[नवनीत शर्मा] । बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी..... जगजीत सिंह की आवाज़ में इस नज्‍म का यह बोल गाए जाने के तत्‍काल बाद गिटार के कुछ नोट़्स गूंजते हैं, 'टं$टिं$टं$टं$टं$$$$' इसके बाद हारमोनियम के अंगड़ाई लेते ही ड्रम बीट भी उत्‍साही बच्‍चे के कदमों की तरह साथ हो लेती हैं...इसके बाद जो होता है वह सभी जानते हैं। जगजीत जो भी गाएं...यह 'टं$टिं$टं$टं$टं$$$$' साथ चलती है। कभी ठिठकाती हुई...कभी आगे जाने को कहती हुई....कभी रोने को कहती हुई और कभी-कभी तब भी मुस्‍कराने को कहती हुई, जब आदमी रो नहीं पाता।

मखमली आवाज के जादूगर थे जगजीत सिंह

फरवरी में सर्दी के कमजोर पड़ते सुरों और गर्मी के सुरों के गमकने से पहले के बीच....एक आवाज सुनाई देती है। जैसे कोई मध्‍य षड़ज से होती हुई बात का निकलना और दूर तलक जाना दर्ज कर रही हो...। इसे गौर से सुनें....पहचानें....यह आवाज़ घर की बिखरी हुई चीजों को सहेजने में थकते आदमी के दिल की आवाज़ है....यह वह आवाज़ है जो शुरूआती इश्‍क की फूलों से महकी पगडंडी पर सुनाई देती है....यही आवाज़ इश्‍क के बीहड़ में खुद को घसीटते हुए आदमी का बयान भी बन जाती है ...यह आवाज़ किसी मोड़ से जिंदगी को फिर शुरू करने का हौसला है....यह आवाज़ जख्‍म भी है, मरहम भी। यह आवाज आठ फरवरी के दिन इस संसार में ऐसे राज्‍य यानी राजस्‍थान में पैदा हुई थी जिसके यहां महलों से सटी झीलों की गहराई है, अरावली पर्वत जितनी ऊंचाई, जैसलमेर जैसा रेगिस्‍तान... जहां माउंट आबू जैसा सर्द पहाड़ ....और जहां रेतीली खुरदराहट को आवाज की मखमल ओढ़ाए कोई मेहदी हसन भी पैदा हुआ था!!!!

बात कई पीढि़यों को प्‍यार और दुनिया की नर्म से नर्म और तल्‍ख से तल्‍ख हकीकत को सुर में सजाने वाले हरदिल अज़ीज़ जगजीत सिंह की।

जगजीत होना जगत को जीत लेने वाला होना है। जगमोहन से जगजीत और फिर जगजीत से जगजीत होने के सफर में जालंधर, कुरुक्षेत्र और मुंबई का जिक्र अपने आप में एक लंबे उपन्‍यास का प्‍लॉट है। होटलों में गाने, जिंगल्‍स गुनगुनाने और और सुदर्शन फाकिर की ग़ज़लों से शुरूआत करने वाले जगजीत की अब कई बरस से न चिट्ठी है न कोई संदेस लेकिन कमाल यह है कि जगजीत अब भी यहीं हैं।

जगत को जीतने वाले जगजीत

जगजीत सिंह सिर्फ ग़ज़लगायक नहीं थे....जगजीत कई कुछ थे। कलाम की पहचान रखनेवाला सोचने विचारने वाला आदमी, संवेदनशील इंसान, सुरीला संगीतज्ञ....हरमन प्‍यारा शख्‍स। उसका पंजाब के हरदिल अज़ीज़ कवि शिव बटालवी की विरह से नाता था....उसे निदा फ़ाज़ली साहब के सूफियाना और भरपूर इंसानी कलाम की परख थी...उसे यह भी पता था कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने मितर प्‍यारे नूं, हाल मुरीदां दा कहणा....किस कैफि़यत में लिखा होगा...उसे इल्‍म था कि मिर्जा गालिब की आवाज़ बन कर कैसे यह कहना है, - न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता, डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्‍या होता....। माना कि गुलज़ार पहले से गुलजार थे लेकिन संपूर्ण सिंह कालरा को भी अपनी आवाज़ से गुलज़ार जगजीत ने ही किया...। और अहमद फ़राज़ के लिखे इस कलाम को जगजीत से बेहतर कौन महसूस कर और करवा सकता था.... 'फिर उसी राहगुजर पर शायद, हम कभी मिल सकें मगर शायद।' और मकते से पहले हीर आखदी जोगिया झूठ बाेलें....को पिरोने की कला सिर्फ और सिर्फ जगजीत के पास थी।

