इंदौर, जेएनएन। मैं इंदौर हूं। मध्य भारत मेरा पता है। मुझे कारोबार का मिनी मुंबई माना जाता है। देश का एक ऐसा एजुकेशन हब जहां आईआईटी और आईआईएम दोनों हैं। खुशनुमा मौसम और खानपान के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हूं। देश के अलग-अलग हिस्सों से जो भी आता है मुझे छोड़ कर जाना नहीं चाहता।

अब उस बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर बात करते हैं जिसने बीते दो वर्षों में मुझे सफलता और सम्मान के शिखर पर पहुंचाया। दरअसल, ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब बहुत कुछ होते हुए मुझे बेतरतीब, गंदा और कस्बाई माना जाता था। करीब दो-ढाई साल पहले मेरी नगर निगम और नगर के नागरिकों ने कंधे से कंधा मिला कर अथक परिश्रम के चलते मेरा कायापलट किया। आज मैं देश का सबसे स्वच्छ शहर हूं।

2 अक्टूबर 2014 में जब स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ था तो स्वच्छता सर्वेक्षण में मेरा स्थान 149वीं पायदान पर था। महज ढाई साल में मेरा नाम पहले नंबर पर पहुंच गया। लगातार दूसरी बार 2018 के राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण में भी मुझे सम्मान हासिल हुआ। वही शहर, वही नगर निगम, वही कर्मचारी और वही सरकारी सिस्टम...और देखते ही देखते बदल गई मेरी तस्वीर और तकदीर।राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण के पीछे की सोच स्पष्ट होते ही महापौर मालिनी गौड़ और तत्काशलीन नगर निगम आयुक्त मनीष सिंह सहित जनप्रतिनिधियों ने नए सिरे सफाई का मॉड्यूल तैयार करने की कवायद शुरू की।तब सवाल भी उठा कि निगम के पास न इतने संसाधन हैं, न मैन पॉवर। सफाई कैसे होगी?

 

 

मनीष सिंह के मुताबिक, सबसे पहले शहर के हर हिस्से को साफ-स्वच्छ बनाने की योजना के लिए उन दिनों के हालात का विश्लेषण किया गया। मुझे गंदगी मुक्त बनाने के अभियान के लिए अधिकारियों से लेकर सफाइकर्मियों और कचरा वाहनों के चालकों की टीम बनाई गई। दिन-रात काम शुरू हुआ। निगम ने अपने संसाधनों का आकलन किया। निगम कर्मचारियों की सूची बनाई तो पता चला सैकड़ों कर्मचारी ड्यूटी पर आते ही नहीं। इस पर सख्ती की गई और 700 से ज्यादा नियमित और अस्थाई कर्मचारियों को या तो निलंबित किया गया या नौकरी से बाहर कर दिया गया।

कबाड़ बताकर गैरेज में खड़ी कर दी गईं निगम की गाड़ियों को निकालकर सुधारा गया। मात्र 200 वाहनों से व्यवस्था शुरू करने के बाद दो साल में निगम के पास 700 से ज्यादा गाड़ियां हैं। कुल मिलाकर कचरे के निस्तारण के लिए नई व्यवस्था की जरूरत साफ दिखाई दी। निगम ने शहर से कचरा पेटियां हटाने का निर्णय लिया। इसकी सफलता घर-घर कचरा कलेक्शन मॉडल की सफलता पर ही निर्भर थी। कचरा इकट्ठा कर ट्रेंचिंग ग्राउंड में जमा किया जाता है। वहां खाद बनाने में इसका इस्तेमाल होता है। कुछ इलाकों में कचरा कलेक्शन सफल रहा तो पहले उन इलाकों से पेटियां हटाई गई। बाद में पूरे शहर से कचरा पेटियां हटा दी गईं। इस निर्णय को सबसे ज्यादा सराहा गया।

इसके अलावा मुझे खुले में शौच से मुक्त करने में भी निगम ने प्रशासन के साथ मिलकर पूरी कवायद की। खुले में शौच करने वालों को प्रताड़ित करने के बजाय उनकी मानसिकता बदलने के प्रयास हुए। मनीष सिंह बताते हैं कि सड़कों पर जगह-जगह डस्टबिन है। लोगों को जागरूक बनाए रखने के लिए शहर को स्वच्छता के बैनर पोस्टर से पाट दिया गया, वॉल पेंटिंग्स बनाई गई हैं।जगह-जगह टॉयलेट्स की व्यवस्था की गई।

मुझे यह बताते हुए बेहद खुशी महसूस हो रही है कि एक बहुत बड़े जन-जागरण अभियान की शुरुआत की गई जिसमें राजनैतिक नेतृत्व के साथ ही गणमान्य नागरिक शामिल हुए।कोशिशें तेज हुईं और अंततः कामयाबी मिली। सांसद और लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन के मुताबिक, ऊंचाई पर पहुंचना कठिन है, लेकिन उस पर बने रहना उससे भी बड़ी चुनौती है।

सफल शहरों से सीखें : सफाई व्यवस्था

शहर को बेहतर बनाने के लिए विशेषज्ञों और जिम्मेदार अफसरों ने अपनी राय दी है। शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर को महत्वपूर्ण मानते हुए उन्हें सुधारने के सुझाव दिए हैं। शहरों में अच्छी सड़कों की जरूरत महसूस की जा रही है। साथ ही कई शहरों में साफ पीने का पानी नहीं मिल रहा है। यह भी देखा जा रहा है कि विकास की दौड़ में हम पर्यावरण का ख्याल नहीं रख पा रहे है और अंधाधुंध तरीके से पेड़ काटने में जुटे हैं। शहर का कूड़ा एक विकराल समस्या बन गया है। सही तरीके से निस्तारण न होने से यह बीमारियों को जन्म दे रहा है। कई शहरों में फुटपाथ का अभाव दिख रहा है जिसके कारण पैदल यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

  

By Krishan Kumar