डॉ. महेश परिमल

भारतीय सरहद पर हमेशा तनाव रहता ही है। इधर पाकिस्तान अपनी करतूतों से बाज नहीं आ रहा है, तो उधर अब चीन भी धमकी देने लगा है। उसका कहना है कि यदि भारत ने भूटान से अपने सैनिक वापस नहीं लिए, तो चीनी सेना भारत पर हमला कर देगी। उधर जी-20 की बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग आपस में मिले भी, पर ऐसा नहीं लगता कि इससे बात कुछ बनेगी। भारतीय जनता चीन के प्रति अपना आक्रोश दिखाते हुए उसके उत्पाद का बहिष्कार कर अपनी जागरूकता का परिचय दे रही है। देखा जाए, तो चीन की यह धमकी बिलकुल उसके माल की तरह ही है। वह भारत पर हमले की हिमाकत कभी नहीं कर सकता। इसकी एक नहीं बल्कि कई वजहें हैं।

1975 सिक्किम की संसद ने एक विधेयक पास कर भारत में विलय की घोषणा की। इसके 28 साल बाद 2003 में चीन ने इसे मान्यता भी दे दी। अब चीन यह कह रहा है कि वह सिक्किम को आजाद करने के आंदोलन को अपना समर्थन दे सकता है। भूटान के विवाद में भारत की नाक दबाने वाला चीन सिक्किम का उपयोग कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषक यह कहते हैं कि चीन केवल धमकी ही दे सकता है। वह भारत से युद्ध करने की हिमाकत कभी नहीं कर सकता। यदि वह ऐसा करता है कि वैश्विक आर्थिक महासत्ता बनने का उसका सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा। उसके इस सपने की मौत उसकी आंखों में ही हो जाएगी।


चीनी राष्ट्रपति ने अपनी एक अलग ही तरह की छवि बनाई है। वे चीन को उस छवि से मुक्त कराना चाहते हैं, जिसे लोग झगड़ालू, सदैव अपनी पड़ोसियों से विवाद करते रहने की मानते आए हैं। चिनपिंग चाहते हैं कि चीन को लोग एक चालाक, चतुर व्यापारी की नजरों से देखें। चीन भले ही स्वयं को साम्यवादी बता रहा हा, पर सच तो यह है कि वह कट्टर पूंजीवादी देश के रूप में उभर रहा है। जनवरी में उसने दावोस के वल्र्ड इकानॉमी फोरम में वैश्विकरण के समर्थन भाषण देकर सबको चौंका दिया था। अमेरिका समेत कई देशों द्वारा मुक्त व्यापार के विरोध में जो अवरोध उत्पन्न किए जा रहे हैं, उसका जिनपिंग ने खुलकर विरोध किया। यदि यह अवरोध दूर हो जाएं, तो चीन दुनिया के बाजार में अपनी धाक जमा सकता है।


यदि चीन की छवि झगड़ालू, युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहने वाले देश की बनती है, तो उसके व्यापार को भारी झटका लग सकता है। वन बेल्ट, वन रोड चीन की एक महत्वाकांक्षी योजना है। इस योजना के अंतर्गत वह एशिया, अफ्रीका और यूरोप के 65 देशों को व्यापार मार्ग से जोड़ना चाहता है। इससे उसके व्यापार में भारी इजाफा होगा, इस लाभ भी उसे बेशुमार मिलेगा। अमेरिका के बदले वैश्विक आर्थिक सर्वेसर्वा बनने की चीन की इस महत्वाकांक्षा इससे प्रभावित हो सकती है। यदि चीन भारत से युद्ध करता है, तो भारत से दोस्ती रखने वाले कई देश चीन से नाराज हो जाएंगे और उसकी महत्वाकांक्षा पर पानी फिर सकता है।

