सदगुरु शरण। बात ज्यादा पुरानी नहीं है, जब मध्य प्रदेश सरकार ने लव जिहाद के खिलाफ सख्त कानून बनाकर इस गंभीर समस्या और इसके समाधान के प्रति देश का ध्यान आकृष्ट किया था। कहा जा सकता है कि इस पहल से कई अन्य राज्य प्रेरित हुए और उसी तर्ज पर कानून बनाया। उम्मीद जगी थी कि सरकार की सचेष्टता से बेटियों के खिलाफ इस घृणित साजिश पर अंकुश लग सकेगा, पर पिछले कुछ महीनों का अनुभव और लव जिहाद की लगभग हर दिन नई वारदात से स्पष्ट है कि प्रदेश का गृह विभाग इस कानून को अपेक्षानुसार धार देने में विफल साबित हुआ। जब कानून बना था तो लव जिहादियों के हमदर्द यह आशंका जता रहे थे कि इसका दुरुपयोग किया जाएगा, पर कानून लागू होने के बाद इस आशय की एक भी शिकायत नहीं सुनाई दी। कोई संवेदनशील सरकार किसी कानून के दुरुपयोग की अनुमति नहीं दे सकती। अच्छी बात है कि कानून के दुरुपयोग की कोई शिकायत नहीं आ रही, पर इसका सदुपयोग तो होना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य का गृह विभाग अपनी पुलिस को कानून की मंशा का वास्तविक संदेश देने में विफल रहा है।

इंदौर में अफजल नामक एक शातिर लव जिहादी ने गोलू नाम रखकर एक किशोरी को प्रेमजाल में फंसाया। उसे धोखा देकर अपने साथ ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद उसे रुपये-गहने समेट लाने के लिए उसके घर वापस भेजा तो परिवारजनों ने उसे पकड़ लिया और एफआइआर करवाने थाने गए। लव जिहाद के इतने स्पष्ट मामले में पुलिस ने यह तर्क देकर महज छेड़छाड़ की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया कि किशोरी मत परिवर्तन का आरोप नहीं लगा रही है। बाद में सामाजिक संगठनों के तमाम प्रयास के बाद पुलिस ने इसे लव जिहाद का मामला माना। ऐसा लगभग हर मामले में होता है। पुलिस लव जिहाद के स्पष्ट मामलों को भी संबंधित कानून की धाराओं में दर्ज करने में आनाकानी करती है। इसका परिणाम सामने है। प्रदेश में सख्त कानून के बावजूद लव जिहाद की घटनाएं जारी हैं।

पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी मध्य प्रदेश के लगभग साथ ही यह कानून अस्तित्व में आया, पर वहां इसे अधिक प्रभावशाली ढंग से लागू किया गया, लिहाजा लव जिहाद की घटनाओं में कमी दिख रही है। मध्य प्रदेश के नजरिये से पुलिस का यह रवैया इसलिए भी चिंताजनक माना जाना चाहिए, क्योंकि प्रदेश में अधिकतर आदिवासी जिले छलपूर्वक मतांतरण करवाने वाले संगठनों और लव जिहादियों के निशाने पर हैं। शायद इसे ध्यान में रखकर ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने सख्त कानून बनवाया, यद्यपि इसके अपेक्षित परिणाम आने बाकी हैं। हिंदू लड़कियों को लव जिहाद में फांसकर उनका छलपूर्वक मतांतरण करवाना और उनका जीवन बर्बाद कर देना इस साजिश का मकसद है। मध्य प्रदेश में लव जिहाद के हजारों मामले सामने आ चुके हैं। इसके बावजूद इस पर कड़ाई से अंकुश लगाने में गृह विभाग की उदासीनता हैरतअंगेज है। यह परिस्थिति इसलिए भी विचित्र है, क्योंकि मध्य प्रदेश को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के तमाम फैसलों की वजह से कन्या-हितैषी राज्य माना जाता है।

अपनी बहुचर्चित लाड़ली लक्ष्मी योजना और ऐसी कई अन्य योजनाओं की वजह से शिवराज सिंह को स्नेहपूर्ण मामा संबोधन हासिल है। इसके बावजूद प्रदेश की तमाम लड़कियां लव जिहाद के जाल में फंसकर प्रताड़ित हो रही हैं। प्रदेश के गृह विभाग को समझना चाहिए कि लव जिहाद एक घृणित अभियान है, इसलिए उसका मुकाबला भी अभियान चलाकर ही किया जा सकता है। इस कानून के क्रियान्वयन के लिए भी वैसी ही राजनीतिक इच्छाशक्ति अपेक्षित है, जैसी कुछ महीने पहले इस कानून के गठन के वक्त परिलक्षित हुई थी। यह आवश्यक है कि प्रदेश सरकार इस कानून के पिछले कुछ महीनों के अनुभव की समीक्षा करे और इसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया के सूराख की पहचान करे। इसके लिए प्रदेश सरकार उचित समझे तो अन्य राज्यों, खासकर उत्तर प्रदेश के माडल का अध्ययन भी कर सकती है।

कानून से आगे समाज की भी अहम भूमिका है। दोनों पक्षों के मान्य संगठनों और व्यक्तियों को मिल-बैठकर विचार करना चाहिए कि यह राष्ट्र और समाज विरोधी समस्या किस तरह मिटाई जा सकती है। लव जिहाद मध्य प्रदेश समेत सभी राज्यों में सामाजिक सद्भाव के लिए बड़ा खतरा साबित हो रहा है। इससे पहले कि हालात पूरी तरह बेकाबू हो जाएं, समाज और सरकार को मिल-जुलकर इसे नियंत्रित कर लेना चाहिए। सिर्फ मध्य प्रदेश के संदर्भ में देखें तो यह इसलिए भी जरूरी है, ताकि यह प्रदेश बेटियों के लिए सर्वाधिक सुरक्षित प्रदेश के रूप में यशस्वी बना रहे।