जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। वित्त मंत्रालय के तहत काम करने वाली एजेंसियां पहले ही इस बात के संकेत दे चुकी थी कि नवंबर, 2016 में लागू नोटबंदी को चूना लगाने में सबसे आगे देश के ज्वैलर्स रहे थे। तकरीबन चार वर्षो की जांच के बाद जो बात सामने आ रही है वे इन एजेंसियों के संकेत को सही साबित करते हैं। नोटबंदी 09 नवंबर, 2016 को लागू की गई थी और 30 दिसंबर, 2016 के आकड़े बताते हैं कि किसी ज्वैलर ने सामान्य से 93 हजार फीसद ज्यादा रकम बैंकों में जमा करवाई तो किसी ज्वैलर ने अपनी सालाना कमाई से एक हजार फीसद ज्यादा राशि सिर्फ उक्त अवधि जमा करा दी। पांच लाख रुपये की सालाना आय वाले ज्वैलरों ने दो-तीन दिनों में करोड़ों रुपये जमा करा दी।

आय और जमा राशि के बीच बड़ा अंतर

लेकिन जांच एजेंसियों की कार्रवाई में दूध का दूध और पानी का पानी होने लगा है। एक एक आंकड़ों की छान-बीन हो रही है जो जल्द ही पूरा हो जाएगी। आय और जमा राशि के बीच बेहद बड़े अंतर को लेकर इनसे पूछताछ हो रही है। कई ज्वैलरों के खिलाफ कार्रवाई भी हो रही है। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक इसमें कोई शक नहीं रह गया है कि नोटबंदी के दौरान प्रतिबंधित 500 और 1000 रुपये के नोटों को सिस्टम में पहुंचाने में ज्वैलरों ने बेहद प्रमुख भूमिका निभाई है। तकरीबन सभी ने प्रतिबंधित नोटों को ठिकाने लगाने के लिए एक ही तरीका अपनाया है।

ज्वैलरों ने सैकड़ों बेनाम ग्राहकों से ली राशि

सभी ने यही कहा है कि अक्टूबर, 2016 के अंत से उन्हें भावी खरीदारी के लिए अग्रिम मिलने शुरु हुए और यह सिलसिला दिसंबर, 2016 तक चला। लेकिन इसके पक्ष में अधिकांश ज्वैलर कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर पाये हैं। कुछ ने अपनी खाता-बही में सोना-चांदी या आभूषण खरीदने की इंट्री की हुई है लेकिन वे सब गलत पाये गये हैं। कुछ ज्वैलरों ने करोड़ों रुपये के आर्डर बाहर से लिया हुआ है लेकिन उसकी आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं की है। कई ज्वैलरों ने सैकड़ों बेनाम ग्राहकों से 20 हजार रुपये से कम राशि लेने को दिखाया है और इस तरह से करोड़ों रुपये अपने बैंक खाते में जमा किया है। यह राशि अग्रिम के तौर पर दिखाया गया है लेकिन कई साल बीत जाने के बावजूद इसे बदले कोई आपूर्ति नहीं की गई है।

जांच में सामने आ रहे नए-नए तथ्य

गुजरात के एक ज्वैलर ने तो कमाल यह किया कि 9 नवंबर से 31 दिसंबर, 2016 के बीच उसने 4,14,93,000 करोड़ रुपये जमा करवाये जब जांच एजेंसियों ने उसके पिछले साल का डाटा देखा तो पाया कि तब सिर्फ 44,260 रुपये जमा करवाये गये थे यानी एक साल में आय में 93,648 फीसद का इजाफा। एक ज्वैलर ने सालाना रिटर्न सिर्फ 64,550 रुपये पर भरा था लेकिन नोटबंदी के दौरान 72 लाख रुपये बैंक में जमा कराये। एक दूसरे ज्वैलर ने सालाना रिटर्न तो 3.23 करोड़ रुपये की भरी थी लेकिन उसने अपने बैंक खाते में 52.26 करोड़ रुपये की राशि जमा कराई। इस अवधि में इसके पास नकदी (कैश इन हैंड) 2.64 लाख रुपये से बढ़ कर 6.22 करोड़ रुपये हो गई।

ज्वैलर्स के यहां पैसा जमा कराने वाले ग्राहक फर्जी

कैश इन हैंड में 23,490 फीसद की इस वृद्धि की कोई ठोस वजह उक्त ज्वैलर नहीं बता पाया। घपलेबाजी की हद यह है कि कुछ ज्वैलर्स जब फंस गये तो किसी दूसरी कंपनी के पेपर्स व लाभ-हानि खाते का डिटेल एजेंसियों के पास जमा करा दिया। सूत्रों का कहना है कि कई ज्वैलर्स इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाये हैं कि सैकड़ों बेनाम ग्राहकों से उन्होंने पैसे क्यों लिये, हद यह है कि चार वर्ष बाद भी इनके पास करोड़ों रुपये पड़े हुए हैं। एक ज्वैलरी बिक्रेता ने बताया कि उसके पास 573 लोगों ने पैसे जमा कराये हैं कि वह आगे आभूषण की खरीद करेंगे। लेकिन इनमें से अधिकांश ग्राहक फर्जी निकले।

 

Posted By: Sanjeev Tiwari

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