रुमनी घोष, नई दिल्लीः देशभर में विजयादशमी का त्योहार श्रीराम द्वारा रावण के वध के बाद विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है। बंगाल में दुर्गोत्सव के आखिरी दिन मां दुर्गा के विसर्जन के बाद दशहरा मनाया जाता है, लेकिन बंगाल के श्रीरामपुर (अपभ्रंश के रूप में सेरामपुर भी कहते हैं) जिले के गोस्वामी राजपरिवार की परंपरा अनूठी है। यहां दशहरे के दिन देवी दुर्गा के विसर्जन के बाद उसी मंडप में श्रीराम की पूजा होती है। प्रभु श्रीराम का रूप भी यहां अनूठा है। राजपरिवार अपने कुल देवता राधामाधव को उसी वेदी पर स्थापित करते हैं जिस पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित थी। दशमी के दिन माधव (कृष्ण) श्रीराम के वेश में होते हैं और उनके हाथ में बांसुरी के बजाय धनुष होता है। लगभग 338 वर्ष पुरानी इस परंपरा को श्रीरामपुर राज परिवार के सदस्य पीढ़ी दर पीढ़ी निभाते आ रहे हैं।

नौवीं पीढ़ी सहेज रही परंपरा

इस वर्ष भी यहां दुर्गोत्सव का आयोजन इसी परंपरा के साथ हर्षोल्लास से हो रहा है। परिवार की नौवीं पीढ़ी के सदस्य देवज्योति अधिकारी पेशे से व्यवसायी हैं। व्यापार के सिलसिले में वह श्रीरामपुर के साथ हैदराबाद में भी काफी समय बिताते हैं, लेकिन पूजा के समय पूरा परिवार इसी पैतृक निवास में आ जाता है। वह बताते हैं कि नई पीढ़ी में से बहुत से लोग पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में विदेश में रह रहे हैं। विश्व में जो जहां भी हो, पूजा के दौरान हम सभी यहां पर लौट आते हैं। यह क्रम कभी किसी ने नहीं तोड़ा, यही वजह है कि पुरानी पीढ़ी अपने रीति-रिवाजों से नई पीढ़ी को अवगत करवाती रही और यह पंरपरा अब तक न सिर्फ चली आ रही है बल्कि उसी तरह से निभाई जा रही है, जैसी शुरू हुई थी।

डिजिटल संसार से भी जोड़ा

अपनी पंरपरा को जीवित रखने के साथ दुनिया के साथ साझा करने के लिए देवज्योति ने 'श्रीरामपुर गोस्वामी राजपरिवार' नाम से फेसबुक पेज भी बनाया है। जिसमें उन्होंने इस पंरपरा का दस्तावेजीकरण भी किया है। देवी मंडप में श्रीराम की पूजा हमारे परिवार की अनूठी पंरपरा है। मैंने या मेरे पूर्वजों ने कभी ऐसा सुना नहीं कि इस तरह की पंरपरा का कहीं और पालन होता है। राधामाधव की जिस मूर्ति को स्थापित किया जाता है, वह भी उतनी ही वर्ष पुरानी है, जितनी यह पूजा। माधव की मूर्ति कोष्टि पाथोर (काला पत्थर) से निर्मित है, जिसका वजन 65 किलोग्राम है। वहीं राधा की मूर्ति अष्टधातु से बनी है और इसका वजन 45 किलोग्राम है। दोनों मूर्तियों की पूजा के बाद दूसरे दिन इन्हें पुन: पूजा घर में स्थापित कर दिया जाता है।

