रवि शंकर

अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद भारत में इसके दामों में जोरदार उछाल ने आम लोगों को बेहाल कर दिया है। 2014 के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में करीब 60 फीसद की कमी आई है, लेकिन देश में पेट्रोल और डीजल के भाव आसमान छू रहे हैं। जुलाई 2014 में, जब नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आई थी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 112 डॉलर प्रति बैरल था, जो अब आधे से भी नीचे यानी 54 डॉलर प्रति बैरल पर आ चुका है। सवाल है, कच्चे तेल की कम कीमतों का फायदा आखिर किसे मिल रहा है? पेट्रोल और डीजल की कीमतें तीन साल के सबसे ऊंचे स्तर पर हैं। यह मूल्य वृद्धि रातों रात नहीं हुई। जब से मोदी सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के लिए प्रति दिन मूल्यांकन व्यवस्था शुरू की है, तभी से इसमें बढ़ोतरी जारी है। इसका खामियाजा उपभोक्ता रोजाना भुगत रहे हैं।

मनमोहन सिंह सरकार के समय में पेट्रोल पर टैक्स 34 फीसद था और डीजल पर यह बमुश्किल 21.5 फीसद। मगर जुलाई 2017 में पेट्रोल पर टैक्स 58 फीसद और डीजल पर 50 फीसद के स्तर को भी पार कर चुका है। जबकि मई 2014 के बाद कच्चे तेल की कीमत करीब 60 फीसद की गिरावट हुई है, लेकिन पेट्रोल और डीजल के दामों में यह गिरावट नहीं आई। पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों पर 2014 में संप्रग सरकार पर चुनावी प्रहार कर सत्ता में आने वाली भाजपा इन दिनों खुद सवालों के घेरे में है। गौरतलब है कि भारत कच्चे तेल का दुनिया में सबसे बड़ा आयातक है।

अनुमान है कि भारत हर दिन लगभग 45 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता है। यानी हम प्रतिदिन तेल पर 17 अरब रुपये से अधिक खर्च करते हैं, लेकिन गौर करने वाली बात है, आज कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत तीन साल पहले के मुकाबले करीब आधी है, फिर भी पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें उसी स्तर पर हैं। सवाल है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल की कीमतों में गिरावट के बावजूद भारत में महंगा पेट्रोल क्यों बेचा जा रहा है? इसकी वजह है कि पिछले तीन सालों में पेट्रोल-डीजल पर केंद्र और राज्य सरकारों ने टैक्स की दरों में भारी बढ़ोतरी की है। नवंबर 2014 से लेकर अब तक केंद्र सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी में 11 बार बढ़ोतरी की।

यही कारण है कि 1 अप्रैल 2014 को डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 3.56 रुपये प्रति लीटर थी, जो 380 फीसद की वृद्धि के साथ 17.33 रुपये पर पहुंच चुकी है। इसी तरह पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 9.48 रुपये प्रति लीटर थी जो 120 फीसद की वृद्धि के साथ 21.48 रुपये पर पहुंच गई है। केंद्र सरकार की इस मद में कमाई भी तीन गुना से ज्यादा बढ़ गई है। साथ ही राज्य सरकारों की ओर से लगाए जा रहे बिक्री कर और वैट का भी विस्तार हुआ है। साफ है, मौजूदा समय में सरकार को कच्चा तेल खरीदने के लिए पहले के मुकाबले आधे पैसा ही चुकाने पड़ रहे है। मतलब सरकार को फायदा तो हुआ है, पर इसका लाभ जनता को नहीं मिल रहा है।

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जनता सरकार के इस रवैये को अपना आर्थिक शोषण मान रही है।1सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को कीमतें तय करने की छूट दी है, लेकिन एक्साइज टैक्स में बदलाव की वजह से ग्राहकों को ऊंची कीमत चुकानी पड़ रही है। तेल के दाम कैसे तय हो, इसकी अभी तक कोई तर्कसंगत और पारदर्शी प्रणाली नहीं बनी है। तेल कंपनियां लंबे समय से भारी घाटे का रोना रो रही थीं तो सरकार ने पिंड छुड़ाने के लिए इसकी कमान तेल कंपनियों को सौंप दी। इसका नतीजा यह हुआ कि अब तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल का दम कम होने के बावजूद भारत में ऊंचे दामों पर तेल बेचकर घाटे से तो उबर गई हैं, लेकिन अब भी पेट्रोल-डीजल सस्ते नहीं हो रहे।

(लेखक टेलीविजन पत्रकार हैं)

Posted By: Kamal Verma

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