नई दिल्ली, जागरण स्पेशल। रंजन गोगोई के रिटायर होने बाद रविवार को एस.ए. बोबड़े ने भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश (Cheif Justice of India) के तौर पर शपथ ले ली है । राष्ट्रपति कोविंद ने जस्टिस एस. ए बोबड़े को देश के 47वें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ दिलाई। उन्हें अगला CJI नियुक्त करने के लिए जस्टिस रंजन गोगोई ने सिफारिश की थी। 

जस्टिस एस.ए. बोबड़े के शपथ ग्रहण समारोह में मोदी मंत्रिमंडल के वरिष्ठ मंत्री और शीर्ष अदालत व अन्य उच्च न्यायालयों के कई वरिष्ठ न्यायाधीशों ने शिरकत की। CJI गोगोई ने केंद्र को पत्र लिखकर जस्टिस बोबड़े को अगला मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की थी। जस्टिस बोबड़े न्यायपालिका के शीर्ष पद को संभालने वाले सुप्रीम कोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश हैं।

कई ऐतिहासिक फैसलों में शमिल

जस्टिस बोबड़े कई ऐतिहासिक फैसलों में शमिल रहे हैं। जस्टिस बोबड़े उस संवैधानिक पीठ का हिस्सा हैं जो अयोध्या भूमि विवाद की सुनवाई कर रही है। उनके साथ इस पीठ में मौजूदा चीफ जस्टिस रंजन गोगोई,  जस्टिस नजीर, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस चंद्रचूड़ भी शामिल हैं। पीठ ने मामले की सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। आगे बढ़ने से पहले आपको बताते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें।

1978 में हुई करियर की शुरुआत

जस्टिस बोबड़े का जन्म 24 अप्रैल को महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ था। उन्होंने नागपुर के विश्वविद्यालय से बी.ए और एल.एल बी की डिग्री हासिल की। अपने किरयर की शुरुआत करते हुए जस्टिस बोबड़े ने वर्ष 1978 में  काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र ज्वाइन किया। इसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाइकोर्ट की नागपुर बेंच ने लॉ की प्रैक्टिस की। वर्ष 1998 में  वह वरिष्ठ वकील बन गए।

2013 में संभाली सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर कमान 

जस्टिस बोबड़े को वर्ष 2000 में बॉम्बे हाईकोर्ट में बतौर एडिशनल जज नियुक्त किया गया। बाद में उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया। 2013 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर कमान संभाली। जस्टिस बोबड़े 23 अप्रैल, 2021 को रिटायर होंगे। इस हिसाब के भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर उनका कार्यकाल 18 महीने का होगा। 

कई एतिहासिक फैसलों का रहे हिस्सा

जस्टिस एस.ए. बोबड़े कई ऐसी संविधानिक पीठ का हिस्सा रहे हैं, जिन्होंने कई एतिहासिक फैसले लिए हैं। आधार कार्य को लेकर जिस संविधानिक पीठ ने आदेश जारी किया था, उसमें जस्टिस बोबड़े भी शामिल थे। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आधार कार्ड नहीं होने पर किसी भी भारतीय नागरिक को सरकारी सब्सिडी और मूल सेवाओं से वंचित नहीं रखा जा सकता है। साथ ही वह पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का आदेश पारित करने वाली पीठ का हिस्सा थे। उनके साथ इसमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर और जस्टिस एके सीकरी भी शामिल थे। 

डाउन संड्रोम पीड़िता की याचिका खारिज

एक महिला जो डाउन संड्रोम से पीड़ित थी, उसने अपने भ्रूण को समाप्त करने की याचिका दायर की थी। जस्टिस बोबड़े ने इस याचिका को इसलिए खारिज कर दिया था, क्योंकि, तब तक भ्रूण 26 हफ्ते का हो गया था। डॉक्टरों ने कहा था कि जन्म के बाद नवजात के जीवित रहने की संभावना है। 

किताब पर प्रतिबंध को रखा बरकरार 

कर्नाटक सरकार ने एक किताब जिसका नाम माता महादेवी था, उसपर प्रतिबंध लगा दिया था। ये प्रतिबंध इसलिए लगाया गया था कि इससे भगवान बासवन्ना के भक्तों की भावना आहात हो सकती है। संविधान पीठ ने भी इस प्रतिबंध को बरकरार रखा, उस पीठ में जस्टिस बोबड़े भी शामिल थे। 

जजों के मतभेदों में निभाई अहम भूमिका

जस्टिस बोबडे ने सुप्रीम कोर्ट के चार जजों- जस्टिस गोगोई, जे चेलमेश्वर, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ (अब सेवानिवृत्त) के बीच मतभेदों को निपटाने में अहम भूमिका निभाई थी। बता दें कि इन सभी ने जनवरी 2018 में तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी।

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