Jharkhand Election: राज्यसभा चुनाव में खुलकर हो सकती है राजनीतिक सौदेबाजी, क्रॉस वोटिंग की चर्चा तेज
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के चुनाव को लेकर सियासी सौदेबाजी और क्रॉस वोटिंग की चर्चा तेज है। सत्ताधारी ...और पढ़ें

राज्यसभा चुनाव में खुलकर हो सकती है राजनीतिक सौदेबाजी। (संसद टीवी)
HighLights
झारखंड राज्यसभा चुनाव में सियासी सौदेबाजी, क्रॉस वोटिंग की चर्चा।
गठबंधन के पास 56 विधायक, भाजपा उम्मीदवार उतारने की तैयारी में।
राज्यसभा चुनावों का इतिहास विवादों, खरीद-फरोख्त से भरा रहा है।
अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों की चुनाव प्रक्रिया शुरू होते ही सियासी सौदेबाजी और क्रॉस वोटिंग की चर्चा तेज है। विधानसभा में झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन के पास फिलहाल 56 विधायक हैं। संख्या बल के आधार पर गठबंधन दोनों सीटें आसानी से जीत सकता है, लेकिन भाजपा द्वारा उम्मीदवार उतारने की तैयारी ने राजनीतिक उठापटक को दिलचस्प बना दिया है।
झारखंड का राजनीतिक इतिहास भी इसे खारिज नहीं करता है। राज्य गठन के बाद शायद ही कोई राज्यसभा चुनाव ऐसा रहा हो जिसमें क्रॉस वोटिंग या विधायकों की खरीद-फरोख्त को लेकर सवाल नहीं उठे हों। इस बार का चुनाव भी झारखंड की राजनीतिक परिपक्वता की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।
राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव
81 सदस्यीय विधानसभा में राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव होना है। प्रत्येक सीट जीतने के लिए 28 वोट की जरूरत है। 34 विधायकों वाली झामुमो अपने दम पर एक सीट निकाल लेगी। इस सीट के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की बहन अंजली सोरेन और विनोद पांडेय की चर्चा है।
दूसरी सीट पर कांग्रेस की दावेदारी सबसे मजबूत मानी जा रही है और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर प्रमुख दावेदार बताए जा रहे हैं। यदि दूसरी सीट पर जीत के लिए कांग्रेस को झामुमो के शेष विधायकों के साथ राजद एवं भाकपा माले के समर्थन की जरूरत होगी।
एनडीए के पास 24 विधायक, जरुरत से 4 कम
दूसरी ओर एनडीए के 24 विधायक हैं। एक सीट निकालने के लिए उसे कम से कम चार अतिरिक्त वोटों की दरकार होगी। खेल यहीं से शुरू होगा। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू संभावित उम्मीदवारों के नामों की सूची केंद्रीय नेतृत्व को सौंप चुके हैं। भाजपा को जीत के लिए राजग के सभी विधायकों को एकजुट रखने के साथ अतिरिक्त चार वोट जुटाने होंगे। यही कारण है कि पार्टी ऐसे उम्मीदवार की तलाश में है जो राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक स्वीकार्यता रखता हो।
पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का नाम संभावित उम्मीदवारों में चर्चा में था, लेकिन उन्होंने स्वयं दावेदारी से दूरी बना ली। इसके बाद चर्चाओं का केंद्र में उद्योगपति और पूर्व राज्यसभा सदस्य परिमल नाथवानी फिर आ गए हैं। नाथवानी इससे पहले दो बार झारखंड से निर्दलीय राज्यसभा सदस्य चुने जा चुके हैं। यदि भाजपा उनके समर्थन में रणनीति बनाती है तो वर्तमान संख्या बल का पूरा गणित बदल सकता है।
विवादों भरा रहा है झारखंड के राज्यसभा चुनावों का इतिहास
झारखंड के राज्यसभा चुनावों का इतिहास विवादों से भरा रहा है। 2012 का चुनाव देशभर में मिसाल के रूप में याद किया जाता है। मतदान से पहले एक गाड़ी से 2.15 करोड़ नकद बरामद हुए थे, जिसे वोट खरीदने के लिए भेजा जा रहा था। इससे इतना बड़ा बवाल हुआ कि चुनाव ही रद करना पड़ा। बाद में जांच सीबीआई को सौंपी गई।
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह बेहद दुर्लभ घटना थी जब राज्यसभा चुनाव को कथित खरीद-फरोख्त के आरोपों के कारण रद करना पड़ा। 2010 का चुनाव भी कम विवादित नहीं रहा था। तब झामुमो ने पंजाब के कारोबारी केडी सिंह को प्रत्याशी बनाया था। उन पर चुनाव में भारी धनबल के इस्तेमाल के आरोप लगे। उस दौरान एक वीडियो भी सामने आया था जिसमें कुछ विधायक कथित तौर पर समर्थन के बदले पैसे की मांग करते दिखाई दिए थे।
2016 में भी झामुमो-कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या बल था। बावजूद झामुमो प्रत्याशी बसंत सोरेन हार गए थे। यह घटना बताती है कि केवल संख्या बल के आधार पर जीत की गारंटी नहीं होती। अभी सत्तारूढ़ गठबंधन एकजुट दिखाई दे रहा है। यदि उसके सभी विधायक निर्धारित लाइन पर मतदान करते हैं तो भाजपा के लिए जीत आसान नहीं होगी, लेकिन राजग प्रत्याशी के आते ही क्रास वोटिंग और सौदेबाजी तय है।
