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INDI गठबंधन में होगी जगन मोहन रेड्डी की एंट्री? 2029 लोकसभा चुनाव के लिए क्या है YSRCP की रणनीति

Published: Tue, 27 Oct 2026 05:36 PM (IST)

जगन मोहन रेड्डी के CEC चयन कानून पर पछतावे ने उनके INDI गठबंधन में शामिल होने की अटकलें तेज कर दी हैं।

2024 में भाजपा से अलग होने के बाद नए विकल्प तलाश रहे जगन मोहन रेड्डी

2024 में भाजपा से अलग होने के बाद नए विकल्प तलाश रहे जगन मोहन रेड्डी

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। क्या वाईएसआरसीपी प्रमुख जगन मोहन रेड्डी अब कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDI गठबंधन की ओर रुख कर रहे हैं? या फिर वे भाजपा के प्रति 'नरम' मानी जाने वाली अपनी छवि को तोड़ने की कोशिश में हैं? आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने सत्ता में रहते हुए संसद में भाजपा नीत एनडीए सरकार के कई महत्वपूर्ण कानूनों को मुद्दा-आधारित समर्थन दिया था।

लेकिन अब तक वे किसी भी गठबंधन से दूर ही रहे। हाल ही में जगन रेड्डी ने 2023 में लाए गए मुख्य चुनाव आयुक्त चयन संबंधी एनडीए कानून का समर्थन करने को अपनी ‘गलती’ बताया और इस पर पछतावा जताया। इस बयान ने उनके भविष्य के राजनीतिक रुख को लेकर नई अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है।

जगन मोहन रेड्डी का पछतावा 

YSRCP प्रमुख ने हाल ही में कहा, 'हमें उस प्रक्रिया का समर्थन करने पर पछतावा है जिसके तहत सत्ताधारी पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को चुना। न तो CEC और न ही SEC (राज्य चुनाव आयुक्त) की नियुक्ति सत्ताधारी पार्टी द्वारा की जानी चाहिए।

चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होने चाहिए और इन तीनों को ही मतदान का अधिकार होना चाहिए।'

उन्होंने मौजूदा चयन प्रणाली को 'दोषपूर्ण' करार दिया। जगन की इन टिप्पणियों का समय और संदर्भ काफी मायने रखता है। ऐसा इसलिए क्योंकि क्या वह अपनी 'अकेले' चलने वाली राजनीति पर फिर से विचार कर रहे हैं?

अगर ऐसा है, तो क्या कांग्रेस आंध्र प्रदेश में उनके साथ हाथ मिलाने को तैयार होगी? आखिरकार, अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करना कांग्रेस के लिए हमेशा से एक बड़ी कमजोरी साबित हुआ है।

NDA के अहम बिलों पर जगन का समर्थन

2019 से 2024 के बीच लोकसभा और राज्यसभा दोनों में, जगन मोहन रेड्डी के सांसदों ने कई महत्वपूर्ण कानूनों पर मोदी सरकार का समर्थन किया। हालांकि, जब 2024 के चुनावों के लिए गठबंधन बनाने की बात आई तो BJP ने जगन की मदद को नजरअंदाज कर दिया और उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी चंद्रबाबू नायडू के साथ हाथ मिला लिया।

आंध्र प्रदेश में TDP और BJP ने मिलकर चुनाव में शानदार जीत हासिल की; उन्होंने विधानसभा की 175 में से 164 सीटें और लोकसभा की 25 में से 21 सीटें जीतीं। वहीं, YSRCP विधानसभा में 11 और लोकसभा में 4 सीटों पर सिमट गई।

BJP द्वारा ठुकराए जाने और अपनी पार्टी की करारी हार के बावजूद, जगन मोहन रेड्डी को BJP के साथ अपने संबंधों को लेकर भरोसा था। आखिरकार, उनके पास अभी भी 15 सांसद (लोकसभा में 4 और राज्यसभा में 11) थे, जो केंद्र में BJP की अल्पमत सरकार को बहुत जरूरी समर्थन दे सकते थे।

जगन ने यह भी घोषणा की कि उनके सांसद राष्ट्रीय और राज्य हित के मुद्दों पर NDA सरकार को समर्थन देंगे। लेकिन, केंद्र में अपनी सरकार को बचाए रखने के लिए BJP पूरी तरह से चंद्रबाबू नायडू के समर्थन पर निर्भर थी, इसलिए BJP के पास जगन रेड्डी को साथ लेने की कोई गुंजाइश नहीं थी।

लगभग ढाई साल बीत जाने के बाद, ऐसा लगता है कि रेड्डी ने इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार कर लिया है और शायद 2029 की अगली राजनीतिक चुनौती के लिए एक नया रास्ता खोजने की तैयारी कर रहे हैं।

जगन रेड्डी बनाम कांग्रेस

हालांकि, INDI गठबंधन के साथ किसी भी सफल गठबंधन के लिए, YSRCP और कांग्रेस का एक ही राय पर होना जरूरी होगा और शायद जगन मोहन रेड्डी के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती होगी।

2010 में, अपने पिता YS राजशेखर रेड्डी के निधन के एक साल बाद, जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस से काफी कड़वाहट के साथ अलग हो गए थे। 2 सितंबर 2009 को एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में वाईएसआर रेड्डी की मौत हो गई, उस समय वे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर रहे थे।

जगन के समर्थकों ने, जिनकी संख्या काफी अधिक थी, इस शीर्ष पद के लिए कांग्रेस आलाकमान पर काफी दबाव डाला, लेकिन सोनिया गांधी अपनी बात पर अडिग रहीं और के. रोसैया को मुख्यमंत्री बना दिया।

