नई दिल्ली (जेएनएन)। इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आइवीएफ) प्रक्रिया से संतान प्राप्ति का सपना देख रहे दंपतियों के लिए अच्छी खबर है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी डिवाइस विकसित की है जिससे इस प्रक्रिया में तेजी आ सकती है। यह डिवाइस प्रबल और गतिशील शुक्राणुओं की तेजी से पहचान कर सकती है। पारंपरिक विधियों में ऐसे शुक्राणुओं को अलग करने का काम बोझिल होता है और इसमें कई घंटों का वक्त लग सकता है।

अमेरिका की कार्नेल यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर अलीरेजा अब्बासपौराड ने कहा, ‘अत्यंत गतिशील शुक्राणु को खोजना काफी कठिन काम होता है, लेकिन इस डिवाइस से संभावना बढ़ सकती है। इस विधि में यह काम घंटों की जगह महज पांच मिनट में पूरा हो सकेगा। दरअसल, टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक ने कामनाओं के बुझते चिराग की ज्योति को पुनः प्रज्ज्वलित कर दिया है। यह सच है कि टेस्ट ट्यूब बेबी प्रक्रिया आपकी गोद भरने में सफल हो सकती है। हर स्त्री की आंखों में मां बनने का सपना शादी होते ही आ जाता है। समय के साथ अगर यह हक़ीकत में नहीं बदलता है तो आंखों की चमक धीरे-धीरे फीकी होने लगती है, परंतु साइंस की देन टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक ने कामनाओं के बुझते चिराग की ज्योति को पुनः प्रज्ज्वलित कर दी है। हां, यह सच है कि टेस्ट ट्यूब बेबी प्रक्रिया आपकी गोद भरने में सफल हो सकती है।

निसंतान के लिए है फायदेमंद
हाल ही में हुए एक रिसर्च में सामने आया है कि आइवीएफ तकनीक के दौरान अगर महिलाओं के गर्भ में ताजा भ्रूण की जगह फ्रोजन भ्रूण प्रत्यारोपित किया जाए तो इसके नतीजे बेहतर हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे संतान सुख पाने की संभावना ताजा भ्रूण के मुकाबले तीस फीसदी तक बढ़ जाती है। इससे पूर्व हुए शोध में कहा गया है कि फ्रोजन भ्रूण की मदद से संतान की इच्छा रखने वाले दंपति पर आइवीएफ तकनीक का कई बार इस्तेमाल संभव हो सकता है।

जानिए आइवीएफ तकनीक को 
जिन महिलाओं के बच्चे नहीं हैं, वह इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आइवीएफ) के जरिए मां बनने की उम्मीद को और ज्यादा बढ़ा सकती हैं। पारंपरिक आइवीएफ तकनीक निषेचन के लिए शुक्राणुओं और अंडे के फ्यूजन पर काम करती है। आइवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन किसी भी समस्या के कारण लाइलाज निसंतान दंपती को बच्चे का तोहफा देने की ऐसी प्रक्रिया है जो दिन प्रतिदिन लोकप्रिय होती जा रही है। इस प्रक्रिया में अधिक अंडों के उत्पादन के लिए महिला को फर्टिलिटी दवाइयां दी जाती हैं और उसके बाद एक छोटी सी सर्जरी के माध्यम से अंडों को निकाला जाता है। इन्हें प्रयोगशाला में कल्चर डिश में तैयार पति के शुक्राणुओं के साथ मिलाकर निषेचन के लिए रख दिया जाता है। यह सब अल्ट्रासाइंड के तहत किया जाता है। प्रयोगशाला में इसे दो-तीन दिन के लिए रखा जाता है और इससे बने भ्रूण को वापस महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। आइवीएफ की पूरी प्रक्रिया में दो से तीन सप्ताह का समय लग जाता है। इसमें डॉक्टर की सलाह, जांच, रिपोर्ट की दोबारा जांच, स्टीमुलेशन, अंडों और शुक्राणुओं का संग्रह और अंत में निषेचन के बाद भ्रूण को गर्भ में प्रत्यारोपण शामिल है। इसकी सफलता व असफलता का पता अगले चौदह दिनों में रक्त परीक्षण व प्रेग्नेंसी टेस्ट के बाद लगता है।