भारत के साथ व्यापार चीन की आर्थिक समृद्धि के लिए जिम्मेदार है। भारत-चीन के व्यापार में पिछले 15 सालों में 24 गुना वृद्धि हुई है। सन् 2000 में भारत-चीन के बीच 2.9 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था। जो 2016 में बढ़कर 70.8 अरब डॉलर हो गया है। भारत-चीन के बीच होने वाले व्यापार में 45.56 अरब डॉलर का घाटा हुआ है, अर्थात चीन भारत से जितना आयात करता है, उसकी तुलना में 46.46 अरब डॉलर का निर्यात करता है। चीन से होने वाले सस्ते आयातों के कारण भारत के करोड़ों मजदूर बेकार हो गए हैं। लाखों व्यापारियों के पौ-बारह हो गए हैं। चीन जब भारत को युद्ध की धमकी देता है, तब सोशल मीडिया पर चनी के माल के बहिष्कार का अभियान चल रहा है। चीन भारत से जितना कमाता है, उसका उपयोग वह अपनी सुरक्षा में कर रहा है। चीनी कंपनियां भारत में उत्पादन करने के लिए भारत में फैक्टरियां लगा रही हैं। हाल हीह में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने दो चीनी कंपनियों के साथ गुजरात में मोटर कार का उत्पादन करने बाबत समझौता किया है।


2011 में भारत में सीधे विदेशी निवेश के बाबत में चीन का नंबर 35 था, तो 2016 में यह क्रम 70 हो गया। चीन अभी तक दुनिया के देशों के साथ व्यापार कर जो धन कमाता है, उसका उपयोग वह अमेरिकी सरकार की सिक्योरिटी में करता था। इसमें ब्याज बहुत ही कम मिलता था, अब चीन ने पूंजी निवेश दुनियाभर में बुनियादी ढांचा परियोजना में खर्च करना तय किया है। इसके कारण चीनी कंपनियों के लिए विदेशों में व्यापार के नए अवसर खुल रहे हैं।


चीन अब तक घर में इस्तेमाल होने वाली चीजें ही बनाता था, इसी से उसकी पहचान बनी है। पर अब वह भारी मशीनरी, मोटर कार, अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, कंप्यूटर आदि बनाने में अधिक दिलचस्पी दिखा रहा है। यदि चीन भारत पर हमला करता है, तो उसका जो विस्तार औद्योगिक क्षेत्र में हो रहा है, वह रुक जाएगा। उसकी छवि बिगड़ जाएगी। जो वह कभी नहीं चाहेगा।

चीन यदि एशिया के बाजारों में अपने पैर पसारना चाहता है, तो उसे भारत के सहयोग की आवश्यकता होगी। इसके बिना वह यह कार्य कर ही नहीं सकता। इसका श्रेष्ठ उदाहरण 10 देशों का बना एसोसिएशन आफ साउथईस्ट एशियन नेशंस(आसियान) नामक का व्यापारिक संगठन है। इन देशों में चीन भारत और म्यांमार के अलावा जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया का भी समावेश होता है। दुनिया में जितना भी व्यापार होता है, उसका 40 प्रतिशत इन देशों के बीच होता है। चीन चाहता है कि वह सभी देशों के बाजार पर अपना कब्जा कर ले, तो उसके लिए उसे आसियान से समझौता करना ही होगा। ऐसे में वह यदि भारत से युद्ध करता है, तो एशिया के देश भारत के साथ खड़े हो जाएंगे।

बहरहाल यह समझौता इसी कारण अटक गया है। यदि दोनों देशों के बीच युद्ध होता है, तो एशियाई देश चीन के साथ व्यापार करने पर पुनर्विचार कर सकते हैं, जो चीन के हित में नहीं होगा। चीन इस बात को अच्छी तरह से समझता है कि भारत से टकराना यानी अपने ही आर्थिक साम्राज्य की नाव डुबोना है। इसलिए वह सीधे भारत से नहीं भिड़ेगा। यह तो इसी बात से साफ हो जाता है कि सिक्किम के पास नाथु ला मार्ग पर उसने कैलास मानसरोवर की यात्र को अटका दिया है, पर उसी रास्ते से उसने व्यापार को बंद नहीं किया है। चीन यदि आर्थिक महासत्ता बनना चाहता है, तो उसे भारत से अच्छे संबंध कायम करने ही होंगे, अन्यथा उसी की हालत ही खराब होगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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Posted By: Lalit Rai

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