नई दिल्ली, जेएनएन। पाकिस्तान में कट्टरता किस तरह से हावी है उसका सबसे बड़ा गवाह है 9 अक्टूबर। यह देश के इतिहास का सबसे बड़ा काला दिन है। पाकिस्तान में कट्टरपंथियों द्वारा महिलाओं, अल्पसंख्यकों और उनके हक के लिए लड़ने वालों की आवाज को दबाने के लिए आज का दिन यानी 9 अक्टूबर को याद किया जाता है। 

आज ही के दिन साल 2012 में यहां के चरमपंथियों ने एक 15 साल की किशोरी की आवाज को दबाने की कोशिश की थी। इस किशोरी का नाम है मलाला यूसुफजई। मलाला को बेरहम तालिबानी आतंकियों ने गोली मार दी थी। मालाला का कसूर बस इतना था कि उन्होंने देश में लड़कियों की शिक्षा के लिए आवाज बुलंद की थी।  

सिर पर गोली मारी

मलाला स्कूल से घर लौट रही थीं, तभी उनपर हमला हुआ, दहस्तगर्दों ने उनके सिर पर गोली मारी थी। वे चाहते थे कि महिलाओं के हक के लिए उठी आवाज हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो जाए, लेकिन मलाला का हौंसला इससे भी नहीं टूटा। ब्रिटेन में उनका काफी लंबे समय तक इलाज चला, मलाला फिर से ठीक हो गईं और फिर इस अभियान में जुट गईं। 

सबसे कम उम्र में नोबेल

मलाला को इस साहस के लिए विश्व के सर्वोच्च सम्मान नोबेल सम्मानित किया गया। वो सबसे कम उम्र में नोबेल जीतने वाली इंसान हैं। मलाला को यह सम्मान साल 2014 में मिला था। इसी  मलाला आतंकियों के बच्चों को भी शिक्षा देने की बात करती है। उनका मानना है कि वह शिक्षा और शांति के महत्व को जाने और कट्टरता से दूर रहें।     

कश्मीर पर बयान देकर चर्चा में आईं मलाला  

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद मलाला ने कश्मीर की स्थिति पर चिंता व्यक्त की थी। मलाला की यह चिंता कथित मानवाधिकार उल्लंघन पर थी। इसके बाद उनकी काफी आलोचना हुई। दरअसल, उन्होंने ऐसी बातें तब की जब पाकिस्तान इसे लेकर भारत के खिलाफ झूठ फैलाने की कोशिश में लगा हुआ है। 

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Posted By: Tanisk

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