सिंदूर खेला अलग तरह से

बंगाली समुदाय में देवी विसर्जन से पहले सिंदूर खेला की पंरपरा विश्वप्रसिद्ध है। इंटरनेट युग में इसका खूब प्रचार-प्रसार भी हो चुका है, लेकिन इसकी पंरपराएं भी अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से निभाई जाती हैं। मान्यता है कि देवी दुर्गा मायके (धरती) से ससुराल (कैलास पर्वत) लौटने से पहले सबसे मिलती हैं। सुहागिनें उनसे सुहाग की रक्षा का आशीर्वाद लेकर अगले वर्ष के लिए लौट जाती है। गोस्वामी परिवार में भी यह परंपरा है, लेकिन यहां सुहागिन महिलाएं सिंदूर खेलने से पहले मछली खाती हैं। फिर मुंह में पान रखकर मां दुर्गा का पूजन-अभिनंदन करती हैं। उसके बाद कनकाजंलि की परंपरा निभाई जाती है। जैसे विवाह में बेटी घर से विदा होते वक्त माता-पिता की झोली में चावल डालती है, उसी तरह मां दुर्गा भी इस धरती की गोद में धन-धान्य बिखेर कर जाती हैं। ताकि सभी प्रसन्न रहें उसके बाद विसर्जन होता है।

वर्ष 1684 में खर्च किए थे 50 रुपये

गोस्वामी परिवार के एक और सदस्य शिवाशीष गोस्वामी बताते हैं कि हमारे पास उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार वर्ष 1684 में रामगोविंद गोस्वामी द्वारा इस पूजा मंडल की स्थापना की गई थी। उस समय पूजा के आयोजन में 50 रुपये खर्च हुए थे। जो आज के लाखों रुपये के बराबर माने जाते हैं। गोस्वामी परिवार की अपनी पूजा विधि की पुस्तक है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होती आ रही है। कंप्यूटर आने से पहले तक तो इसके संरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए हर पचास वर्ष में इसे नए सिरे से लिखकर तैयार करते थे। अब दस्तावेज कंप्यूटराइज करने साथ मूल प्रति को भी संरक्षित कर रहे हैं।

श्रीराम ने षष्ठी को की थी देवी पूजा

बंगाली पंरपराओं के विशेषज्ञ नृसिंह प्रसाद भादुड़ी रघुनंदन भट्टाचार्य के स्मृति तत्व का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि रावण ने देवी कालिका की साधना कर उन्हें प्रसन्न किया। शरद ऋतु में पंचमी के दिन जब श्रीराम युद्ध मैदान में पहुंचे तो उन्हें रावण देवी कालिका की गोद में दिखाई दिया। उसी वक्त श्रीराम ने धनुष रख दिया और तय किया कि उन्हें युद्ध जीतने के लिए देवी दुर्गा का आव्हान करना है। षष्ठी को उन्होंने दुर्गापूजन शुरू किया। तभी इसी दिन से बंगाल में दुर्गोत्सव का शुभारंभ होता है। नवमी के दिन 108 कमल के फूलों से पूजा कर श्रीराम ने देवी को प्रसन्न किया। उसके बाद वह युद्ध मैदान में पहुंचे और दशहरे के दिन रावण का वध किया।

एंटनी फिरंगी जैसे गायकों का गान

बंगाल में दुर्गोत्सव सिर्फ धार्मिक पंरपरा ही नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, सासंकृतिक और आर्थिक उत्थान का भी माध्यम है। गोस्वामी परिवार की पूजा में शाम को ख्यात गायकों ने भी अपना कार्यक्रम पेश किया। इसमें एंटनी फिरंगी भी शामिल हैं। वर्ष 1786 में जन्मे पुर्तगाली मूल के इस कवि का मूल नाम हेंसमैन एंथनी था। 19वीं सदी के शुरुआती दिनों में वह भारत आए और बंगाल के चंदननगर कस्बे में रहने लगे। एक हिंदू विधवा सौदामिनी से शादी कर वह पूरी तरह बंगाली रंग में रंग गए। धीरे-धीरे वह काली और दुर्गा को समर्पित भजनों को संगीत देने लगे। उनके आगमनी गीत दुर्गा पूजा के अवसर पर आज भी बजाए जाते हैं।

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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