यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 13, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
न हो कानून का दुरुपयोग, कुछ महिलाएं एक हथियार के रूप में कर रहीं इसका इस्तेमाल
जिस प्रकार समाज में महिलाओं के सम्मान सुरक्षा और गरिमा की बात की जाती है। उसके उतने ही हकदार पुरुष ...और पढ़ें

नई दिल्ली, सुनीता मिश्र। हाल में दिल्ली की एक अदालत ने दुष्कर्म के एक मामले में छह साल बाद आरोपी अर्नब गांगुली को बरी कर दिया। 25 फरवरी, 2016 को काल सेंटर संचालक गांगुली पर उन्हीं के आफिस में काम करने वाली एक युवती ने दुष्कर्म का आरोप लगाया था, जिसे वह अदालत में साबित नहीं कर पाई। इसके बाद अदालत ने पीड़ित को इस आरोप से मुक्त कर दिया, लेकिन दुष्कर्म के झूठे आरोप ने गांगुली के व्यापार और उनकी निजी जिंदगी को पूरी तरह से खत्म कर दिया। जेल जाने के बाद उनका व्यापार ठप हो गया, पत्नी ने तलाक दे दिया और सदमे में मां का देहांत हो गया। इन छह वर्षों में उन्हें जो पीड़ा और कष्ट उठाना पड़ा है, उसकी भरपाई कौन करेगा?
देश में महिलाओं को तमाम तरह के अपराधों दुष्कर्म, शारीरिक-मानसिक शोषण, प्रताड़ना और घरेलू हिंसा से बचाने के लिए कई कानूनी कवच दिए गए हैं। ये कानून उनके हितों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं, ताकि उन्हें उनका हक और इंसाफ मिल सके, लेकिन कुछ महिलाएं इन कानूनों का धड़ल्ले से दुरुपयोग कर रही हैं। दुष्कर्म महिलाओं के खिलाफ होने वाले सबसे जघन्य और घिनौने अपराधों में से एक है। भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत किसी महिला के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाना दुष्कर्म की श्रेणी में रखा गया है। अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो वह इस कानून की नजर में दोषी है और उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का प्रविधान है। हालांकि इसका इस्तेमाल महिलाएं एक हथियार की तरह कर रही हैं।
पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें अधिकतर महिलाओं ने कानून का दुरुपयोग कर पुरुषों को दुष्कर्म के झूठे आरोपों में फंसाया है। अगर प्रेमी शादी से इन्कार कर दे तो उस पर दुष्कर्म का मुकदमा और पड़ोसी से झगड़ा हो तो उस पर छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया जाता है। वहीं जब यह विवाद शांत हो जाता है तो महिलाएं अदालतों में अपने बयान से ही पलट जाती हैं।
इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि आज भी तमाम महिलाएं दुष्कर्म, छेड़छाड़ और प्रताड़ना का शिकार हो रही हैं। यहां तक कि दुष्कर्म के बाद उनकी हत्या तक कर दी जाती है। इससे संरक्षण प्रदान करने के लिए ही कानून में सख्त प्रविधान किए गए हैं, लेकिन अब कानून के बढ़ते दुरुपयोग ने महिलाओं के प्रति संदेह की दृष्टि को बढ़ा दिया है, जिसके कारण उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है। अब समय आ गया है कि दुष्कर्म के झूठे आरोपों का सामना कर रहे पुरुषों की सुरक्षा और उनकी प्रतिष्ठा बहाल किए जाने के लिए सख्त से सख्त कानून बनाए जाएं। जिस प्रकार समाज में महिलाओं के सम्मान, उनकी सुरक्षा और गरिमा की बात की जाती है। उसके उतने ही हकदार पुरुष भी हैं।
(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)