यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 26, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
जागरण संस्कारशाला: समझें अन्न का महत्व
रोगों या स्वास्थ्य संबंधी खतरों के बारे में जानकारी देने की बजाय पौष्टिक भोजन के बारे में बातचीत करना अधिक फायदेमंद होता है।

नई दिल्ली, जय प्रकाश पाण्डेय। धरती पर अन्न का दर्जा भगवान के समतुल्य है और दुनिया के हर धर्म में इसे अहमियत दी गई है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अन्न को धरती पर साक्षात ब्रह्म का स्वरूप माना गया है। खाना खाने से ठीक पहले प्रार्थना कर ईश्वर को धन्यवाद देने की परंपरा संभवत: मानव सभ्यता जितनी पुरानी और लगभग सभी धर्मों में समान है। महाभारत में दो कथाएं भोजन से जुड़ी हैं। एक कथा में जब पांडव वनवास में थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें एक अक्षयपात्र उपहारस्वरूप दिया था। इस पात्र की विशेषता थी कि यह कभी खाली नहीं होता था और इसके सहारे पांडवों को कभी भोजन की चिंता नहीं सुदामा अपनी गरीबी से तंग आकर एक दिन अपने मित्र द्वारकाधीश के दरबार में आर्थिक सहायता मांगने गए।
गरीब सुदामा के पास भेंटस्वरूप श्रीकृष्ण को देने के लिए कुछ भी न था। पत्नी के कहने पर वह एक पोटली में चंद मुट्ठी पोहा ले तो गए, पर द्वारका का वैभव देख सुदामा को अपनी भेंट श्रीकृष्ण को देने की हिम्मत न हुई। कहते हैं कि भगवान कृष्ण इस बात को भांप गए और उन्होंने सुदामा के हाथ से न केवल पोहा ले लिया, बल्कि बड़े ही चाव से उसे खाया भी। कहते हैं प्रभु ने दो मुट्ठी ही खाया कि उनकी पत्नी रुक्मिणी ने उनका हाथ रोक दिया। वजह भगवान श्रीकृष्ण तब तक खा चुके दो मुट्ठी पोहा के बदले सुदामा को दो लोकों का वैभव प्रदान कर चुके थे।
महाभारत कालीन इन दोनों कथाओं के अपने-अपने आशय हैं। पहली यह कि अन्न की उपलब्धता मनुष्य की जरूरत और संतोष से जुड़ी है। अक्षयपात्र में संग्रह की व्यवस्था नहीं थी, जितनी जरूरत थी, मिलेगा, अतिरिक्त एक दाना भी नहीं। दूसरी कहानी भी सखा के प्रेम के बहाने अन्न के महत्व को जताती है, पर आज के दौर में हम ये सारी बातें भूल गए हैं।
किशोरों के खानपान से जुड़ी आदतें तमाम तरह की दुश्वारियों को पैदा कर रही हैं। फटाफट संस्कृति ने पिज्जा, बर्गर, पास्ता, नूडल्स, चाकलेट, आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक को हमारा मुख्य भोजन बना दिया है, जिसके चलते किशोर इनसे जुड़ी बीमारियों के शिकार कम उम्र में ही हो जाते हैं। इसके बाद वे चश्मा, मोटापा, याददाश्त की समस्या से जूझने लगते हैं। किशोरों में बढ़ते मोटापे के पीछे जंक फूड के अलावा परिवार वालों की लापरवाही भी जिम्मेदार है। आमिर खान की चर्चित फिल्म ‘दंगल’ देख कर ताली बजाने वाले लोग भी अपने बच्चों में खानपान को लेकर अनुशासन नहीं रखना चाहते। कबीरदास जी ने बहुत पहले ही कहा था-जैसा भोजन खाइये/ तैसा ही मन होय-जैसा पानी पीजिये/तैसी वाणी होय।
हमें अपने बच्चों को बताना होगा कि जंक फूड में कैलोरी, वसा और चीनी या नमक जहां काफी अधिक होता है, वहीं प्रोटीन, विटामिन और खनिज कम या न के बराबर होता है। ठेले पर बिकने वाले अधिकतर खाद्य पदार्थ टेस्टी तो हो सकते हैं, पर स्वास्थ्य के लिए खराब हैं। बाजार के छोले-भटूरे, समोसे, पाव भाजी, तले हुए पदार्थ आदि भी जंक फूड ही हैं। वे भोजन जिनमें संतृप्त वसा, ट्रांस फैट और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक होती है, वे शरीर में कोलेस्ट्रोल के स्तर में वृद्धि करते हैं और स्वस्थ आहार की श्रेणी में नहीं आते। स्वस्थ संतुलित आहार शरीर को मजबूत बनाता है तथा रोगों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इससे दिमाग तेज तथा शरीर स्वस्थ बनता है। संतुलित भोजन खूबसूरत त्वचा, बाल, आंख और दांत के लिए भी उपयोगी है। संतुलित भोजन में अनाज और अंकुरित चने, दालें इत्यादि शामिल हैं।
साबुत अनाज, गेहूं से बना पास्ता, ब्राउन राइस, ओटमील, जौ आदि के अलावा सीजनल सब्जियां, सलाद और फल भोजन का आवश्यक हिस्सा होना चाहिए। दूध और दूध से बनी चीजें, जैसे-दही, चीज, छाछ आदि भी रोजाना लें, लेकिन ये सभी फैट मुक्त हों। इससे शरीर स्वस्थ रहेगा और स्वस्थ तन किशोरों के विकास के लिए बेहतर होता है।
मनोचिकित्सक की राय
मनोचिकित्सक सोनिया पुआर ने बताया कि खाने-पीने के सामान की खरीदारी और नाश्ते-भोजन व रात के खाने का मेन्यू तैयार करने में बच्चों की अभ्यास प्रश्न मदद लें। सप्ताह में एक बार एक समय का पौष्टिक भोजन तैयार करने के लिए उन्हें प्रेरित करें। हमेशा अपने बच्चों को पौष्टिक भोजन का चुनाव करने के लिए प्रेरित करें। बढ़िया खान-पान न सिर्फ हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है, बल्कि स्कूल व स्पोट्र्स परफॉर्मेंस में भी मददगार है। बातचीत के दौरान उन्हें यह जरूर बताएं। रोगों या स्वास्थ्य संबंधी खतरों के बारे में जानकारी देने की बजाय पौष्टिक भोजन के बारे में बातचीत करना अधिक फायदेमंद होता है।
यह भी पढ़ें: जागरण संस्कारशाला: जंक फूड को कहें ना