भाव और संगीत पर खास ध्यान

दरअसल जगजीत को पता था कि सुनने वाले को बांधना कैसे है। जब उन्‍होंने गाना शुरू किया था तो ग़ज़ल कुछ खास जगहों के नाम से पहचानी और मंसूब की जाती थी लेकिन जगजीत ने इसे बदला....। गायकी प्रधान नही रखी, भाव और संगीत प्रधान रखा। उससे पहले के गजल गायकों के साथ तबलानवाज़ या दीगर साज़ बजाने वाले यूं बैठते थे जैसे हैं भी और नहीं भी। उन्‍हें इजाज़त नहीं होती थी कि गायक के साथ वाद्य यंत्रों की भाषा में उलझें, कलाकारी दिखाएं। लेकिन जगजीत के जितने लाइव शोज़ हुए, उनमें हर सेगमेंट को वह पूरा मौका देते थे कि खुल कर खेलो...कारण उन्‍होंने ग़ज़ल को लोगों के दिल में बिठाया। ढोलक, तबला और सारंगी या हारमोनियम ही नहीं, बेस गिटार, स्‍पेनिश गिटार के स्ट्रिंग और वायलिन की हूक जगजीत सिंह के साथ जुड़ गईं। ग़ज़ल नई पीढ़ी तक पहुंची जो उससे पूर्व शास्‍त्रीय आलापों के घेरे में खो जाती थी। कलाम भी उत्‍कृष्‍ट और गायकी भी लोगों के दिल तक उतरने वाली। यह कलाम का ही चयन था कि पठानकोट के शायर राजेंद्र नाथ रहबर की नज्‍म पर उनकी नजर पड़ी तो तेरे खुशबू से बसे ख़त मैं जलाता कैसे'कई पीढि़यों तक पहुंची... और सादा जबान शायर हस्‍ती मल हस्‍ती की इस ग़ज़ल को भी जगजीत सिंह ने ही अमर किया,' प्‍यार का पहला खत लिखने में वक्‍त तो लगता है, नए परिंदों को उड़ने में वक्‍त तो लगता है / जिस्‍म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था, लंबी दूरी तय करने में वक्‍त तो लगता है।

इस सबमें चित्रा जी ऐसे रहीं जैसे सोने पर सुहागा। दोनों की आवाज़ें एक दूसरे को पूरा करती हैं। यह अलग बात है कि 21 वर्षीय बेटे विवेक की मौत के बाद चित्रा सिंह ने गाना छोड़ दिया। हालांकि गाने में चित्रा कई बार जगजीत से बेहतर लगती हैं। जगजीत इसलिए भी जगजीत रहे क्‍योंकि उन्‍होंने इतनी हिम्‍मत रखी कि बेटे की मौत के आघात के बावजूद गाते रहे.... शो करते रहे। जीवन चलते जाने का नाम था, कई बार लोग बेटे का जिक्र छेड़ते तो जैसे उनकी ही गाई ग़ज़ल का एक शे'र उनके चेहरे पर तैर जाता :

इक उम्र हुई मैं तो हंसी भूल गया हूं

तुम अब भी मेरे दिल को दुखाना नहीं भूले

और बीमार होकर इस दुनिया को अलविदा कहने से पहले तो ऐसा भी हुआ कि कई बार घंटोंं यही गीत स्‍टेज पर गाते रहे,'चिट्ठी न कोई संदेस....जाने वो काैन सा देस...जहां तुम चले गए' ...। शायद यह उसी देस की तलाश खत्‍म होने का वक्‍त था...या फिर याद से लड़ने का एक तरीका था उस महान कलाकार का। लेकिन उनकी तरह हंसमुख और श्रोताओं, दर्शकों को गुदगुदाने वाला कोई और था नहीं। शायद है भी नहीं। संगीत, आवाज़, कलाम इस सबका एक ही नाम है...और वह नाम है जगजीत सिंह।

...आज दिन ही ऐसा है कि 'दिन भर रहेगा चर्चा तेरा'.. और इसी ग़ज़ल में उनके सिग्‍नेचर इफेक्‍ट के साथ, 'टिं$टिं$ढ$टिं$टिं$$$$$' 

Posted By: Lalit Rai