निराकरण के लिए विश्व बैंक से तटस्थ विशेषज्ञ नियुक्त करने आग्रह किया था, जबकि पाकिस्तान ने सीओए गठित करने की मांग की थी। विश्र्व बैंक ने आश्चर्यजनक रूप से दोनों की मांगें स्वीकार करते हुए समानांतर व्यवस्था कर दी। वर्ष 1960 के सिंधु जल समझौते के तहत किसी भी मतभेद के समाधान के लिए एक ही समय में दो समानांतर तंत्र स्थापित नहीं किए जा सकते हैं। भारत ने इसके आधार पर विश्व बैंक के कदम की आलोचना की है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने गुरुवार को कहा, 'विश्व बैंक ने दो सामानांतर प्रक्रिया पर एक साथ आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। भारत ऐसी किसी भी व्यवस्था का हिस्सेदार नहीं बन सकता जो सिंधु जल समझौते के प्रावधान के अनुरूप न हो। विकल्पों पर विचार कर भविष्य में उचित कदम उठाए जाएंगे।' स्वरूप ने बताया कि यह मामला निष्पक्ष तकनीकी विशेषज्ञ के दायरे में आता है।
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क्या हैं प्रावधान
सिंधु जल समझौते में भारत और पाकिस्तान के बीच साझा नदियों से जुड़े विवादों को सुलझाने का प्रावधान किया गया है। विश्व बैंक भी एक पार्टी है। प्रारंभिक स्तर पर तकनीकी आपत्तियों के निदान के लिए स्थायी आयोग (पीआइसी) गठित करने की व्यवस्था है। आपत्ति के मतभेद में बदलने पर तटस्थ विशेषज्ञ नियुक्त करने का प्रावधान है।
इसके बावजूद समाधान नहीं निकलने की स्थिति में सात सदस्यीय सीओए गठित करने की व्यवस्था है। सिंधु जल समझौते में इसका स्पष्ट उल्लेख है कि निष्पक्ष विशेषज्ञों के अस्तित्व में रहने की स्थिति में अन्य प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती है। पाकिस्तान को सीओए में साल 2013 में मुंह की खानी पड़ी थी।
