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'न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार, जज कोई पवित्र गाय नहीं'; मद्रास HC की तल्ख टिप्पणी

Published: Thu, 28 May 2026 08:33 AM (IST)

मद्रास हाई कोर्ट ने एक तमिल फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की याचिका खारिज करते हुए न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात ...और पढ़ें

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को मद्रास हाईकोर्ट ने किया स्वीकार (फाइल फोटो)

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को मद्रास हाईकोर्ट ने किया स्वीकार (फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मद्रास हाई कोर्ट ने तमिल फिल्म पर बैन लगाने वाली याचिका को खारिज करते हुए न्यायपालिका को लेकर बेहद सख्त और बेबाक टिप्पणी की है। मद्रास हाई कोर्ट ने इस बात को स्वीकार किया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार मौजूद है और जजों को 'पवित्र गाय' की तरह नहीं माना जाना चाहिए।

जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायणन की बेंच ने कहा कि कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है। पहले भी भ्रष्ट जज थे और आज भी हैं... हम जानते हैं और हमें न्यायिक भ्रष्टाचार के मामले देखने को मिले हैं। ऐसे भ्रष्ट जजों को हाई कोर्ट की फुल कोर्ट नियमित रूप से बाहर का रास्ता दिखाती है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार को अक्सर बार (वकीलों के समूह) के सदस्य बढ़ावा देते हैं और हाई कोर्ट हमेशा भ्रष्ट लोगों को पकड़ने और स्थिति से उचित तरीके से निपटने के लिए कड़ी नजर रखता है।

भष्ट्र लोगों को पकड़ने के लिए हाई कोर्ट की कड़ी नजर

जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायणन की बेंच ने कहा, "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार तब तक नहीं हो सकता, जब तक बार के कुछ सदस्य भ्रष्ट लोगों के साथ न मिल जाएं। हाई कोर्ट की कड़ी नजर ही वह मुख्य जरिया है जिससे भ्रष्ट लोगों को पकड़ा जाता है और स्थिति से उचित तरीके से निपटा जाता है।"

कोर्ट ने आगे कहा, "जजों को 'पवित्र गाय' की तरह नहीं माना जाना चाहिए। न्याय कोई छिपी हुई चीज नहीं है, उसे आम लोगों की जांच-परख और सम्मानजनक, भले ही बेबाक टिप्पणियों का सामना करने की अनुमति दी जानी चाहिए।"

क्या है पूरा मामला?

गौरतलब है कि याचिकाकर्ता ने उस तमिल फिल्म पर बैन लागने के लिए कोर्ट का दरवाया खटखटाया है, जिसमें फिल्म के एक सीन में एक जज को रिश्वत लेते और नशीले पदार्थों का सेवन करते हुए दिखाया गया। उसने तर्क दिया कि ऐसे सीन संविधान के खिलाफ हैं और जजों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाते हैं। उसने यह भी तर्क दिया कि फfल्म के डायरेक्टर, बालाजी ने बिना सोचे-समझे भारतीय न्यायिक व्यवस्था की आलोचना की है।

हालांकि, कोर्ट ने इस बात से सहमति जताई कि व्यवस्था को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, लेकिन उसने यह भी कहा कि तमिल सिनेमा में हर चीज को नाटकीय अंदाज़ में दिखाना आम बात है। इसे कलात्मक स्वतंत्रता बताते हुए कोर्ट ने कहा कि कलाकार को किसी भी स्थिति को अपने तरीके से पेश करने का अधिकार है। फिल्म कला की एक रचना है। कलाकार के पास खुद को ऐसे तरीके से व्यक्त करने की अपनी आज़ादी होती है, जो कानून में मना न हो।

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