नई दिल्ली। ये पहला मौका नहीं है जब किसी मामले में एक साथ 4 दोषियों को फांसी दी जा रही है। इससे पहले 1983 में मुंबई की यरवदा जेल में एक साथ 4 दोषियों को फांसी दी जा चुकी है। अब ये दूसरा मौका होगा जब किसी जघन्य अपराध के लिए एक साथ 4 दोषियों को फांसी पर लटकाया जाएगा। निर्भया मामला तो कभी को याद है क्योंकि इस मामले में सुनवाई होती रही है। एक समय था जब निर्भया मामले में इंसाफ की मांग को लेकर युवाओं की भीड़ रायसीना हिल (राष्ट्रपति भवन) तक पहुंच गई थी। इंडिया गेट पर सजावट के लिए लगाए गए खंभों पर लोग चढ़ गए थे। इनकी मांग निर्भया के दोषियों को फांसी की सजा देने की थी। पूरे देश में आक्रोश था, अब उसका रिजल्ट आया है। 

कौन थे जोशी और अभयंकर?

31 अक्टूबर 1976 - जोशी केस

मुंबई की विजयनगर कॉलोनी के अच्युत जोशी अपने परिवार के साथ रहते थे। इन चारों ने 31 अक्टूबर की रात को उन पर हमला किया था। इन चारों ने चाकू के बल पर जोशी को अपने घर पर रहने के लिए मजबूर किया। जोशी और उनकी पत्नी उषा घर पर अकेली थी। इन चारों ने दंपति के हाथ और पैर बांध दिेए, उसके बाद चारों ने नायलॉन की रस्सी से जोशी का गला घोंट दिया और उनकी पत्नी की भी हत्या कर दी। जब इनका किशोर बेटा आनंद घर आया, तो उन्होंने उसके पूरे कपड़े उतार दिए और और नायलॉन की रस्सी से उसका भी गला घोंट दिया। उसके बाद इन लोगों ने वहां से एक मंगलसूत्र, एक घड़ी और कई हजार रुपये सहित जरूरी सामान चुरा लिए।

1 दिसंबर 1976 - अभयंकर केस

1 दिसंबर 1976 को रात लगभग 8 बजे इन चारों ने अभयंकर से संबंधित भंडारकर रोड पर स्मृति बंगले पर हमला किया। घर में पांच लोग थे, इसी में संस्कृत के विद्वान काशीनाथ शास्त्री अभ्यंकर (उम्र 88), उनकी पत्नी इंदिराबाई (उम्र 76), उनकी नौकरानी सकुबाई वाघ (60 वर्ष), पोती जुई (20 वर्ष) और पोता धनंजय (19 वर्ष) रह रहे थे। इन चारों ने बंगले पर पहुंचने के बाद वहां घंटी बजाई और फिर बंगले में प्रवेश प्राप्त किया। जब धनंजय ने दरवाजा खोला, तो उन्होंने उसके मुंह को कपड़े की एक गेंद से भर दिया, उसके हाथ बांध दिए और उनसे कहा कि वे उन्हें घर के अंदर ले जाएं। इन सभी ने प्रत्येक व्यक्ति को उसके मुंह को कपड़े की एक गेंद के साथ भरकर, अपने हाथों और पैरों को बांधकर और फिर नायलॉन की रस्सी से गला घोंटकर मार डाला।

जोशी-अभयंकर हत्या मामला

इससे पहले 1983 में पुणे में सनसनीखेज जोशी-अभयंकर हत्या मामले में चार दोषियों को एक साथ यरवदा केंद्रीय जेल में फंदे पर लटकाया गया था। इनके नाम राजेंद्र जक्कल, दिलीप सुतार, शांताराम कन्होजी जगताप और मुनावर हारून शाह थे। इन चारों को 25 अक्टूबर 1983 को एक साथ फांसी दी गयी थी।

10 हत्याओं का था आरोप

इन चारों आरोपियों ने जनवरी 1976 और मार्च 1977 के बीच 10 हत्याएं की थीं। इस मामले में पुलिस की ओर से सुभाष चंडक को गवाह बनाया गया था। ये सभी आरोपी पुणे के अभिनव कला महाविद्यालय के स्टूडेंट थे और वाणिज्यिक कला में पढ़ते थे। पुलिस ने अपनी जांच में बताया कि ये सभी नशे के आदी थी और दो पहिया वाहन सवारों से लूटपाट करके अपने नशे के शौक को पूरा करते थे।

इसी लूटपाट के लिए इन लोगों ने पहली हत्या 16 जनवरी 1976 में कर दी थी। इन लोगों ने अपने एक सहपाठी प्रसाद हेडगे की ही सबसे पहले हत्या की थी। हेडगे के पिता कॉलेज के पीछे एक रेस्तरां चलाते थे, इन हत्यारों ने प्रसाद को पहले किडनैप किया था, उसके बाद उनके पिता से फिरौती की रकम भी मांगी थी जब पिता ने रकम देने में असर्थतता जताई तो इन लोगों ने मिलकर प्रसाद की हत्या कर दी थी।

घर में घुसकर भी करते थे लूटपाट

राह चलते दो पहिया वाहन चालकों से लूटपाट करने के अलावा ये लोग घर में घुसकर भी लूटपाट करते थे, पहले लोगों को डराते थे जब वो नहीं डरता था तो हत्या कर दी जाती थी। लूटपाट के लिए इन लोगों की नजरें कीमती सामानों पर होती थी। उस समय इन हत्याओं के मामले की जांच करने वाले सहायक पुलिस आयुक्त रहे शरद अवस्थी ने बताया था कि इन चारों की वजह से एक समय तो ऐसा हो गया था कि लोग घरों से बाहर निकलने में डरने लगे थे। शाम 6 बजे के बाद लोगों ने अपने घरों से निकलना बंद कर दिया था। 

Posted By: Vinay Tiwari

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