कांग्रेस नेतृत्व को जगन की 'ओदारपु यात्रा' पसंद नहीं आई। यह यात्रा उनके उस घोषित कार्यक्रम का हिस्सा थी, जिसके तहत उन्हें उन कई लोगों के परिवारों से मिलना था, जिन्होंने उनके पिता की मौत के बाद अपनी जान दे दी थी।

इसी घटनाक्रम के चलते अंततः उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने 29 नवंबर 2010 को सोनिया गांधी को एक खुला पत्र लिखकर कांग्रेस छोड़ने की घोषणा की। इस पत्र को बहुत सोच-समझकर लिखा गया था, ताकि उनके राजनीतिक करियर के दूसरे चरण के लिए जनता की सहानुभूति उन्हें मिल सके।

YSRCP की शानदार शुरुआत 

2014 के विधानसभा चुनावों में, YSRCP ने शानदार शुरुआत की और 44.46% वोट शेयर के साथ 175 में से 67 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को केवल 2.8% वोट शेयर ही मिल पाया। राज्य को बांटकर तेलंगाना बनाने के कांग्रेस के फैसले ने राज्य में पार्टी की गिरती राजनीतिक स्थिति में बड़ी भूमिका निभाई।

6 नवंबर 2017 को, जगन ने 'प्रजा संकल्प यात्रा' शुरू की और 341 दिनों में 3648 किमी की दूरी तय करते हुए 134 विधानसभा क्षेत्रों को पार किया।

इडुपुलापाया के YSR घाट से शुरू होकर इच्छापुरम के उत्तर-पूर्वी छोर तक गई इस यात्रा ने जगन मोहन रेड्डी को 2019 के चुनावों में 175 सदस्यीय विधानसभा में 151 सीटों का ऐतिहासिक जनादेश दिलाया।

कांग्रेस का वोट शेयर घटकर 1% से भी कम रह गया। तब से, कांग्रेस राज्य में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। पार्टी को पुनर्जीवित करने की योजना के तहत, उन्होंने जगन रेड्डी की बहन Y S शर्मिला को अपने साथ जोड़ा।

शर्मिला, जिन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत अपने भाई जगन मोहन रेड्डी के साथ की थी, बाद में कांग्रेस की ओर चली गईं और जनवरी 2024 में उन्हें आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। हालांकि, 2024 के चुनावों में जगन मोहन रेड्डी और उनकी बहन Y S शर्मिला, दोनों ही कोई खास प्रभाव नहीं डाल पाए।

2024 के चुनावों में जगन की चुनावी किस्मत बुरी तरह लड़खड़ा गई और उनकी पार्टी सिमटकर केवल 11 सीटों पर रह गई। कांग्रेस एक बार फिर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में नाकाम रही।

2029 लोकसभा चुनाव की चुनौती

अब बात आती है 2029 के चुनावों की, जो जगन मोहन रेड्डी और कांग्रेस, दोनों के लिए 'करो या मरो' की चुनौती है। CEC नियुक्ति बिल का समर्थन करने पर जगन की टिप्पणी, BJP का साथ देने को लेकर उनका पहला खुला 'पछतावा' है। लेकिन क्या इस 'खुले पछतावे' का मतलब कांग्रेस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना है?

अगर दोनों का विलय हो जाता है, तो सच कहूं तो उन्हें बहुत बड़ा फायदा होगा, क्योंकि तब केंद्रीय कांग्रेस और जगनमोहन की कांग्रेस एक ही दिशा में काम कर सकेंगी।'

हालांकि, वे यह भी मानते हैं कि दोनों पार्टियों का विलय एक मुश्किल प्रक्रिया हो सकती है, जबकि गठबंधन करना शायद आसान हो। संजय झा आगे कहते हैं, 'एक बार जब कोई राजनीतिक पार्टी स्वतंत्र हो जाती है और उसके पास सत्ता आ जाती है, तो वह जल्दी से उसे छोड़ना नहीं चाहती। टीएमसी (TMC) या एनसीपी (NCP) इसके अच्छे उदाहरण हैं।

ऐसे में, उनके बीच गठबंधन ही एक विकल्प हो सकता है।' संजय झा के अनुसार, तीसरा विकल्प यह है कि कांग्रेस आंध्र प्रदेश में खुद को फिर से मजबूती से खड़ा करे इसके लिए उसे चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ मौजूद असंतोष के वोटों को हासिल करना होगा और कांग्रेस के उन वफादार समर्थकों को वापस लाना होगा, जो जगनमोहन रेड्डी के साथ चले गए थे।

कहना आसान और करना मुश्किल

जिन राज्यों में कांग्रेस सत्ता गंवा चुकी है, वहां उसे वापस पाने के मामले में उसका रिकॉर्ड काफी खराब रहा है। देश के कई राज्यों में हमने देखा है कि कांग्रेस ने न केवल अपनी सरकार खोई, बल्कि अपना जनाधार भी गंवा दिया और उसे वापस पाने के लिए पार्टी ने कोई खास कोशिश नहीं की।

आंध्र प्रदेश में, चंद्रबाबू नायडू और बीजेपी अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। हाल ही में एक सम्मेलन में नायडू ने दक्षिणी राज्यों के बीच बेहतर सहयोग और तालमेल की जो बात कही, वह शायद अपनी अहमियत और प्रासंगिकता बनाए रखने की एक कोशिश है। पिछले विधानसभा चुनावों में विजय की TVK से सत्ता गंवाने से पहले, DMK के एम.के. स्टालिन ने भी कुछ ऐसे ही कदम उठाए थे।

2029 में जगन मोहन रेड्डी और कांग्रेस के सामने चुनावी लड़ाई काफी कठिन होने वाली है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे चंद्रबाबू नायडू और बीजेपी का मुकाबला करने के लिए आपस में गठबंधन कर पाते हैं या नहीं।

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