कैसा हो फर्टिलिटी केंद्र
- केंद्र पर मौजूद सभी सहायक व डॉक्टर प्रशिक्षित होने चा्हिए।
- केंद्र पर संतान सुख पाने वाले दंपती की जानकारी लें। 
- कितने दंपती दो या तीन बच्चों का गर्भ एक बार में धारण कर चुके हैं।
- इनफ्रास्ट्रक्चर और लैब कैसा है, एंब्रयोलोजिस्ट का प्रशिक्षण अच्छा होना चाहिए।
- किस-किस प्रकार के मरीज़ों का इलाज़ होता है।
- क्या नवीनतम तकनीकी सुविधाएं हैं।

यह जानना है बेहद जरूरीः
उम्र - आपकी उम्र प्रजनन प्रक्रिया पर असर डालती है। बढ़ती उम्र के साथ अंडे बूढ़े होने लगते हैं और उनकी संख्या भी कम हो जाती है। इस समय अपने अंडों से बच्चा पाना मुश्किल हो जाता है, इसीलिए उम्र को गंवाकर आइवीएफ की तरफ बढ़ना बहुत अक्लमंदी का काम नहीं है। यदि आपकी उम्र पेंतीस वर्ष या उससे अधिक है तो आइवीएफ के लिए समय कम रह जाता है इसीलिए सही दिशा में कदम उठाएं।

पहले मां बनी हैं आप - अगर आप एक बार मां बन चुकी हैं और आपका साथी आपके पहले बच्चे का पिता है तो आइवीएफ के सफल होने की अधिक संभावना है। अगर पहले आपका गर्भ कई बार गिर चुका है एवं आपका साथी नया है तो सफलता की संभावना कम हो जाती है। इसके अन्य कई कारण भी होते है जैसे कि बच्चेदानी में गर्भधारण की क्षमता ना होना, अंडे ठीक ना होना या नये साथी में कमी का होना, जिसका निदान भी आवश्यक हो जाता है।

निसंतानता का कारण - शुक्राणु की कमी, शुक्राणु का न होना या असमान्य होना एक प्रमुख कारण बन जाता है। बच्चेदानी की संरचना मे कोई गड़बड़ी या ट्यूमर भी निसंतानता का कारण है।

समय से अंडा बनना व अच्छा अंडा बनना टेस्ट ट्यूब बेबी की सफलता का सबसे मुख्य आधार है। अंडाशय की कोई भी गड़बड़ी, ख़ासकर पस का बढ़ जाना सफलता को रोकता है। अगर अंडे की मात्रा कम होती है तो बहुत ज़्यादा दवाओं की ज़रूरत अंडा बनाने के लिए होती है और सफलता के आयाम कम हो जाते हैं। यदि स्त्री और पुरुष दोनों में कमी है तो मुश्किल और बढ़ जाती है। यही नहीं यदि निसंतानता बहुत लंबे समय से है तो आइवीएफ की सफलता पर असर पड़ता है।

डोनर - अंडे की गुणवत्ता व डोनर की उम्र दोनों बहुत मायने रखते हैं। अगर स्त्री, जो मां बन चुकी है और उसकी उम्र चालीस वर्ष या ज़्यादा है तो उसे किसी कम उम्र और बेहतर गुणवत्ता वाले अंडे वाली स्त्री का इस्तेमाल करने से सफलता मिल सकती है।

छोड़ना होगा धूमपान - स्वस्थ जीवन शैली हर एक रोग में बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर आप धूमपान करती हैं तो उसे रोकना उपयुक्त होता है क्योंकि, धूम्रपान करने वाली महिलाओं को अंडे बनाने वाली दवाइयां ज़्यादा लेनी पड़ती हैं। बच्चे के गर्भाशय में जमने की प्रक्रिया कम होती है। यह पाया गया है कि धूम्रपान करने वाली महिलाओं में सफलता की दर धूम्रपान न करने वाली महिला की आधी होती है। यही नहीं, धूम्रपान करने से अंडों में निषेचन होना भी कम हो जाता है यानी अंडों से बच्चा बनता ही नहीं है।

गर्भ धारण के बाद न करें ऐसा
संभोग से बचें - आइवीएस की प्रक्रिया के बाद पति पत्नी को संभोग से बचना चाहिए। संभोग से महिलाओं में वैजाइनल इंफेक्शन होने का खतरा रहता है, जिससे यह प्रक्रिया सफल नहीं हो पाएगी।

