विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 31, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Malegaon Blast Case: पांच जज, दो एजेंसियां और 17 साल का लंबा इंतजार; पढ़ें मालेगांव विस्फोट की टाइमलाइन

By Agency Edited By: Piyush Kumar
Published: Thu, 31 Jul 2025 10:40 PM (IST)Updated: Thu, 31 Jul 2025 10:52 PM (IST)

मालेगांव बम विस्फोट मामले में मुकदमे के दौरान जांच एजेंसियां और न्यायाधीश बदलते रहे जिससे कार्यवाही धीमी हो गई। पहले ...और पढ़ें

हाराष्ट्र के मालेगांव में 2008 के बम विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा बरी।(फोटो सोर्स: जागरण ग्राफिक्स)
हाराष्ट्र के मालेगांव में 2008 के बम विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा बरी।(फोटो सोर्स: जागरण ग्राफिक्स)

पीटीआई, मुंबई : महाराष्ट्र के मालेगांव में 2008 के बम विस्फोट मामले में लगभग 17 वर्ष तक चले मुकदमे के दौरान न केवल जांच एजेंसियां बदलीं, बल्कि इस दौरान पांच अलग-अलग न्यायाधीशों ने मामले पर सुनवाई की।

शुरुआत में मामले की जांच महाराष्ट्र एटीएस ने की थी, जिसने 'अभिनव भारत' समूह के सदस्य रहे दक्षिणपंथी चरमपंथियों पर दोष मढ़ा था। बाद में जांच एनआइए को सौंप दी गई, जिसने ठाकुर को क्लीन चिट दे दी थी।

अदालत ने क्या कहा? 

हालांकि, अदालत ने प्रथम दृष्टया सुबूतों का हवाला देते हुए उनके विरुद्ध मुकदमा चलाया। यह मामला 2008 से 2025 के बीच पांच न्यायाधीशों की नजरों से गुजरा। विस्फोट के पीड़ितों और आरोपितों दोनों ने न्यायाधीशों के बार-बार बदले जाने को मुकदमे की धीमी गति और लंबी देरी का कारण बताया।

विस्फोट के कई पीड़ितों के अधिवक्ता शाहिद नदीम ने स्वीकार किया कि जजों के बार-बार तबादले से मुकदमे में वास्तव में बाधा आई। भारी-भरकम रिकॉर्ड के कारण हर नए न्यायाधीश को नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ी, जिससे प्रक्रिया में और देरी हुई।

सुनवाई करने वाले पहले विशेष न्यायाधीश वाईडी शिंदे थे। उन्होंने प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित और अन्य आरोपितों की प्रारंभिक रिमांड को लेकर फैसले दिए थे।

न्यायाधीश शिंदे के बाद विशेष न्यायाधीश एसडी टेकाले ने 2015 से 2018 तक इस मामले की सुनवाई की, जब तक कि वार्षिक न्यायिक नियुक्तियों के दौरान उनका तबादला नहीं हो गया। न्यायाधीश टेकाले ने ही प्रज्ञा ठाकुर को क्लीन चिट देने के एनआइए के फैसले को खारिज कर दिया था।

इसके बाद विशेष न्यायाधीश वीएस पडलकर ने कार्यभार संभाला और अक्टूबर, 2018 में ठाकुर, पुरोहित और पांच अन्य के विरुद्ध औपचारिक रूप से आरोप तय किए। उनके कार्यकाल में पहले गवाह से पूछताछ के साथ मुकदमा आधिकारिक रूप से शुरू हुआ।

न्यायाधीश पीआर सित्रे ने 2020 में पडलकर की सेवानिवृत्ति के बाद उनका स्थान लिया। कोविड-19 महामारी के कारण मुकदमे में कुछ समय के लिए रुकावट आई। लेकिन न्यायाधीश सित्रे ने अपने एक वर्ष से थोड़े अधिक समय के कार्यकाल में 100 गवाहों से पूछताछ की। जब 2022 में न्यायाधीश सित्रे का तबादला होना था, तो विस्फोट पीडि़तों ने बांबे हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता को पत्र लिखकर तबादले पर रोक लगाने की मांग की थी।

न्यायाधीश सित्रे के तबादले के बाद विशेष न्यायाधीश एके लाहोटी ने जून, 2022 में मुकदमे की सुनवाई अपने हाथ में ले ली। अप्रैल, 2025 तक न्यायाधीश लाहोटी ने सुनवाई जारी रखी। अप्रैल में जब उनका नासिक तबादला होना था, तब पीडि़तों ने हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को फिर से पत्र लिखकर तबादले पर रोक लगाने का अनुरोध किया। उनकी याचिका पर न्यायाधीश लाहोटी का कार्यकाल अगस्त, 2025 के अंत तक बढ़ा दिया गया।

यह भी पढ़ें- समझौता एक्सप्रेस से मक्का मस्जिद धमाके तक.... ऐसे गढ़ी गई हिंदू आतंकवाद की कहानी; अदालत में खुल गई पोल