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'इस्लाम धर्म अपनाकर नहीं कर सकते पिछड़े वर्ग के मुस्लिम होने का दावा', मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

By Mala DixitEdited By: Sakshi Gupta
Published: Fri, 26 Jun 2026 10:36 PM (IST)

मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि धर्म परिवर्तन करने से पिछड़ा वर्ग मुस्लिम के तहत आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।

मद्रास हाई कोर्ट का धर्म परिवर्तन से आरक्षण पर अहम फैसला (फाइल फोटो)

मद्रास हाई कोर्ट का धर्म परिवर्तन से आरक्षण पर अहम फैसला (फाइल फोटो)

HighLights

  1. मद्रास हाई कोर्ट ने धर्म परिवर्तन से आरक्षण पर अहम फैसला सुनाया।

  2. इस्लाम अपनाने वालों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम आरक्षण नहीं मिलेगा।

  3. तमिलनाडु सरकार का संबंधित आदेश कोर्ट ने असंवैधानिक बताया।

माला दीक्षित, नई दिल्ली। मद्रास हाई कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि धर्म परिवर्तन करने से आरक्षण नहीं मिलता।

इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल 'मुस्लिम' बनता है, वह किसी विशेष पिछड़े मुस्लिम समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता।

मद्रास हाई कोर्ट का फैसला

कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि धर्म परिवर्तन करने मात्र से किसी व्यक्ति को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम के तहत आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता।

इसके साथ ही मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के सरकारी आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद कर दिया है, जिसमें धर्म परिवर्तन करने वालों को बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के रूप में मान्यता देने का प्रावधान किया गया था।

यह फैसला भविष्य में इसी तरह के मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है और देशभर में धर्म परिवर्तन तथा आरक्षण की नीति पर नई बहस को जन्म दे सकता है। ये महत्वपूर्ण फैसला न्यायमूर्ति जीआर स्वामिनाथन और पीबी बालाजी की पीठ ने 25 जून को दिया।

कोर्ट ने घोषित किया कि इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति पिछड़े वर्ग के मुस्लिम का दर्जा नहीं मांग सकता। कोर्ट ने कहा कि वह केवल एक मुस्लिम है और बस इतना ही है।

क्या है मामला?

हाई कोर्ट ने यह फैसला एक ऐसे मामले में दिया है जिसमें एक व्यक्ति जिसका जन्म हिंदू परिवार में हुआ था और बाद में उसने इस्लाम अपना लिया था और अपना नाम बदल कर समीर अहमद रख लिया।

इस्लाम अपनाने के बाद उसने स्वयं को मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का सदस्य बताते हुए पिछड़ा वर्ग प्रमाण पत्र की मांग की थी। लेकिन तहसीलदार ने आवेदन खारिज कर दिया,जिसके बाद उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

इस मामले में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तमिलनाडु सरकार के तीन मार्च 2024 के आदेश (जीओ) को आधार बनाया था। जिसमें आरक्षित श्रेणियों से धर्मान्तरित लोगों को तमिलनाडु में अधिसूचित सात पिछड़े वर्ग के मुस्लिम समूहों में से एक से संबंधित होने का सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी किया जा सकता था।

तमिलनाडु सरकार ने अपने आदेश में यह प्रविधान किया था कि अनुसूचित जाति , अन्य पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग या डी-नोटिफाइड समुदायों से आने वाले व्यक्ति यदि इस्लाम धर्म अपनाते हैं, तो उन्हें भी बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के रूप में आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है।

सरकार का तर्क था कि इससे धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे और सामाजिक संतुलन बना रहेगा। लेकिन, हाई कोर्ट ने ये दलील खारिज करते हुए कहा कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि विभिन्न संवैधानिक श्रेणियों जैसे एससी,ओबीसी और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) को एक साथ मिलाकर नई श्रेणी बनाना संविधान के मूल ढांचे के विपरीत है।

कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के ही पुराने 1951 के जी. माइकल बनाम वेंकेटेश्वरन फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि जब कोई हिंदू, इस्लाम अपनाता है तो सिर्फ मुसलमान बन जाता है, और मुस्लिम समाज में उसकी जगह इस आधार पर तय नहीं होती कि धर्म बदलने से पहले वह किस जाति का था।

उस फैसले में ये भी कहा गया था कि किसी जाति या उपजाति का सदस्य जब इस्लाम अपनाता है, तो वह किसी भी जाति का सदस्य नहीं रह जाता।

हाई कोर्ट ने कहा कि इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने कई फैसलों में मंजूरी दी है और सी. सेलवरानी का फैसला तो 26 नवंबर 2024 को सुनाया गया था यानी राज्य सरकार के जारी इस जीओ के बाद। हाई कोर्ट ने कहा कि जी. माइकल का फैसला इस्लामी धर्मशाष्त्र के अनुरूप है।

कोर्ट ने कहा कि ईसाई मिशनरियों और इस्लामिक उपदेशकों ने सदियों तक यह प्रचार किया है कि उनके धर्मों में सामाजिक समानता है, जबकि हिन्दू धर्म में जाति व्यवस्था एक बुनियादी विशेषता है। धर्म परिवर्तन के लिए ऐसा रुख अपनाने के बाद, यह कहना बेइमानी होगी कि इस्लाम में भी ऊंच-नीच या श्रेणी भेद है।

कोर्ट ने कहा कि हमारी राय में कुछ समुदायों को पिछड़ा और कुछ को अगड़ा मानना कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है। इस्लाम एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें सब बराबर हों।

पीठ ने कहा कि मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 75 साल पहले कहा था कि इस्लाम अपनाने पर व्यक्ति मुस्लिम बन जाता है। खंडपीठ ने 'सिर्फ एक मुसलमान' शब्द का इस्तेमाल किया था। कोर्ट ने कहा कि उसे किसी खास पंथ या समुदाय में नहीं बांधा जा सकता जो केवल जन्म से ही मिल सकता है।

पीठ ने कहा कि जब खंडपीठ द्वारा उस समय तय किया गया सिद्धांत लागू है तो उसे केवल सरकारी आदेश (जीओ) जारी करके नहीं बदला जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कार्यपालिका (सरकार) के पास न्यायालय के निर्णयों को निष्प्रभावी करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने जीओ को गैर कानूनी घोषित कर दिया।

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