भारी सामान नहीं उठाएं - आइवीएफ की प्रक्रिया के बाद महिलाओं को भारी सामान नहीं उठाना चाहिए। कई डॉक्टरों का कहना है कि महिलाओं को तब तक भारी सामान नहीं उठाना चाहिए जब तक यह सुनिश्चित नहीं हो जाए कि वे प्रेग्नेंट हैं। भारी सामान उठाने से पेट की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है जिससे आइवीएफ प्रक्रिया पर असर हो सकता है। इस दौरान महिलाओं को घर के कठिन कामों से दूर रहना चाहिए।

एक पखवाड़े नहाएं नहीं -  डॉक्टरों के मुताबिक आइवीएफ की प्रक्रिया के दो हफ्ते तक महिलाओं को नहाना नहीं चाहिए। नहाने से आइवीएफ की प्रक्रिया पर असर हो सकता है, जिससे प्रत्यारोपित अंडा अपने स्थान से हट सकता है। इस अवस्था में मरीजों को शॉवर बाथ लेने की सलाह दी जाती है।

ज्यादा हिलने वाले व्यायाम से बचें - आइवीएफ प्रक्रिया के बाद महिलाओं को कोई भी भारी एक्सरसाइज व एरोबिक्स करने से मना किया जाता है। इस समय जॉगिंग करने की अपेक्षा, हल्के व्यायाम जैसे टहलना अच्छा रहता है। इसके अलावा महिलाएं मेडिटेशन भी कर सकती हैं।

यह होती है दिक्कत (साइड इफेक्ट)
ओवरियन हाइपरसिमुलेशन सिंड्रोम- एक फीसद महिलाओं में ये समस्या पैदा होती है। यह तब होता है जब अंडाशय में फर्टिलिटी ट्रीटमेंट ज़्यादा दिया जाता है। सामान्य लक्षण हल्के ही होते हैं और महिला का इलाज आसानी से हो जाता है। फिर भी, कुछ महिलाओं में कुछ गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं जिससे उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। लगभग एक फीसद महिलाओं में ब्लड प्रेशर या किडनी का खराब होने जैसी स्थितियां ओवरियन हाइपरसिमुलेशन सिंड्रोम में पैदा होती हैं। अंडे की पुनर्प्राप्ति के समय इस तरह की जटिलता पैदा होती है।

एंठन और असहजता - अंडे की पुनर्प्राप्ति के समय और बाद में, महिलाओं में एंठन और असहजता की समस्या होती है। फिर भी, ये लक्षण एक या दो दिनों में ठीक हो जाते हैं। कुछ खास स्थितियों में, डॉक्टर को आंत, मूत्राशय या रुधिर कोशिका में छेद करना पड़ता है। भ्रूण स्थानांतरण के समय भी एंठन होती है। कुछ महिलाओं में इस ट्रांसफर के बाद ब्लीडिंग या स्पोटिंग भी होती है।

पेल्विक इन्फेक्शन -  यह इन्फेक्शन बहुत दुर्लभ है, लेकिन जब ऐसा होता है तो आपको दवाएं नस में दी जाती हैं। अंडाशय, गर्भाशय और फैलोपियन को ऑपरेशन से निकाल दिया जाता है। मल्टीपल प्रेग्नेंसी चूंकि आइवीएफ़ ट्रीटमेंट में कई भ्रूण ट्रांसफर किए जाते हैं, इसलिए मल्टीपल प्रिग्नेंसी का खतरा बढ़ जाता है, ये जुड़वा, ट्रिपल या इससे अधिक भी हो सकते हैं। यह मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक है। इससे बच्चे में कम वजन और मानसिक लकवा भी हो सकता है।

जन्म दोष - हालांकि यह मुश्किल है लेकिन, कुछ अध्ययनों से पता चला है कि आइवीएफ़ और आइसीएसआई जैसे ट्रीटमेंट में खास तौर पर लड़के में सेक्सुयल दोष होता है, फिर भी, यह एक प्रतिशत से भी कम होता है।

समय पूर्व प्रसव - आइवीएफ़ ट्रीटमेंट में समय पूर्व लेबर या डिलिवरी होती है, चाहे कितने भी बच्चे हों। 

Posted By: Rashid