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ममता ने हाथ से बनाया था ‘जोड़ा घास फूल’ का निशान, इंदिरा गांधी के पुराने केस से क्यों जुड़ा EC का फैसला?

Published: Fri, 18 Sep 2026 11:46 PM (IST)Updated: Sat, 19 Sep 2026 02:17 AM (IST)

चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न 'जोड़ा घास फूल' को फ्रीज कर दिया है, जिससे ममता ...और पढ़ें

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HighLights

  1. दो गुटों के दावे के बीच चिह्न हुआ फ्रीज

  2. इंदिरा गांधी के मामले में बहुमत बना था आधार

राज्य ब्यूरो, कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न 'जोड़ा घास फूल' से ममता बनर्जी का पुराना जुड़ाव रहा है। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस बनाने के समय ममता ने खुद इस प्रतीक की रूपरेखा हाथ से तैयार की थी।

टीएमसी का चुनाव चिह्न

दो फूलों को एक ही डंठल और जड़ से जुड़ा दिखाने वाले इस प्रतीक को पार्टी की एकता के विचार से जोड़ा गया था। अब करीब 28 वर्ष बाद चुनाव आयोग ने तृणमूल के नाम और इसी चुनाव चिह्न को अंतरिम रूप फ्रीज यानी इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दिया है। आयोग के इस कदम के बाद मौजूदा विवाद की तुलना 1969 के कांग्रेस विभाजन और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़े चुनाव चिह्न विवाद से की जा रही है।

दो गुटों के दावे के बीच चिह्न हुआ फ्रीज

गुरुवार शाम में पार्टी का नाम व चिन्ह फ्रीज होने के बाद देर रात ममता बनर्जी के गुट ने चुनाव आयोग को ईमेल के जरिये नए पार्टी नामों और उपलब्ध चुनाव चिह्नों की अपनी पसंद भेजी। दूसरे गुट ने भी अपनी पसंद आयोग को भेजी। इसके बाद आयोग ने दोनों पक्षों के बीच मूल पार्टी और चुनाव चिह्न पर अंतिम निर्णय होने तक ‘अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ नाम तथा ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी।

फिलहाल ममता बनर्जी के गुट को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'फुटबॉल खिलाड़ी' चुनाव चिह्न मिला है, जबकि अरूप राय और ऋतव्रत बनर्जी के गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'लिफाफा' चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। ये व्यवस्थाएं 6 अक्टूबर को राज्य की दो विधानसभा सीटों नंदीग्राम और रेजीनगर में होने वाले विधानसभा उपचुनाव के लिए लागू हैं।

इंदिरा गांधी के मामले में बहुमत बना था आधार

आयोग ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि उपलब्ध समय में यह तय करना संभव नहीं है कि दोनों में से वास्तविक पार्टी कौन है। ऐसे विवादों पर चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत फैसला किया जाता है। इसी प्रावधान के तहत 1969 में कांग्रेस के विभाजन के दौरान इंदिरा गांधी के गुट और दूसरे गुट के बीच पार्टी तथा चुनाव चिह्न को लेकर विवाद हुआ था।

इन तीन कसौटियों पर विचार

उस समय आयोग ने पार्टी के उद्देश्य एवं लक्ष्य, संविधान और संगठन में बहुमत समर्थन-इन तीन कसौटियों पर विचार किया था। पहले दोनों कसौटियों से स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकल सका। तीसरी कसौटी में इंदिरा गांधी के गुट के पास पार्टी के अधिक सांसदों, विधायकों और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिक सदस्यों तथा प्रतिनिधियों का समर्थन पाया गया।

जनवरी 1971 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को वास्तविक कांग्रेस मानते हुए 'दो बैलों की जोड़ी' चुनाव चिह्न दिया गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी आयोग के फैसले और उसकी इस तरह के विवाद में निर्णय लेने की शक्ति को बरकरार रखा था।

तृणमूल की राजनीतिक यात्रा में अहम रही है चुनाव चिह्न की भूमिका

1998 में ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद से ही 'दो फूलों के साथ घास' चुनाव चिह्न ने पार्टी के सफर में अहम भूमिका निभाई है। तृणमूल में बगावत के बाद पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न जब्त किए जाने की नौबत आई है। जून में 58 विधायकों ने ममता गुट के उम्मीदवार सोवनदेब चट्टोपाध्याय की जगह पार्टी से निकाले गए नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता चुन लिया।

तृणमूल के 28 साल के इतिहास में यह पहली फूट थी। पांच दिन बाद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 20 लोकसभा सदस्यों ने भी बगावत का झंडा उठा लिया और कम जानी-पहचानी एनसीपीआइ का दामन थाम लिया।

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