लंबे अंतराल के बाद हुए SIR के कारण मतदाता सूची से बड़ी संख्या में कटे नाम, नए नियम भी बने वजह
विपक्षी दलों द्वारा मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा लंबे अंतराल के बाद हुए एसआईआर और 2012 के नियमों में बदलाव का परिणाम है।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) का विरोध कर रहे विपक्षी दलों की ओर से बार बार 13 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा दिया जा रहा है। जिसमें मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट और डिसप्यूटेड शामिल है। लेकिन एक बड़ी बात जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है कि 21 साल के अंतराल न हुआ होता तो संभवत: आंकड़े भी कम ही आते।
जिस एसआईआर को शुरूआत में हर पाच साल में कराने की परंपरा रही थी, वह 1984 के बाद सात आठ साल के अंतराल पर चला गया और 2004 के बाद से तो इसे लगभग भुला ही दिया गया था। इसी बीच 2012 में ईआरओ हैंडबुक में कुछ ऐसे परिवर्तन किए गए जिसके कारण मृत या स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं के नाम हटाने का काम भी लगभग रुक चुका था।
पहले भी कोई बार हो चुका है एसआईआर
एसआईआर 2025 से पहले आठ बार हो चुका है। जो 2004 तक यह लगातार पांच से सात सालों के अंतराल में होता आया है। इसका क्रम तब टूटा, जब 2012 में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को शुद्ध रखने के लिए एसआईआर की जगह सालाना होने वाले विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसएसआर) को प्राथमिकता दी। जिसके चलते पिछले 22 सालों से मतदाता सूची को सिर्फ एसएसआर के जरिए ही दुरुस्त करने की खानापूर्ति की गई है।
नतीजा यह रहा है कि दो दशकों में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में मृत, स्थानांतरित व दोहरे मतदाताओं की भरमार हो गई। जो देश के अलग-अलग राज्यों में हो रहे एसआईआर के दौरान सामने आ रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि ऐसे नामों को एसएसआर के दौरान क्यों नहीं हटाया गया। तो इसके पीछे भी कई बड़ी वजह सामने आयी है।
पहला एसआईआर के दौरान जहां घर-घर मतदाताओं की जांच होती है, जिसमें मृत, स्थानांतरित, दोहरे मतदाताओं की पहचान आसानी से हो जाती थी। जबकि एसएसआर के दौरान मतदाता सूची का पुनरीक्षण घर-घर जाकर नहीं होता है बल्कि मतदान केंद्र पर मतदाताओं या परिवार को लोगों को आकर यह बताना होता है, कि कौन मृत हो गया है या कौन स्थानांतरित हो गया है। मतदाता सूची में गड़बड़ियों के बढ़ने की शुरूआत यहीं से हुई।
2012 में नियम में हुई थी बदलाव
इसमें भी 2012 में दिक्कत तब खड़ी हो गई जब तत्कालीन चुनाव आयोग ने ईआरओ हैंडबुक में नामों को हटाने को लेकर बड़ा बदलाव कर दिया। हालांकि आयोग ने इस व्यवस्था को पारदर्शिता के लिहाज से की थी लेकिन ये ही मतदाता सूची में गड़बड़ियों के बढ़ने की बड़ी वजह बन गया। इसके चलते मृत मतदाताओं के नामों को हटाने के लिए आवेदन के साथ प्रमाण पत्र मांगा जाने लगा। जिससे लोग कतराने लगे।
ऐसे में मृतकों के नाम बने ही रहे। वहीं इस बदलाव में स्थानांतरित होने वाले मतदाताओं के नियम भी कड़े कर दिए। जिसमें मतदाता का नाम जब तक स्थानांतरित जगह पर दर्ज नहीं हो जाता था और उसकी सूची राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के जरिए मुहैया नहीं करायी जाती थी, जब मूल जगह से नाम नहीं हटता था।
वहीं यदि कोई स्थानांतरित होने पर नामों को हटाने के लिए आवेदन करता था तो उससे पहले दूसरा जगह जहां रहने गए है, वहां किरायानामा, बिजली का बिल आदि की मांग की जाती थी। हुआ यह कि लोग इस कागजी जंजाल से बचने लगे।
नतीजतन स्थानांतरित होने के बाद भी बड़ी संख्या में लोगों के नाम दो जगहों पर बने रहे। 2012 से पहले बीएलओ या परिवार के लोगों की सूचना पर ही हटा दिया जाता था। साथ ही ड्राफ्ट सूची मतदान केंद्र पर चस्पा कर दी जाती थी। आपत्ति होने पर सुनवाई के नोटिस भेजा जाता था।
पहले कब-कब हुआ एसआईआर
| क्रम | वर्ष |
|---|---|
| पहली बार | 1952 |
| दूसरी बार | 1957 |
| तीसरी बार | 1961 |
| चौथी बार | 1965-66 |
| पांचवीं बार | 1983-84 |
| छठवीं बार | 1987-89 |
| सातवीं बार | 1992-95 |
| आठवीं बार | 2002-04 |
मतदाता सूची को शुद्ध रखने की क्या है व्यवस्था
लोक प्रतिनिधित्व कानून 1950 के तहत मतदाता सूची का पुनरीक्षण तीन तरह से हो सकता है। इनमें सघन पुनरीक्षण, जिसमें घर-घर जाकर जांच होती थी, दूसरा- संक्षिप्त पुनरीक्षण- यह वार्षिक प्रक्रिया थी, जो मतदान केंद्र पर ही संचालित होती थी, तीसरा- विशेष पुनरीक्षण- आयोग जब चाहे, जिस क्षेत्र में मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए ऐसे अभियान चला सकता है।
अब तो आयोग मतदाता सूची में नामों को जोड़ने की अभियान लगातार जारी रखता है। जिसमें एक जनवरी, एक अप्रैल, एक जुलाई और एक अक्टूबर की तारीख में जिस अवधि में 18 साल की उम्र पूरी हो, तब नाम जुड़वा सकता है।
