ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई। कोविड-19 के विश्वव्यापी संकट के दौरान यदि इस्लाम की सलाह पर अमल किया जाता तो आज न तो देश के संक्रमितों में एक तिहाई तब्लीगी जमात वाले होते, न ही जमात के अमीर मौलाना साद को यूं मुंह छिपा कर भागना पड़ता। क्योंकि कुरान शरीफ की सूरा संख्या 5 में स्पष्ट कहा गया है कि जिस मुल्क में रहते हो, उसके कायदे-कानून और वहां के हुक्मरानों की बात को मानो।

सरकार के निर्देशों एवं इस्लाम की शिक्षा में समानता

हजरत निजामुद्दीन की तब्लीगी जमात में हुई गलतियों पर पर्दा डालने के लिए आज भले कुछ लोगों द्वारा कुतर्क गढ़े जा रहे हों, लेकिन कुछ ऐसे पढ़े-लिखे मुसलमान तथ्यों के साथ सामने आ रहे हैं, जो कोविड-19 जैसे खतरनाक संक्रामक रोग से बचने के लिए सरकार के निर्देशों एवं इस्लाम की शिक्षा में समानता पाते हैं। इन्हीं में से एक महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सैय्यद मुजफ्फर हुसैन कहते हैं कि जिस मज़हब की आसमानी किताब और उसके हुजूर पैगंबर मुस्तफ़ा मुहम्मद सल्लेअलाहुअलैहिवसल्लम (SAW) ने इन पाबंदियों एवं एहतियातों का जिक्र हजारों साल पहले किया था, आज 21वीं शताब्दी में विज्ञान उन्हीं का पालन करने को कह रहा है।

मुल्क के लोगों की हिफाज़त करें

ऐसे में इस्लाम के मानने वालों का फर्ज बनता है कि वे अपने मज़हब के बताए हुए रास्तों पर चलें एवं अपनी, समाज की एवं पूरे मुल्क के लोगों की हिफाज़त करें एवं सरकार के निर्देशों का हू-ब-हू पालन करें। वह कहते हैं कि इसके बावजूद यदि कोई कोरोना वायरस की महामारी के दौरान सरकार के निर्देशों का उल्लंघन करे, तो समाज एवं मुल्क के खिलाफ हरकतें करनेवाले ऐसे इंसान को गैरजिम्मेदार माना जाएगा।

दो बार महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य रहे मुजफ्फर हुसैन हुजूर मुस्तफ़ा मुहम्मद सल्लेअलाहुअलैहिवसल्लम (SAW) की हदीस में दी गई सलाहों का पृष्ठ एवं सूरा संख्या के साथ उद्धरण देते हुए कहते हैं कि हदीस में संक्रामक रोग के दौरान लॉक डाउन जैसे उपाय के निर्देश भी दिए गए हैं। हदीस में कहा गया है कि संक्रामक बीमारी के दौरान उन जगहों पर जाने से परहेज करें, जहाँ पर ये महामारी हो। और अगर आप उसी शहर में, या उसी जगह पर हों। तो उस जगह को छोड़कर बाहर न जाएं। [अल बुखारी (5739) एवं अल मुस्लिम (2219)]। आज सरकार ‘सोशल डिस्टैंसिंग’ एवं ‘कोरेंटाइन’ की बात कर रही है। हदीस में भी संक्रामक रोग से पीड़ित व्यक्ति को सेहतमंद लोगों से दूर रखने की हिदायत दी गई है। [अल बुखारी 6771 एवं अल मुस्लिम 2221]। यही नहीं जिस शख्स को कोरोना जैसा संक्रामक रोग हो, शेष समाज को उससे दूर रहने की हिदायत भी दी गई है। [शाही अल बुखारी वाल्यूम 07- 71- 608 ]।

हदीस में साफ कहा गया है यदि आप संक्रमित है तो दूसरों को मुसीबत में न डालें

आज तबलीगी जमात के लोग हजरत निजामुद्दीन की मरकज से निकलकर देश भर में इस रोग का प्रसार करते घूम रहे हैं। जबकि हदीस में साफ कहा गया है यदि आप संक्रामक रोग से पीड़ित हैं, तो आपका फर्ज है कि दूसरों तक इसे न पहुंचने दें। दूसरों को मुसीबत में न डालें। [सुनान इब्न मजहा (2340)]। सरकारी निर्देशों का उल्लंघन करते हुए कई इलाकों में आज भी लोग सामूहिक नमाज की जिद ठाने बैठे हैं। जबकि इस्लाम की आसमानी किताब हदीस में कहा गया है कि ऐसी महामारी के वक्त आपका घर ही आपकी मस्जिद है। जो सवाब (पुण्य) मस्जिद में नमाज का है। ऐसे समय में वही सवाब घर में पढ़ी हुई नमाज का है। [अल तिरमज़ी(अल-सलाह, 291)]। इन दिनों कोरोना से बचने के लिए फेस मास्किंग एवं हाथ धोने को जरूरी बताया जा रहा है।

साफ-सफाई ही आधा ईमान 

मुजफ्फर हुसैन हदीस का उल्लेख करते हुए [(अबू दाऊद, अल तिरमज़ी, बुक 43, हदीश 2969), शाही] कहते हैं कि जब हुजूर मुस्तफ़ा मुहम्मद सल्लेअलाहुअलैहिवसल्लम को छींक या खांसी आती थी, तो वह खुद के कपड़े से अपना मुंह ढक लिया करते थे। हुजूर ने फरमाया कि अपने घर आते ही अपने हाथ धो लें। साफ-सफाई ही आधा ईमान है। वैसे भी इस्लाम में पांचवक्ता नमाज फर्ज है, और नमाज से पहले वज़ू फर्ज है। [अल मुस्लिम (223)]

Posted By: Sanjeev Tiwari

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