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सड़क पर खामोश मौतें और सुर्खियां बटोरती हवाई दुर्घटनाएं, परिवहन तंत्र में सुरक्षा का कड़वा सच

Published: Sat, 31 Oct 2026 04:31 PM (IST)

आंकड़ें बातते हैं कि भारत में सड़क दुर्घटना से हर तीन मिनट में एक लोगों की मौत हो जाती है। ये घटनाएं अक्सर सुर्खियों से दूर रहती हैं।

(AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)

(AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)

HighLights

  1. सड़क हादसों में हर घंटे औसतन 21 जानें जाती हैं।

  2. रेल पटरियों पर 2024 में 24,301 मौतें दर्ज हुईं।

  3. छोटे विमानों और हेलीकॉप्टरों की दुर्घटनाओं में वृद्धि चिंताजनक।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जब आसमान में कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त होता है या कोई बड़ा ट्रेन हादसा होता है, तो वह तुरंत देश की मुख्य सुर्खियां बन जाता है, उच्च स्तरीय जांच शुरू होती है और हफ्तों चर्चाएं चलती हैं। लेकिन इसके विपरीत सड़कों और पटरियों पर हर दिन होने वाली हजारों मौतें किसी बड़े हंगामे के बिना खामोशी से दम तोड़ देती हैं।

उदाहरण के तौर पर ऐसे समझिए कि कल यानी शुक्रवार को उत्तराखंड के चमोली जिले में हुई एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में 6 लोगों की मौत के बाद, छोटे नागरिक विमानों में होने वाली मौतों का आंकड़ा इस साल 2026 में अक्टूबर तक बढ़कर 22 तक पहुंच गया है। यह 2021 से अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक आंकड़ा है। हालांकि, ये आंकड़े देश के विशाल परिवहन संकट का एक छोटा सा हिस्सा मात्र हैं।

सड़कों पर हर 3 मिनट में जाती है एक जान

बात सड़कों पर होने वाले हादसों की करें तो भारत की सड़कों पर होने वाली तबाही किसी बड़े युद्ध से कम नहीं है। सड़क परिवहन मंत्रालय की तरफ से संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार। साल 2025 में सड़क हादसों में 1,83,434 लोग अपनी जान गंवा बैठे, जो 2024 के 1,77,175 के मुकाबले करीब 3.5% ज्यादा है।

दैनिक और प्रति घंटा आंकड़े भी समझिए

साल 2025 में कुल 5,13,474 एक्सीडेंट हुए यानी रोजाना औसतन 1407 हादसे। हर दिन औसतन 503 लोगों की मौत हुई, यानी हर घंटे लगभग 21 जानें गईं।2021 के बाद से हर साल सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है और पिछले 4 सालों में इसमें लगभग 19% की बढ़ोतरी हुई है।

राज्यों की स्थिति भी समझिए

2025 में सबसे ज्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में हुई, जिसका आंकड़ा 27,547 है, जबकि सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं तमिलनाडु में 71,195 में दर्ज की गईं। देश के कुल सड़क नेटवर्क का महज 2.1 हिस्सा होने वाले नेशनल हाईवे पर 2024 में कुल सड़क मौतों का 36.6% यानी 64,772 मौतें हिस्सा दर्ज हुआ।

बढ़ते हादसों के बाद सरकार ने 2030 तक सड़क यातायात से होने वाली मौतों और चोटों को आधा करने का लक्ष्य रखा है और राजमार्गों के मूल्यांकन के लिए एक नया रेटिंग सिस्टम भी लाया जा रहा है।

बड़े ट्रेन हादसे घटे, लेकिन पटरियों पर अब भी जा रही हैं जान

एक बात है कि रेलवे के मोर्चे पर एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है, लेकिन पटरियों पर होने वाले हादसे अब भी चिंता का विषय हैं। टक्कर, पटरियों से उतरना, आग और लेवल-क्रॉसिंग जैसी गंभीर घटनाएं 2014-15 के 135 मामलों से घटकर 2025-26 में मात्र 16 रह गईं हैं, यानी 11 वर्षों में 88% की बड़ी गिरावट।

इस दिशा में रेलवे ने सुरक्षा कवच जैसी तकनीक और बेहतर रखरखाव पर जोर दिया है, जिसके तहत रेलवे सुरक्षा का बजट 2013-14 के 39,200 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2025-26 में 1,17,693 करोड़ रुपये कर दिया गया।

लेकिन पटरियों पर बढ़ गई मौतें

हालांकि ट्रेन के बड़े हादसे कम हुए हैं, लेकिन रेलवे नेटवर्क के आसपास और पटरियों पर मरने वालों की संख्या डरावनी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में रेलवे ट्रैक और परिसरों पर 22,413 मौतें हुईं, जबकि रेलवे क्रॉसिंग पर 1,888 लोगों की जान गई कुल 24,301।

इसमें से अधिकांश 17,029 मौतें चलती ट्रेन से गिरने या पटरियों पर ट्रेन की चपेट में आने से हुईं। इसमें महाराष्ट्र में 3,587 और उत्तर प्रदेश में 3,538 सबसे आगे रहे।

विमानन क्षेत्र- छोटे विमानों और हेलीकॉप्टरों में बढ़ता जोखिम

इसके अलावा बात हवा की करें तो बड़े कमर्शियल एयरलाइंस की तुलना में छोटे विमान, चार्टर्ड प्लेन, ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टरों की सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा बन गई है। इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि जनवरी 2021 से अक्टूबर 2026 के बीच छोटे नागरिक विमानों से जुड़ी 19 घातक दुर्घटनाओं में कम से कम 60 लोगों की मौत हो चुकी है। साल-दर-साल यह आंकड़ा बढ़ रहा है। 2021 में 1 से बढ़कर 2026 में अब तक 22 हो चुका है।

रिपोर्ट में आंकड़ें डरावने वाले इसलिए भी है, क्योंकि कुल 60 मौतों में से 37 मौतें सिर्फ हेलीकॉप्टरों की दुर्घटनाओं में हुई हैं। इसमें भी उत्तराखंड का हिस्सा सबसे बड़ा है, जहां पिछले 5 वर्षों में देश की कुल हेलीकॉप्टर मौतों का 70% हिस्सा दर्ज हुआ है, जो ज्यादातर चार धाम यात्रा से जुड़ा है।

कारण क्या है, यह भी समझिए

बात अब इसके कारण की करें तो जांच रिपोर्टों में तेजी से बदलते मौसम, घटते बादल, उड़ान के दौरान देरी से फैसले लेना, वैली में सीमित अनुभव और दृश्यता की कमी जैसी ऑपरेशनल कमियां सामने आई हैं।

गौरतलब है कि यदि एक औसत दिन की तुलना की जाए, तो भारत की सड़कों पर हर 12.5 घंटे में उतनी जानें चली जाती हैं, जितनी 2025 के बड़े विमान हादसे (AI171) में कुल 260 लोगों की मौत हुई थी। एक दिन का सड़क हादसों का औसत टोल पूरे 2025-26 के बड़े रेल हादसों की कुल मौतों से लगभग 30 गुना ज्यादा है।

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