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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 15, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

आक्रोश में है देश की युवा पीढ़ी, छोटी-छोटी बातों पर दिखता है आक्रामक रवैया

By Monika MinalEdited By:
Published: Wed, 15 Nov 2017 11:11 AM (IST)Updated: Thu, 16 Nov 2017 04:37 PM (IST)

उत्तर से लेकर दक्षिण, पूरब से लेकर पश्चिम। देश का किशोर गुस्से में है। छोटी-छोटी बातों पर आक्रामक होने लगा है। न किसी की परवाह है, न चिन्ता।

आक्रोश में है देश की युवा पीढ़ी, छोटी-छोटी बातों पर दिखता है आक्रामक रवैया
आक्रोश में है देश की युवा पीढ़ी, छोटी-छोटी बातों पर दिखता है आक्रामक रवैया

नई दिल्ली, [अंशु सिंह]।  किशोर-युवाओं के हिंसक होने या उनके किसी प्रकार के अपराध में संलिप्‍त होने का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है। इसे देखते हुए निमहैंस (एनआईएमएचएएनएस) ने देश के पांच शहरों में इनकी उग्रता का अध्ययन किया। टीम इस नतीजे पर पहुंची कि 15 से 26 वर्ष आयु के 10 में से 8 युवा गुस्से में रहते हैं। जो कारण सामने आए, वह भी बेहद चौंकाने वाले थे। दोस्तों से छोटी-बड़ी बहस या लड़ाई, पारिवारिक विवाद, प्यार की कमी या फिर यौन उत्पीड़न की वजह से किशोरों की आक्रामकता बढ़ रही है। 

केस स्‍टडी- 1

छत्तीसगढ़ में सूरजपुर जिले के नयनपुर निवासी नारायण सिंह थके हारे घर पहुंचते हैं। बेटी से पीने का पानी मांगते हैं। थोड़ी देर हो जाती है, तो बेटी को फटकार लगा देते हैं। उसे यह बात पसंद नहीं आती और वह गुस्से में कुएं में छलांग लगा देती है। पिता को तैरना नहीं आता। फिर भी वह बेटी की जान बचाने के लिए कुएं में कूद जाते हैं, पर न तो वे बेटी को बचा पाते हैं और न खुद को। दोनों की मौत हो जाती है। 

केस स्टडी- 2

पुणे के एक रिहायशी परिवार के 15 वर्षीय किशोर का बहन से झगड़ा होता है। पिता डांटते हैं, तो वह बेकाबू हो जाता है और आधी रात को घर के बाहर खड़ी बाइक्स को आग के हवाले कर देता है।

केस स्टडी- 3

मेरठ के पल्लवपुरम फेज-2 में रहने वाली 8वीं की छात्रा को मां ने पढ़ाई के लिए टोका। गुस्से में थप्पड़ भी जड़ दिया। वह कुछ बहाने से घर के बाहर निकली और पास के इलाके में स्थित 100 फीट ऊंची पानी की टंकी पर चढ़ गई। पुलिस एवं फायर ब्रिगेड अधिकारियों ने मशक्कत के बाद 15 वर्षीय बच्ची को नीचे उतारा। 

केस स्टडी- 4

इटावा में केंद्रीय विद्यालय के 11वीं कक्षा के एक छात्र को घरवालों ने दोस्तों के साथ टूर पर जाने से मना कर दिया। 16 वर्षीय हिमांशु को यह नागवार लगा, तो उसने पिस्टल से गोली मारकर खुदकुशी कर ली। 

रिजेक्शन की प्रॉब्लम

ईसाईक्लीनिक की वरिष्ठ मनोचिकित्सक नयामत बावा का कहना है कि हम किसी को अपने मनोनुकूल नहीं बना सकते, फिर चाहे वह एक बच्चा ही क्यों न हो? उन्हें किसी बात के लिए मना करने पर वे और अधिक आक्रामक हो जाते हैं। रिजेक्टेड महसूस करते हैं। उनकी सहनशीलता खत्म होने लगती है। इसमें अभिभावकों को भी थोड़ा कसूरवार मानेंगे, जो अपने बच्चों को रिजेक्शन स्वीकार करना नहीं सिखा रहे हैं। बच्चों की मांगों को मानने से इंकार तो कर रहे हैं, लेकिन न कहने का कारण नहीं बता रहे। 

जब पूरी नहीं होती मांग

मनोविज्ञान कहता है कि दुनिया का कोई भी किशोर दबाव से काम नहीं कर सकता। हम जबरन उन पर अपनी इच्छाएं थोपते हैं, तो उनके भीतर का अभिमान विरोध में उठ खड़ा होता है। वे उग्र होने लगते हैं। जिस बात के लिए मना करते हैं, वे उसे ही करने को आतुर दिखते हैं। पैरेंट्स इस मनोभाव को समझ नहीं पाते हैं। वे बच्चों के नखरों को नजरअंदाज करते जाते हैं, बिना सोचे-समझे उनकी मांगों को पूरा करते हैं या फिर अपना गुस्सा उन पर उतारने लगते हैं। माता-पिता का यह व्यवहार भी उनके मन को गहरा प्रभावित करता है। 

बर्दाश्त नहीं है नाकामी

गुस्से का एक बड़ा कारण ताकत एवं अहंकार भी है। सोशल मीडिया के आदी हो चुके किशोरों को ऑनलाइन वीडियो गेम्स से लेकर फेसबुक एवं अन्य वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर तत्काल सफलता एवं ख्याति मिल रही है। इस कारण छोटी-सी नाकामी भी वे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। हल्की डांट-फटकार पर घर छोड़ना, आत्महत्या कर लेना आम हो गया है। यह सिलसिला थम सकता है, अगर पैरेंट्स बच्चों में न सुनने की आदत विकसित करें। उनके साथ बैठें, बातें करें। साथ में टहलने जाएं। उन्हें बताएं कि जीवन कितना अनमोल है। 

घट गया है धैर्य

हाल ही में भारत के इकलौते चाइनामैन गेंदबाज कुलदीप यादव ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि चयनकर्ताओं द्वारा चयन न किए जाने पर कैसे उनके मन में खुदकुशी तक का खयाल आ गया था। लेकिन वे संभल गए। कुलदीप के कोच रहे कपिल पांडे कहते हैं, मैं युवा खिलाड़ियों को दो बातें सिखाता हूं, धैर्य रखें और फील्ड में स्लेजिंग को टैकल करना सीखें। विरोधी आपको आउट होते देखना चाहता है। आम जीवन में भी यही लागू होता है। लेकिन आज किशोरों-युवाओं का धैर्य कम होता जा रहा है। प्रतिक्रिया देने से पहले सोचते नहीं। उन्हें समझना होगा कि कोई चीज आखिरी नहीं होती।