शिवानंद द्विवेदी। कोरोना की त्रासदी के बीच लाखों श्रमिक जैसे-तैसे गांवों की तरफ जा रहे हैं। मजबूरी का पहिया पहनकर कुछ पांव पैदल ही अपने गांव के लिए कूच कर चुके हैं। जो अभी तक नहीं पहुंचे हैं, वो पहुंचने की छटपटाहट में हैं। आपदा से उपजी इस स्थिति को ‘पलायन’ कहा जा रहा है, किंतु यह पलायन नहीं है। पलायन वह था जब आंखों में आशाओं की चमक लेकर ‘रोजी’ की खोज में ये अनाम लोग गांव से महानगरों की तरफ निकले थे। गत सात दशकों में हमसे बड़ी चूक यही हुई कि उस पलायन पर हमने कभी चिंता नहीं महसूस की।

हमने नहीं सोचा कि किसी श्रमिक को श्रम की तलाश में अपने गांव-घर से हजारों किमी दूर ही जाने की मजबूरी क्यों है? खैर, शहरों से गांव लौटने की लालसा में कांधे पर बैग बांध कर निकले लोगों की संख्या इतनी बड़ी हो चुकी है कि सरकारों के तमाम प्रयास और समाज के बहुस्तरीय सहयोग के बावजूद भी सभी को उनके घर पहुंचा पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। लिहाजा इस स्थिति ने देश को वेदना और संवेदना के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। श्रमिकों की गांव वापसी को लेकर कुछ सवाल लोगों के जेहन में हैं। संवेदना के इस वातावरण में भय और चिंता यह है कि क्या अब कोरोना शहरों से आ रहे लोगों के माध्यम से गांवों तक फैलेगा?

चूंकि शुरुआती स्थिति में यह दिख भी रहा है कि श्रमिकों के गांव की तरफ जाने के बाद कई जिले ग्रीन जोन से येलो या रेड जोन बनने की स्थिति में आ गये हैं। हालांकि यह एक तकनीकी पक्ष है। इसका व्यावहारिक पक्ष अलग है। श्रमिक वापसी की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ जिलों का ग्रीन जोन से येलो या रेड जोन हो जाना, इस बात का द्योतक नहीं है कि कोरोना का प्रसार गांवों में हो गया है। चूंकि इन क्षेत्रों में ज्यादातर संक्रमित मामले वहीं आये हैं, जो लोग महानगरों से लौटे हैं। प्रसार के लक्षण व्यापक रूप में नजर नहीं आये हैं।

दरअसल शहरों की तुलना में कोरोना प्रसार की तीव्रता के लिहाज से गांव अधिक सुरक्षित हैं। वहां का जनसंख्या घनत्व महानगरों की तुलना में बहुत कम है। जहां इस महामारी के एकमात्र स्थापित बचाव तरीके शारीरिक दूरी को ज्यादा प्रभावी रूप से अमल में लाया जा सकता है। एक और कारण है, जो गांवों में कोरोना के व्यापक प्रसार की संभावना को कम करता है। दरअसल भारत के गांवों का रहन-सहन कृत्रिम बसावट की तरह न होकर सामाजिक बुनावट वाला ज्यादा है।

उदाहरण के लिए देखें तो 5 एकड़ जमीन पर बसाए गये किसी शहरी आवासीय सोसायटी में यदि 500 परिवार रहते हैं तो वे आपस में 80 फीसद तक एक-दूसरे को नहीं जानते हैं, किंतु इसके उलट 4 वर्ग किमी के किसी गांव में यदि 5000 हजार लोग भी रहते हैं तो वे दूसरे को उसके नाम, चेहरे, परिवार तथा पेशे तक से परिचित होते हैं। इस मामले में भी महानगरों की तुलना में गांव कोरोना के खिलाफ अधिक सतर्कता और अनुशासन बरतने में सक्षम साबित हो सकते हैं। निर्विवाद है कि कोरोना के खिलाफ यह सामूहिकता की लड़ाई है।

ऐसे में अब बड़ी जिम्मेदारी गांव और ग्रामीण कस्बों के कंधों पर आई है। गांव चाहें तो कोरोना के खिलाफ इस चुनौती को कुछ हद तक आसान कर सकते हैं। जैसा कि देखा गया है कि कोरोना संक्रमित ज्यादातर मरीजों को अधिक उच्च संसाधनयुक्त इलाज, मसलन वेंटीलेटर, ऑक्सीजन इत्यादि, की जरूरत नहीं पड़ रही बल्कि उन्हें पृथक रखने की चुनौती ज्यादा बड़ी है। ऐसे में महानगरीय अस्पताल एक सीमा तक ही इस भार को वहन कर पायेंगे। उस सीमा के पार स्थिति ऐसी हो सकती है कि लोगों को पृथक रखने के लिए भी बेड उपलब्ध

नहीं हो सकेंगे।

लिहाजा ग्रामीण जिलों के स्वास्थ्य संसाधन का कोरोना संक्रमितों के अलग रखने तथा उनकी बुनियादी इलाज में यदि उपयोग हो पाता है तो महानगरीय अस्पतालों का भार साझा होगा। वहीं गांव इस मामले में भी महानगरों की तुलना में अधिक सक्षम हैं कि वहां रोजी का संकट भले है किंतु ‘रोटी’ का संकट महानगरों जैसा नहीं है। जैसा कि हम देख रहे हैं कि जो लोग बाहर से गांव जा रहे हैं उनमे से ज्यादातर गांव के बाहर किसी भवन या बाग-बगीचे में कुछ दिनों के लिए रह रहे हैं। उन्हें उनके घर से जरूरत की चीजें उपलब्ध हो जा रही हैं।

इस लिहाज से भी गांव महानगरों की तुलना में इस लड़ाई में अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं। यह लड़ाई सामजिक चेतना और सामूहिकता की है। सरकारें ‘राज्य’ की सुरक्षा करती हैं, सभ्यताओं की लड़ाई समाज के दम से ही लड़ी और जीती जा सकती है। अब यह दायित्व गांवों का है कि वो इस लड़ाई में महानगरों की तुलना में अधिक सतर्कता, संयम तथा अनुशासन का परिचय दें। गांव जीतेगा तभी कोरोना हारेगा। कोरोना से विजय के इस मार्ग में आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत के उभरने के संकेत भी छिपे हैं।

(सीनियर रिसर्च फेलो, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली)

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