शहरों में मेट्रो का नेटवर्क बढ़ा, बने अर्थव्यवस्था के पावरहाउस लेकिन प्रदूषण से मुश्किल में जीवन; रिपोर्ट में दावा
भारत में शहरी आबादी और क्षेत्रफल तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन योजनाबद्ध विकास की कमी है।

शहर बने अर्थव्यवस्था के पावरहाउस लेकिन प्रदूषण से मुश्किल में जीवन(फाइल फोटो)

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। देश में जिस रफ्तार से शहरी आबादी और उसका क्षेत्रफल बढ़ रहा है, उस रफ्तार से शहरों में न लोगों के रहने लायक सुविधाएं जुटाई जा रही है, न ही उनके बेतरतीब फैलाव को रोकने के लिए कोई पुख्ता योजना है।
शहरी विकास पर नीतिगत सुझाव देने वाली संस्था 'जनाग्रह' ने बुधवार को अपनी रिपोर्ट जारी कर कई अहम सुझाव दिए है।
शहरों का विकास योजनाबद्ध
जिसमें इस बात पर जोर दिया है कि शहरों का विकास योजनाबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए, न कि संयोग से वह जैसा रूप ले रहे है, वैसे ही छोड़ दिया जाए रिपोर्ट में 2050 तक देश की शहरी आबादी के 72.3 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, जो आसियान देशों की कुल आबादी से भी ज्यादा होगी।
ऐसे में शहरी प्रबंधन पर प्रमुखता से काम करने की जरूरत बताई गई है। साथ ही बताया गया है कि 2005-06 से 2022-23 के बीच बिना प्लानिंग के देश में 25 लाख हेक्टेयर से अधिक का शहरी क्षेत्रफल बढ़ा है।
भारत के बड़े शहर आर्थिक पावरहाउस
भारत के बड़े शहर मौजूदा समय में आर्थिक पावरहाउस बन गए हैं, जिससे नौकरियां, जीडीपी और निजी खुशहाली बढ़ रही है लेकिन नागरिकों के लिए गतिशीलता ( मोबिलिटी) और जीवन का अनुभव हर दिन खराब होता जा रहा है। देश के अभी 20 शहरों में ही मेट्रो की सुविधा है।
रिपोर्ट के मुताबिक लखनऊ में दस हजार की आबादी पर अभी 0.6 बसें है जबकि बेंगलुरु में 4.5 बसें है। शहरी विकास मंत्रालय ने प्रति दस हजार लोगों पर चार से छह बसों का एक मानक निर्धारित किया है। अभी देश की शहरी आबादी 52.2 करोड़ है।
जनजीवन का बेहतर अनुकूलता
रिपोर्ट के मुताबिक दूसरी ओर बड़े शहरों के मुकाबले छोटे शहरों में साफ हवा, ज्यादा खुली जगह व जनजीवन को बेहतर बनाने जैसे अनुकूलता तो है लेकिन युवाओं के लिए रोजगार के ज्यादा मौके नहीं है। बेतरतीब तरीके से बढ़ते शहरी क्षेत्रफल को शहरों की अर्थव्यवस्था पर बोझ बताया है।
रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि शहरी क्षेत्रों में ज्यादातर लोग पैदल या पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर निर्भर हैं लेकिन देश के सबसे बड़े मेट्रोपॉलिटन शहरों जैसे मुंबई और बेंगलुरु में म्युनिसिपल बजट का सिर्फ तीन से पांच प्रतिशत ही पैदल चलने के इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च होता है। इस अनदेखी ने प्राइवेट गाडि़यों पर निर्भरता को बढ़ा दिया है।
शहर की सड़कें जाम
जिससे शहर की सड़कें जाम व गलियारों में बदल गई हैं। बेंगलुरु में तो यह समस्या इस हद तक पहुंच गई है कि ट्रैफिक जाम में प्रत्येक व्यक्ति हर साल अपना 168 घंटा यानी एक सप्ताह खराब कर देता है। शहरों में प्रदूषण की बढ़ती समस्या पर भी चिंता जताई गई है।
साथ ही बताया गया है कि दिल्ली में लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से लोगों की औसत आयु 8.2 वर्ष कम होने का अनुमान है।
